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UP के आधुनिक मदरसों को चलाने के लिए सरकारी पैसा खत्म हो गया है, एक बच्ची का डॉक्टर बनने का सपना दांव पर है

यूपी के मदरसों में शिक्षकों को 2017 से वेतन नहीं दिया गया है, और राज्य द्वारा दिया जाने वाला 3,000 रुपये प्रति माह का मानदेय भी वापस ले लिया गया है. यहां तक कि छात्रों को भी अपने परिवार की मदद के लिए छोटी-मोटी नौकरियां करने के लिए मजबूर होना पड़ता है.

लखनऊ के चिनहट में मदरसा इस्लामियां स्कूल की छात्राएं | फोटो: शुभांगी मिश्रा | दिप्रिंट

लखनऊ: लखनऊ के चिनहट में मदरसा इस्लामिया स्कूल में, उमा बानो टॉपर हैं जिनकी विज्ञान में काफी रुचि है. 12 साल की उमा डॉक्टर बनना चाहती है, लेकिन उसके सपने के टूटकर बिखर जाने का खतरा है. संभवतः उसके साइंस और गणित के ‘मॉडर्न’ टीचर शायद अगले साल वापस नहीं आएंगे.

उसके सपने को पूरा करने के लिए पैसा तेजी से खत्म हो रहा है. उत्तर प्रदेश के मदरसों में कई बड़े बदलाव होने जा रहे हैं.

हालांकि, उनके शिक्षकों को उत्तर प्रदेश में मदरसों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने की केंद्र सरकार की योजना (2009) के तहत नियुक्त किया गया था, लेकिन उनका आरोप है कि उन्हें 2017 से लेकर आज तक उन्हें उनका 15,000 रुपये का मासिक वेतन नहीं दिया गया है. राज्य की तरफ से उन्हें मिलने वाला 3000 रुपये का मानदेय, जिस पर वे निर्वाह कर रहे थे, भी पिछले साले से उन्हें मिलना बंद हो गया है.

“मेरे सपने चकनाचूर हो जायेंगे,” बानो कहती है जब वह बड़े लोगों को उनकी हालत के बारे में बात करते हुए सुनती है. वे इन दिनों बस इसी बारे में बात करते हैं. और सिर्फ मदरसों में नहीं. शिक्षक दिसंबर से ही लखनऊ की सड़कों पर उतर रहे हैं और कह रहे हैं कि उन्हें पेट भरने के लिए छोटी-मोटी नौकरियां या छोटा-मोटा काम करने के लिए मजबूर किया जाता है. समाजवादी पार्टी के नेताओं ने नरेंद्र मोदी सरकार के ‘एक हाथ में कुरान और एक हाथ में कंप्यूटर’ के वादे पर सवाल उठाए हैं और भाजपा अपने विरोधियों पर वोट-बैंक की राजनीति करने का आरोप लगा रही है.

हजारों शिक्षक और छात्र कहां जाएंगे? क्या सरकार ने इस पर कोई विचार किया है? – डॉ. इफ्तिखार जावेद अहमद, अध्यक्ष, यूपी मदरसा शिक्षा बोर्ड

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विधान परिषद की कार्यवाही मुख्य रूप से 8 फरवरी को समाजवादी पार्टी के नेताओं द्वारा सामने लाई गई मदरसा बहस पर केंद्रित थी. बहस ‘एनआरसी जैसी’ जांच से लेकर अवैध फंडिंग और शिक्षकों के उत्पीड़न तक पहुंच गई है. स्वामी प्रसाद मौर्य और अन्य लोगों द्वारा योगी आदित्यनाथ सरकार पर धार्मिक भेदभाव के आरोप लगाए गए. “क्या जांच 24x7x365 चलेगी? मैंने कभी साल भर की जांच नहीं देखी… आप आरोपों के आधार पर शिक्षकों का वेतन रोकना चाहते हैं, आप अल्पसंख्यकों के बच्चों की शिक्षा रोकना चाहते हैं, शिक्षकों को परेशान किया जा रहा है!”

