scorecardresearch
Sunday, 24 May, 2026
होमविदेशआतंकवाद, व्यापार से ऊर्जा तक: भारत-अमेरिका साझेदारी मजबूत करने पर रुबियो-जयशंकर ने दिया जोर

आतंकवाद, व्यापार से ऊर्जा तक: भारत-अमेरिका साझेदारी मजबूत करने पर रुबियो-जयशंकर ने दिया जोर

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का कहना है कि भारत और अमेरिका, दोनों ही वैश्विक आतंकी नेटवर्कों से पीड़ित रहे हैं; व्यापार विवादों और पाकिस्तान के साथ अमेरिका की भागीदारी को लेकर भारत में कुछ चिंताएं होने के बावजूद, भारत अमेरिका के प्रमुख साझेदारों में से एक है.

Text Size:

नई दिल्ली: अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने रविवार को दिल्ली में संयुक्त प्रेस वार्ता में कहा कि भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी मजबूत बनी हुई है और दुनिया की घटनाओं को दिशा देने की क्षमता रखती है.

इस प्रेस वार्ता में वैश्विक संकटों से निपटने, आतंकवाद विरोधी सहयोग, बढ़ते व्यापारिक संबंधों और बहुपक्षीय कूटनीति के भविष्य पर चर्चा हुई. रूबियो ने व्यापार विवादों और पाकिस्तान के साथ वॉशिंगटन की नई सक्रियता को लेकर भारत की चिंताओं को कम करने की भी कोशिश की.

रूबियो ने कहा, “अमेरिका-भारत संबंधों की रफ्तार कम नहीं हुई है.” उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार नीति में बदलाव सिर्फ भारत के खिलाफ नहीं, बल्कि अमेरिका के वैश्विक आर्थिक रिश्तों को फिर से संतुलित करने की बड़ी कोशिश का हिस्सा है. रूबियो ने कहा, “हम एक नए द्विपक्षीय व्यापार समझौते की दिशा में बहुत बड़ी प्रगति करने के करीब हैं.”

चार दिन की भारत यात्रा पर आए रूबियो ने कहा कि आतंकवाद अब भी वॉशिंगटन और नई दिल्ली के बीच सबसे बड़ा साझा मुद्दा है.

हैदराबाद हाउस में प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता के बाद रूबियो ने कहा, “आतंकवाद 21वीं सदी की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है और इस मुद्दे पर हमारी रणनीतिक सोच एक जैसी है. हमारे दोनों देश वैश्विक आतंकी नेटवर्क की वजह से सीधे और परोक्ष रूप से प्रभावित हुए हैं.”

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि भारत “संबंधित एजेंसियों के मजबूत सहयोग” की सराहना करता है. उन्होंने खास तौर पर पिछले साल 26/11 मुंबई आतंकी हमलों के मुख्य आरोपियों में से एक तहव्वुर राणा को भारत लाए जाने का जिक्र किया.

रूबियो ने इस साझेदारी को सिर्फ क्षेत्रीय मुद्दों तक सीमित नहीं बताया. उन्होंने कहा, “हमारा नजरिया केवल क्षेत्रीय नहीं है.” उन्होंने कहा कि अमेरिका और भारत पश्चिमी गोलार्ध से लेकर होर्मुज जलडमरूमध्य तक कई मुद्दों पर साथ काम कर रहे हैं.

रूबियो ने कहा, “होर्मुज जलडमरूमध्य और उससे आगे की मौजूदा स्थिति में हमारी साझा रुचि है.”

उनकी टिप्पणियां इस बात का संकेत थीं कि दोनों सरकारें अब इस रिश्ते को सिर्फ एशिया में चीन के मुकाबले के रूप में नहीं, बल्कि दुनिया को प्रभावित करने वाली दो शक्तियों की रणनीतिक साझेदारी के रूप में देख रही हैं.

रूबियो ने कहा, “दुनिया में बहुत कम ऐसे देश हैं जिनके पास वैश्विक रणनीतिक मुद्दों को प्रभावित करने की आर्थिक और कूटनीतिक ताकत है. भारत उनमें से एक है.”

उन्होंने आगे कहा, “अमेरिका और भारत के बीच एक रणनीतिक गठबंधन है. यह दुनिया को प्रभावित करने की क्षमता रखने वाले दो देशों का गठबंधन है.”

रूबियो ने समुद्री आजादी और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के प्रति साझा प्रतिबद्धता पर भी जोर दिया. उनकी यह टिप्पणी विवादित समुद्री रास्तों को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच आई.

उन्होंने कहा, “हम इस रणनीतिक सिद्धांत को साझा करते हैं कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय समुद्री रास्ते या हवाई क्षेत्र पर किसी एक देश का नियंत्रण या कब्जा नहीं होना चाहिए.”

यह बयान ऐसे समय आया है जब वॉशिंगटन और नई दिल्ली पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच सुरक्षित समुद्री व्यापार मार्गों और स्थिर वैश्विक ऊर्जा बाजारों की जरूरत पर जोर दे रहे हैं.

जयशंकर ने कहा कि भारत की ऊर्जा रणनीति अब “जोखिम कम करने” और विविधता बढ़ाने पर आधारित है. उन्होंने अमेरिका को “ऊर्जा का बहुत महत्वपूर्ण और भरोसेमंद स्रोत” बताया.

