हर कोई यात्रा करता है, तो राहुल गाँधी की छुट्टियों पर इतनी उत्तेजना क्यों?

rahul gandhi
विदेशी यात्रा नहीं, लेकिन एक बेचैन व्यक्ति के रूप में उनकी धारणा राहुल गांधी के व्यक्तित्व को चोट पहुंचा रही है । ट्विटर

राहुल गांधी कांग्रेस का चेहरा हैं। उनके शब्दों और कार्यों से यह प्रभाव पड़ता है कि लोग पार्टी के बारे में क्या सोचते हैं।

कांग्रेस के लोगों को उनके पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के ठिकाने के बारे में कुछ भी पता नहीं है। उन्होंने उनको आखिरी बार उनके 48वें जन्मदिन के दूसरे दिन देखा था, जो उन्होंने इस साल भारत में ही मनाया था।

वह दुनिया की खोज करना (टहलना) पसंद करते हैं, लेकिन उनके जन्मदिन से पहले और उसके बाद की उनकी विदेशी छुट्टियाँ एक रहस्य रही हैं, विशेषकर उनके गंतव्य की गोपनीयता के कारण। एनडीए सरकार ने अक्सर उन पर सुरक्षा प्रोटोकॉल को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया है।

अपने 47वें जन्मदिन पर राहुल गांधी इटली में थे। 46वें जन्मदिन पर वह भारत में ही थे लेकिन अगले ही दिन एक छोटी सी विदेश यात्रा पर चले गए थे। विदेश में 56 दिन आराम करके (टहलकर) भारत लौटने के कुछ हफ्तों के बाद ही उन्होंने अपना 45वाँ जन्मदिन भारत में ही मनाया था। लोकसभा में उनकी पार्टी के 44 सीटों पर सिमटकर रह जाने के तुरंत बाद आने वाला अपना 44वाँ जन्मदिन मनाने के लिए वह देश के बाहर चले गए थे।

तो क्या, राहुल गांधी के ब्रेक (अपने काम से विश्राम पाने) के लिए विदेशी स्थानों की पसंद उनको एक गैर-जिम्मेदार राजनेता बनाती है, जैसा कि उनके राजनीतिक प्रतिद्वंदी हम लोगों को विश्वास दिलाते हैं? इसके लिए कोई सकारात्मक या नकारात्मत जवाब नहीं है।

समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव अपने परिवार के साथ लंदन में हैं लेकिन इससे किसी को कोई परेशानी नहीं है।राजनीती में दूसरों के बारे में भी पता लगाएं और आप हमारे राजनीतिक वर्ग के अंतर्राष्ट्रीय विवरणों की सराहना कर सकते हैं। अटल बिहारी वाजपेई भी छुट्टियों में टहलने जाया करते थे, हालांकि, देश के अंदर ही। तो गांधी की इन छुट्टियों पर विवाद क्यों?

यह भी एक कारण हो सकता है कि उनको एक ऐसा नेता समझा जाता हैः जो एक आदर्शवादी हैं और लालू यादव जैसे दलित नेताओं को बचाने के लिए एक अध्यादेश की मांग करके अपनी पार्टी और प्रधानमंत्री को परेशानियों में डाल सकते हैं, एक नाराज युवक जिसने अपने वरिष्ठ सहयोगियों और पूर्वजों द्वारा विकसित और संरक्षित “सिस्टम” (प्रणाली) की (कांग्रेस और सरकार दोनों में) निंदा की थी और एक बागी जिसने नियमगिरि पहाड़ी के आदिवासियों की मदद करने के लिए ओडिशा में एक बड़ी खनन परियोजना पर रोक लगा थी भले ही इससे वह हमेशा गरीब ही रह जाते। इस प्रकार का एक नेता अन्य साधारण लोगों की तरह कैसे छुट्टी लेकर विदेश जा सकता था?

2013 की एक आरामदायक दोपहर में गांधी पत्रकारों के एक समूह के साथ बातचीत कर रहे थे, उस समय वह कांग्रेस के उपाध्यक्ष थे। वे पत्रकार उनसे पार्टी के मतआधार में निरंतर क्षरण (वोटों की संख्या में कमी) को रोकने की उनकी योजनाओं के बारे मे सवाल कर रहे थे।

एक साहसी पत्रकार ने उनसे पूछा कि, “आप ऐसा कैसे करेंगे जब आपके पास ऐसे लोकप्रिय स्थानीय नेता नहीं हैं जो जमीनी स्तर पर पार्टी की विचारधाराओं और कार्यक्रमों का प्रचार कर सकें। राज्यों में कांग्रेस के पास ऐसे चेहरे नहीं है।“