2009 की योजना (एसपीक्यूईएम) पंजीकृत मदरसों को विज्ञान, गणित और हिंदी पढ़ाने के लिए तीन ‘मॉडर्न एजुकेशन टीचर्स’ को नियुक्त करने की अनुमति देती है, लेकिन इस वर्ष अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय द्वारा इसका नवीनीकरण नहीं किया गया. प्राथमिक विद्यालय में आधुनिक शिक्षा देने वालों को केंद्र और राज्य द्वारा 60:40 के अनुपात में 15,000 रुपये प्रति माह का भुगतान किया जाता था. इस राशि के अलावा, उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें प्रति माह 3,000 रुपये अतिरिक्त भुगतान किया. लेकिन अब दोनों को रोक दिया गया है.

उमा बानो (दाएं) अपनी मां रजिया बानो (बाएं) के साथ | फोटो: शुभांगी मिश्रा | दिप्रिंट

अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री स्मृति ईरानी ने पिछले साल राज्यसभा में कहा था कि एसपीक्यूईएम एक ‘मांग-आधारित योजना’ थी, जिसे 3 मार्च 2022 तक लागू किया गया था. और 8 जनवरी 2024 को, यूपी राज्य अल्पसंख्यक मामलों के निदेशक, सी इंदुमथी ने जिलाधिकारियों सहित विभिन्न हितधारकों को लिखा कि यूपी सरकार मानदेय रोक रही है क्योंकि यह एसपीक्यूईएम से जुड़ी एक पूरक योजना थी. इससे कम से कम 21,000 ‘मॉडर्न’ मदरसा शिक्षकों का भविष्य अधर में लटक गया है.

29 जनवरी को, उत्तर प्रदेश के 7,400 पंजीकृत मदरसों के सैकड़ों शिक्षक लखनऊ में एकत्र हुए और पिछले छह वर्षों के पारिश्रमिक और योजना की बहाली की मांग करते हुए सड़कों पर मार्च किया.

18 दिसंबर से धरना और मार्च कर रहे शिक्षकों ने अपनी मांगें तेज कर दी हैं. 29 जनवरी को, उत्तर प्रदेश के 7400 पंजीकृत मदरसों के सैकड़ों शिक्षक लखनऊ में एकत्र हुए और पिछले छह वर्षों के पारिश्रमिक और योजना की बहाली की मांग करते हुए सड़कों पर मार्च किया.

उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. इफ्तिखार जावेद अहमद ने कहा कि सरकार ने शिक्षकों और छात्रों की स्थितियों पर दोबारा विचार नहीं किया. उन्होंने कहा, “एसपीक्यूईएम प्रधानमंत्री के नारे ‘एक हाथ में कुरान और एक हाथ में कंप्यूटर’ का प्रतीक है. इसके माध्यम से हजारों मदरसा छात्रों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ा गया है. यह सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास के पीएम के मंत्र का भी प्रतीक है. इसे रोका नहीं जाना चाहिए.”

पिछले छह वर्षों में कई मदरसा शिक्षकों को अपनी जीविका चलाने के लिए छोटे-मोटे काम करने के लिए मजबूर होना पड़ा है. वे पंक्चर दुकानों, बढ़ई की दुकानों, या स्विगी और ज़ोमैटो जैसी खाद्य वितरण कंपनियों के लिए डिलीवरी अधिकारियों के रूप में काम कर रहे हैं- डॉ इफ्तिखार जावेद अहमद.

लड़कियों पर असर पड़ेगा

चिनहट के मदरसा इस्लामिया स्कूल में, तीन आधुनिक शिक्षकों में से किसी को भी – 40 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाएं जो अंग्रेजी, हिंदी, गणित, सामाजिक विज्ञान, विज्ञान पढ़ाती हैं – 2017 से अपना वेतन नहीं मिला है.

हालांकि, बिना वेतन के भी, तीनों शिक्षक मदरसे में काम करते रहे. उन्होंने ऐसा कुछ हद तक सरकार से धन प्राप्त करने की उम्मीद में और कुछ हद तक इसके लिए किया ताकि 3,000 रुपये का मानदेय, जो उन्हें जून 2023 में मिलना बंद हो गया था, उसे पा सकें.


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चिनहट के मदरसे में एक हिंदी शिक्षक ने कहा, “मैंने शाम को ट्यूशन पढ़ाकर गुजारा किया और राज्य सरकार द्वारा हमें दिए जाने वाले 3,000 रुपये के मानदेय पर पढ़ा रहा हूं. मैंने सोचा कि सरकारी पैसा है तो मेरे खाते में आ जायेगा. आज नहीं तो कल.’