जयशंकर ने कहा, “हमारी ऊर्जा सुरक्षा के लिए जरूरी है कि हमारे पास कई बड़े, सस्ते और भरोसेमंद स्रोत हों.”

जयशंकर के लिए मुख्य विषय था, टकरावों से भरे इस दौर में भारत की “मल्टी-अलाइनमेंट” यानी कई देशों के साथ संतुलित रिश्तों की नीति.

उन्होंने कहा, “भारत उन कुछ देशों में है जिनके अमेरिका, इजराइल और ईरान तीनों के साथ मजबूत संबंध हैं. हम इसे जीरो-सम गेम की तरह नहीं देखते.”

मल्टी-अलाइनमेंट पर सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि भारत की चुनौती अलग-अलग गुटों के साथ रिश्ते बनाए रखते हुए अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों को आगे बढ़ाना है.

उन्होंने कहा, “सवाल यह है कि आप इन सबको कैसे संभालते हैं.” वह यूक्रेन युद्ध के बीच रूस, यूरोप, यूक्रेन और अमेरिका के साथ भारत के संबंधों की बात कर रहे थे.

उन्होंने आगे कहा, “इस मायने में हां, यह मल्टी-अलाइनमेंट है, क्योंकि आज के भारत के कई हित हैं और इसके लिए हमें कई रिश्तों को संभालना पड़ता है.”

जयशंकर ने पश्चिम एशिया में भारत की कूटनीति के व्यावहारिक पहलुओं का भी जिक्र किया. इनमें क्षेत्रीय स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी भारतीयों का हित और व्यापारिक रास्तों का बिना रुकावट चलना शामिल है.

उन्होंने कहा, “हम क्षेत्र में शांति और स्थिरता चाहते हैं. प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और भलाई बहुत महत्वपूर्ण है.”

दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा आयातकों में से एक भारत क्षेत्रीय अस्थिरता का तेल बाजारों पर असर भी करीब से देख रहा है. जयशंकर ने कहा, “हम चाहते हैं कि ऊर्जा की कीमतें कम हों, क्योंकि हम बड़े आयातक हैं और हमारी काफी ऊर्जा उसी क्षेत्र से आती है.” उन्होंने कहा कि भारत “सुरक्षित और बिना रुकावट समुद्री व्यापार” और खुले बाजार चाहता है.

रूबियो ने अमेरिका में आव्रजन के मुद्दे पर भी बात की, जो वहां राजनीतिक रूप से विवादित विषय है. साथ ही उन्होंने भारतीयों को भविष्य में कुशल कामगारों के लिए अवसरों को लेकर भरोसा दिलाने की कोशिश की.

रूबियो ने कहा, “अमेरिका में आव्रजन संकट था. यह भारत की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में 2 करोड़ से ज्यादा लोग अवैध तरीके से अमेरिका में दाखिल हुए.”

उन्होंने कहा कि वॉशिंगटन “21वीं सदी के हिसाब से अमेरिकी आव्रजन प्रणाली को आधुनिक बना रहा है.” उन्होंने संकेत दिया कि नया सिस्टम कुशल भारतीय कामगारों के लिए “और ज्यादा फायदेमंद” हो सकता है.

अमेरिका में भारतीयों के खिलाफ नस्लीय टिप्पणियों और इस आरोप पर कि ट्रंप ने ऐसे माहौल को बढ़ावा दिया, रूबियो ने इसे खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि दोनों देशों में “कुछ बेवकूफ लोग बेवकूफी भरी बातें करते हैं”, लेकिन ऐसे बयान दोनों देशों के रिश्तों को तय नहीं करते.

रूबियो ने पश्चिम एशिया संघर्ष में संभावित कूटनीतिक सफलता का भी संकेत दिया, हालांकि उन्होंने ज्यादा जानकारी नहीं दी. उनकी यह टिप्पणी ट्रंप के उस बयान के तुरंत बाद आई जिसमें उन्होंने कहा था कि वॉशिंगटन ईरान के साथ मौजूदा युद्धविराम को 60 दिन और बढ़ाने के समझौते के करीब है.

रूबियो ने कहा, “राष्ट्रपति हमेशा से चाहते रहे हैं कि इन समस्याओं का समाधान कूटनीति से हो. वह चाहते हैं कि विदेश मंत्रालय इस मुद्दे को हल करे, न कि सैन्य संघर्ष के जरिए.”

उन्होंने कहा कि पिछले दो दिनों में अमेरिका ने खाड़ी क्षेत्र के साझेदार देशों के साथ मिलकर काम किया है और ऐसे संभावित समझौते की दिशा में प्रगति हुई है जिससे होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही खुली रह सके और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंताओं का समाधान भी हो सके.

रूबियो ने उम्मीद जताते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस साल के आखिर में वॉशिंगटन का दौरा करेंगे. उन्होंने भारत को अमेरिका के “दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारों में से एक” बताया.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: कॉम्प्रिहेंसिव, स्पेशल, प्रिविलेज्ड: भारत की विदेश नीति में इन शब्दों का क्या मतलब है?


 

share & View comments