गांधी ने उसको धैर्यपूर्वक सुना, कुछ सेकेण्ड इस पर विचार किया और फिर जवाब दिया कि, “यह चेहरों के बारे मे नहीं है, यह कांग्रेस की विचारधारा के बारे में है। कभी-कभी, यहाँ तक कि एक व्यक्ति भी पार्टी की विचारधाराओं का प्रतीक बनकर खड़ा हो सकता है। नेहरू जी एक चेहरा थे। इंदिरा जी एक चेहरा थीं।“

उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “स्वतंत्रता संग्राम के दौरान नेहरू जी कई बार जेल गए थे, लेकिन आपको (राहुल गांधी को) पार्टी का चेहरा बनने के लिए वहां जाने की जरूरत नहीं है।”

उन्होंने कई बातें अनकही छोड़ दी लेकिन उनका संदेश स्पष्ट था। अब  पाँच साल बाद, कोई भी नहीं जानता कि क्या गाँधी अभी भी वही समान विचारधारा रखते हैं। कई चीजें बदल गई हैं। कांग्रेस की अब केंद्र में सत्ता नहीं है और ज्यादातर राज्यों में भी इसकी सरकार नहीं रह गई है। 2019 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस नेता अब इसे व्यक्तित्वों के बीच की लड़ाई न बताकर इसको विचारधाराओं की लड़ाई बता रहे हैं।

और,राहुल गांधी और कांग्रेस का चेहरा हैं। चाहे कांग्रेसी इसे पसंद करें या ना करें, लेकिन उनके सारे क्रियाकलाप इस पर असर डालते हैं कि लोग उनकी पार्टी के बारे में क्या सोचते हैं। और इसलिए उनकी नवीनतम विदेश यात्राएं सवाल उठाती हैं: क्या वह गंभीर हैं?

यदि वह कांग्रेस का चेहरा हैं, तो उनको एक अंशकालिक राजनेता के रूप में नहीं देखा जा सकता है, खासकर तब जब उनका मुकाबला, नरेंद्र मोदी, जो कभी भी राजनीति या शासन से छुट्टी नहीं लेते, और अमित शाह, जो एक बहुत व्यस्त दिन पर भी राजनीति के बारे में बातें और चर्चा करतें हैं, जैसे 24×7 काम करने वाले राजनेताओं की तरह हों।

पिछले साल गांधी पुलिस द्वारा की किसानों पर की गई गोलीबारी में पीड़ितों से मिलने के लिए मंदसौर गए और उसके बाद तुरंत विदेश चले गए। यदि राज्य में उस समय कांग्रेस की सरकार होती तो, शाह उनके निष्कासन तक चैन की सांस नहीं लेते। गांधी एक साल बाद मंदसौर लौट आए, लेकिन तब मोमेन्टम समाप्त हो गया था। कर्नाटक के लोग ऐसे नेता के बारे में क्या सोचेंगे, जिनकी वजह से सरकार काफी दिनों तक निलंबित रही क्योंकि उनके पास मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के साथ मंत्री संविभाग वितरण फॉर्मूला पर चर्चा करने का समय नहीं था? गांधी को अपनी मां के साथ उनके नियमित मेडिकल चेक-अप के लिए अमेरिका जाना पड़ा।

133 वर्ष पुरानी पार्टी के अध्यक्ष को अब हर समय अपने विचारों और सिद्धांतों को बदल नहीं सकते हैं। हाल ही में पार्टी को लोकतांत्रिक बनाने के लिए आंतरिक चुनावों के एक बड़े समर्थक, गांधी ने इसे त्यागने का फैसला लिया है और कांग्रेस कार्यकारिणी समिति के सदस्यों को नामांकित करने के लिए अपने विशेषाधिकार का मनमुताबिक प्रयोग किया है। बहुत समय हो गया है लेकिन किसी ने उनको सिस्टम बदलने के बारे में बात करते हुए नहीं सुना है। और ,लालू यादव अब उनके करीबी सहयोगी हैं।

गांधी के सार्वजनिक भाषणों ने भी उनको एक गंभीर राजनेता के रूप में दर्शाने में मदद नहीं की है। कांग्रेस अध्यक्ष केवल धमकियां ही नहीं दे सकते हैं कि वह भूकम्प ला देंगे और प्रधानमंत्री उससे हिल जाएंगे। उनका दावा था कि यदि वह संसद में बहस करें तो मोदी उनके सामने 15 मिनट भी नहीं खड़े रह पाएंगे, इस वादे ने भी उनकी असफलता के कारणों की ज्यादा मदद की है।

तो, यह उनकी विदेशी यात्राएं नहीं है, जो कांग्रेसियों को परेशान करती हैं। देश से बाहर उनकी लगातार यात्राएं उनको केवल एक बेचैन व्यक्ति के रूप में दर्शाती हैं, जिनका अपने कार्यों में मन नहीं लगता है। इस धारणा को बदलने के लिए, गांधी को पहले कांग्रेस अध्यक्ष का कार्य गंभीरता से शुरू करना होगा।

Read in English : Everyone travels, so why are we worked up over Rahul Gandhi’s holidays?

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here