कोरोना के बाद से मैं डॉक्टरों का सम्मान करने लगा हूं. इसलिए मैं एक बनना चाहता हूं
—12 वर्षीय उमा बानो

उमा बानो की विज्ञान टीचर ने पहले ही उसके माता-पिता को पहले ही बता दिया था कि जब तक स्थिति नहीं बदलती, उनके और अन्य ‘आधुनिक’ विषयों के शिक्षकों के लिए मदरसे में पढ़ाना जारी रखने की संभावना नहीं है. इसका मतलब बानो के डॉक्टर बनने और कम्युनिटी के लिए काम करते हुए गरीबी के चक्र को तोड़ने के सपनों का अंत हो सकता है.

एक तंग मुस्लिम इलाके के एक छोटे से कमरे में रहने वाली बानों कहती है. “कोरोना के बाद से मैं डॉक्टरों का सम्मान करने लगी हूं. इसीलिए मैं ऐसा बनना चाहती हूं.”

मिर्जा इस्लामिया स्कूल की कंप्यूटर लैब | फोटो: शुभांगी मिश्रा | दिप्रिंट

1932 में स्थापित इस मदरसे को इसकी जीर्ण-शीर्ण स्थिति से बचाने के लिए सिर्फ पेन्ट की जरूरत है. कुछ कक्षाएं कमरों के अधूरे ढांचे में चलती हैं. प्रिंसिपल लाल मोहम्मद कहते हैं, ”दीवारें या छत बनाने के लिए कभी भी पर्याप्त पैसा नहीं था.” ‘कंप्यूटर लैब’ में विंडोज़ एक्सपी वाला एक डेस्कटॉप है. स्कूल पास के कम्युनिटी के सदस्यों के दान पर चलता है और अपने छात्रों से किसी तरह का कोई शुल्क नहीं लेता है.

2016 में पंजीकृत मदरसों में 3.17 लाख से अधिक छात्र अपनी परीक्षाओं में शामिल हुए, लेकिन 2021 में यह आंकड़ा घटकर 1.22 लाख से थोड़ा अधिक हो गया.

बानो की मां रजिया अपनी बेटी को एक प्राइवेट स्कूल में नहीं भेज सकतीं, जिसकी लागत “कम से कम 2,000 रुपये प्रति माह” है. निकटतम सरकारी स्कूल की दूरी भी 5 किमी है, लेकिन परिवार हर दिन बच्ची को उतनी दूर भेजने में भी झिझकता है, जबकि मदरसा उनके घर से कुछ ही दूरी पर है..

रजिया ने कहा, “मेरे पति एक ड्राइवर हैं, हमें दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है. मैं अपनी बच्ची को किसी दूसरे स्कूल में नहीं भेज पाऊंगी.” Google Earth डेटा के अनुसार, उस एरिया में 3-4 प्राइवेट स्कूल हैं- रेनबो प्री-स्कूल, जीडी पब्लिक इंटर कॉलेज, एनडब्ल्यूपी इंटर कॉलेज और कस्तूरबा बालिका विद्यालय.

आधुनिक शिक्षा गरीब मुस्लिम समुदायों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, विशेषकर लड़कियों के लिए जिन्हें उनके परिवार वाले शायद किसी अन्य स्कूल में नहीं भेजते. यह लड़कियों के लिए एक सुरक्षित वातावरण है.

यहां के परिवारों ने स्पष्ट रूप से कहा कि मदरसे के अभाव में, वे अपनी लड़कियों को अपने पड़ोस से “बाहर” पढ़ने के लिए नहीं भेजेंगे.

मदरसे में पढ़ने वाली 22 वर्षीय ज़रीन फातिमा ने कहा, “अगर यह हमारे आसपास नहीं होता तो मेरे परिवार ने मुझे स्कूल नहीं भेजा होता.” हालांकि, वह अन्य कई कारणों से अपने ग्रेजुएशन की पढ़ाई जारी नहीं रख पाई है, मुख्यतः क्योंकि कॉलेज तक उनके साथ जाने वाला कोई नहीं है. इसी तरह की आशंका कर्नाटक में भी व्यक्त की गई थी जब राज्य ने स्कूलों में हिजाब पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया था. हालांकि, बाद में छात्राएं बिना हिजाब के परीक्षा देने पहुंचीं.

मदरसे इस्लामिक स्कूल हैं जहां धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ उर्दू, अरबी और फ़ारसी भाषाएं भी पढ़ाई जाती हैं. 2009 में, केंद्र सरकार ने यह सुनिश्चित करने के लिए SPQEM की शुरुआत की कि छात्रों को अच्छी शिक्षा मिले. यह हाशिये पर पड़े पसमांदा समुदाय के सदस्यों के साथ-साथ उन लड़कियों के लिए एक लाइफ लाइन है जिनके माता-पिता उन्हें रेग्युलर स्कूलों में नहीं भेजते हैं.

लखनऊ के चिनहट में मदरसा इस्लामियां स्कूल | फोटो: शुभांगी मिश्रा | दिप्रिंट

“यहाँ के अधिकांश परिवार अपने बच्चों को स्कूल भेजने का जोखिम नहीं उठा सकते हैं, या बस अपनी बेटियों को स्कूल नहीं भेजेंगे. समुदाय की महिलाओं के लिए यहां आकर पढ़ाई करना बेहद जरूरी है,” मदरसे में अंग्रेजी शिक्षक ने कहा.

अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के अनुसार, उत्तर प्रदेश में 12,791 पंजीकृत और 2,313 अपंजीकृत मदरसे हैं. यूपी मदरसा बोर्ड के प्रतिनिधियों ने दिप्रिंट को बताया कि इनमें से 7,400 मदरसे आधुनिक शिक्षा दे रहे हैं.

यहां के अधिकांश परिवार अपने बच्चों को स्कूल भेजने का जोखिम नहीं उठा सकते हैं, या बस अपनी बेटियों को स्कूल नहीं भेजेंगे. समुदाय की महिलाओं का यहां आकर पढ़ाई करना बेहद जरूरी है.

लेकिन मदरसों में बड़े पैमाने पर ड्रॉप आउट रेट बढ़ रहा है. जो कि 2016 से 2021 तक 61 प्रतिशत रहा और ऐसी आशंका है कि यह प्रवृत्ति केवल बढ़ेगी. यूपी मदरसा बोर्ड के अनुसार, 2016 में पंजीकृत मदरसों में 3.17 लाख से अधिक छात्र अपनी परीक्षाओं में शामिल हुए, लेकिन 2021 में यह आंकड़ा घटकर 1.22 लाख तक पहुंच गया.

नाम न बताने की शर्त पर चिनहट में मदरसा इस्लामिया स्कूल के एक शिक्षक ने कहा,“आधुनिक शिक्षा गरीब मुस्लिम समुदायों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, विशेषकर मुस्लिम लड़कियों के लिए जिनके परिवार शायद उन्हें किसी अन्य स्कूल में नहीं भेजते हैं. यह लड़कियों के लिए यहां का माहौल सुरक्षित है.” प्रिंसिपल ने कहा, ‘स्कूल में लड़कियों और लड़कों का अनुपात 60:40 है. सरकार द्वारा नियुक्त सभी शिक्षक महिलाएं हैं.’

यहां के होनहार छात्र बाद में बेहतर एजुकेशन पाने की उम्मीद में इलाके के एक प्राइवेट स्कूल में ट्रांसफर हो जाते हैं.

एक अन्य शिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “मेरे छात्र स्कूल ख़त्म होते ही घर नहीं भागते. वे अपनी नौकरियों के लिए निकल जाते हैं जैसे किसी दुकान में काम करना, या अपने पिता की उनके काम में मदद करना. उनके परिवार किसी अन्य एजुकेशन का खर्च वहन नहीं कर सकते. एक बेहतर भविष्य बनाने का उनके पास एक मात्र मौका है.”

डिबेट और पॉलिसी

भारत में इस्लामी शिक्षा ने 10वीं सदी में आकार लेना शुरू लिया. सर सैय्यद अहमद खान और फजलुर रहमान ने मदरसों में आधुनिक शिक्षा शुरू करने के लिए अलीगढ़ आंदोलन का नेतृत्व किया. परिणामस्वरूप, मदरसे से राजा राम मोहन राय, मुंशी प्रेमचंद और डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक हस्तियां भी मदरसे की छात्र रहीं. 1993 में, पीवी नरसिम्हा राव की सरकार ने मदरसों में आधुनिक शिक्षा प्रदान करने की आवश्यकता को पहचाना, जिसके कारण 2009 में SPQEM योजना लागू की गई.

मदरसों में ‘आधुनिक शिक्षा’ का भविष्य यूपी विधानसभा में भी सबसे गर्म बहस वाले विषयों में से एक बन गया है. 8 फरवरी को, स्वामी प्रसाद मौर्य और आशुतोष सिन्हा सहित समाजवादी पार्टी के नेताओं ने मदरसा आधुनिकीकरण योजना के निलंबन पर चर्चा के लिए नियमित विधानसभा कार्यवाही को रोकने के लिए एक प्रस्ताव पेश किया, जिसमें बताया गया कि प्रभावित शिक्षक हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों से हैं.

महताब आलम हापुड के पिलखुवा गांव में मदरसा इकरा पब्लिक स्कूल में गणित पढ़ाते हैं | हिना फातिमा/दिप्रिंट

विधान परिषद सदस्य आशुतोष सिन्हा सदन में गरजते हुए कहा, “राज्य ने जून 2023 में शिक्षकों का मानदेय बंद कर दिया. इससे ये शिक्षक भुखमरी के कगार पर आ गए हैं. इससे साबित होता है कि सरकार का नारा ‘एक हाथ में कुरान और एक हाथ में कंप्यूटर;’ झूठ था.” उन्होंने दावा किया कि कम पैसे मिलने की वजह से अब तक चार मदरसा शिक्षकों की मौत हो चुकी है.

मौर्य के मुताबिक प्रभावित शिक्षकों में 60 फीसदी हिंदू हैं. मौर्य ने विधान परिषद में पूछा, “हम युवा मुस्लिम बच्चों के हाथों से न केवल कंप्यूटर छीन रहे हैं, बल्कि किताबें भी छीन रहे हैं. शिक्षक बिना पारिश्रमिक के मदरसों में क्यों रहेंगे?”

जैसे ही शिक्षकों का विरोध तेज हुआ, अल्पसंख्यक मामलों के राज्य मंत्री धर्मपाल सिंह ने 8 फरवरी को विधान परिषद में इस मुद्दे को संबोधित किया और कहा कि सरकार शिक्षकों के लिए राज्य मानदेय के तहत धन जारी करेगी. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यालय ने भी केंद्र को पत्र लिखकर बकाया पारिश्रमिक जारी करने को कहा है.

वीरेंद्र मेरठ के ललियाना गांव में मदरसा फैज़-ए-आम प्राइमरी स्कूल में छात्रों की एक्स्ट्रा क्लास में अंग्रेजी पढ़ाते हैं | हिना फातिमा/दिप्रिंट

सिंह ने समाजवादी पार्टी के नेताओं पर केवल मुस्लिम वोटों से ही मतलब रखने का आरोप लगाया. मंत्री ने विधानसभा को संबोधित करते हुए कहा, “हम मुस्लिम बच्चों को मुख्यधारा में लाना चाहते हैं ताकि वे डॉक्टर, इंजीनियर और वैज्ञानिक बन सकें. मेरे कार्यालय और मुख्यमंत्री कार्यालय ने पारिश्रमिक के संबंध में केंद्र सरकार को पत्र लिखा है. केंद्र ने अब यह योजना बंद कर दी है. हम शिक्षकों को अब तक का बकाया पैसा चुकाएंगे.”

उत्तर प्रदेश सरकार में अल्पसंख्यक मामलों के राज्य मंत्री दानिश आज़ाद ने भी दिप्रिंट को इसी तरह का आश्वासन दिया.

उन्होंने कहा, “योगी आदित्यनाथ सरकार हमारे मदरसा शिक्षकों के हित में अपनी क्षमता से सब कुछ करेगी.” लेकिन उन्होंने कोई जानकारी साझा नहीं की या इस बारे में कोई ज़िक्र नहीं किया कि क्या आदित्यनाथ सरकार इस कमी को पूरा करने के लिए कोई नई पॉलिसी ला रही है.

इन वादों से न तो शिक्षक आश्वस्त हैं और न ही मदरसा समितियां. उनके लिए, यह अस्तित्व का सवाल है, खासकर अब जब उन्हें मानदेय नहीं मिल रहा है.

यूपी मदरसा बोर्ड के प्रमुख डॉ. जावेद ने कहा, “हजारों शिक्षक और छात्र कहां जायेंगे? क्या सरकार ने इस पर कोई विचार किया है?”

देवबंद में एक इस्लामी मदरसा जामिया तुश-शेख हुसैन अहमद मदनी में एक कक्षा के अंदर पढ़ते छात्र | हिना फातिमा/दिप्रिंट

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सरकार की नज़र

मदरसे भाजपा के लिए एक गंभीर राजनीतिक मुद्दा रहे हैं- हिंदू दक्षिणपंथी संगठनों ने इन स्कूलों को ‘आतंकवाद की फ़ैक्टरियां’ कहकर बदनाम किया है. असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा मदरसों के सबसे मुखर आलोचकों में से एक रहे हैं, और उन्होंने अपने राज्य में सैकड़ों मदरसों को बंद कर दिया है.

एसोसिएशन ऑफ मॉडर्न एजुकेटर्स इन यूपी मदरसा के अध्यक्ष अशरद अली ‘सिकंदर’ बाबा कहते हैं, ”अगर उन्हें (राजनीतिक नेताओं को) मदरसा शब्द से एलर्जी है, तो उन्हें नाम हटा देना चाहिए, लेकिन योजना बंद नहीं करनी चाहिए.” अली लखनऊ के इको पार्क में विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे हैं. उन्होंने कहा, “अगर यह योजना बंद हो गई तो यह मुस्लिम समुदाय की शिक्षा के लिए अच्छा नहीं होगा. हम कम्युनिटी गरीब है. गरीब युवा मुसलमानों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए यह योजना बहुत महत्वपूर्ण है.”

पिछले साल जून में यूपी के एक मदरसे में यौन शोषण की एक कथित घटना सामने आने के बाद मदरसे के प्रति विश्वास में और ज्यादा कमी आ गई थी, जिसके बाद राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने राज्य के मदरसों में एक सर्वेक्षण कराने का अनुरोध किया था. एआईएमआईएम अध्यक्ष और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने इसे ‘मिनी एनआरसी‘ एक्सरसाइज कहा.

तमन्ना हापुड के पिलखुवा गांव में मदरसा इकरा पब्लिक स्कूल में अंग्रेजी पढ़ाती हैं | हिना फातिमा/दिप्रिंट

डॉ इफ्तिखार अहमद ने कहा “पिछले छह वर्षों में कई मदरसा शिक्षकों को गुजारा करने के लिए छोटे-मोटे काम करने के लिए मजबूर होना पड़ा है. वे पंक्चर दुकानों, बढ़ई की दुकानों, या स्विगी और ज़ोमैटो जैसी खाद्य वितरण कंपनियों के लिए डिलीवरी एक्ज़ीक्युटिव के रूप में काम कर रहे हैं.”

मोहम्मद आरिफ़, जो लखनऊ के कमाल नगर में मदरसा फ़ैज़ी अली में हिंदी पढ़ाते हैं, 13 घंटे की शिफ्ट में काम करते हैं – एक मदरसे में शिक्षक के रूप में और फिर गुजारा करने के लिए ओला के लिए बाइक टैक्सी ड्राइवर के रूप में काम करते हैं. फिर भी, वह जो पैसा लाते हैं वह उनके परिवार के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त नहीं है.

उनके पिता ने उन्हें नौकरी छोड़ने के लिए कहा है और उनका, उनकी पत्नी और उनकी छह साल की बेटी, जो स्कूल नहीं जाती है, का भरण-पोषण करने से इनकार कर दिया है.

आरिफ कहते हैं, “हमारे पड़ोस में कोई मदरसा नहीं है, और मैं प्राइवेट स्कूलों की फीस वहन नहीं कर सकता. मैं इतने सारे बच्चों को पढ़ाता हूं लेकिन मैं अपने बच्चे को स्कूल भेजने में असमर्थ हूं.”

डॉ. जावेद अहमद ने भी 10 जनवरी 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री आदित्यनाथ को पत्र लिखकर इस योजना को जारी रखने और शिक्षकों का बकाया भुगतान करने का आग्रह किया था. वह कहते हैं, ”सरकार ने इस बारे में कोई विचार नहीं किया है कि योजना के अभाव में यह लाखों छात्र कहां जाएंगे.”

बानो अंग्रेजी होमवर्क के लिए सावधानीपूर्वक बनाई गई अपनी फ़ाइल दिखाती है, पेज के दोनों ओर एक गुलाब की टहनी दिखाई देती है. जैसे ही वह अपनी फाइल दिखाती है, उसकी टीचर खुश होकर कहती है: “हमारे बच्चे किसी भी प्राइवेट स्कूल की तरह ही होशियार हैं. मुझे उम्मीद है कि मैं उनसे जुड़ी रह पाऊंगी.”

(संपादनः शिव पाण्डेय)
(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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