Monday, 27 June, 2022
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महाराष्ट्र में बिजली संकट के लिए कौन जिम्मेदार, राज्य सरकार केंद्र पर तो BJP ने MVA को ठहराया दोषी

बीजेपी लोड-शेडिंग के लिए गठबंधन सहयोगियों कांग्रेस और एनसीपी के बीच के 'आंतरिक कलह' को जिम्मेदार ठहरा रही है. तो वहीं एमवीए सरकार ने इसका दोष मोदी सरकार और बिजली की बढ़ती मांग पर मढ़ा है..

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मुंबई: महाराष्ट्र इस महीने भीषण गर्मी और बिजली कटौती की दोहरी मार झेलने के लिए मजबूर है. उधर राज्य में मौजूदा बिजली संकट के लिए विपक्षी दल भाजपा ने महा विकास अघाड़ी (एमवीए) के नेतृत्व वाली राज्य सरकार के भीतर ‘दरार’ को इसके लिए दोषी ठहराया है.

भाजपा ने आरोप लगाया है कि कांग्रेस के पास ऊर्जा विभाग है और राकांपा के पास राजस्व मंत्रालय. इन दोनों के बीच विवाद की वजह से सूबे में बिजली संकट गहराता जा रहा है. इससे राज्य में अघोषित बिजली कटौती शुरू हो गई है.

चंद्रशेखर बावनकुले ने कहा, ‘कांग्रेस और राकांपा के बीच अंदरूनी विवाद के चलते ऊर्जा विभाग के लिए धन जारी नहीं हो सका है … , इसी लापरवाही के कारण राज्य को लोड-शेडिंग का सामना करना पड़ रहा है’ बावनकुले भाजपा के देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली पिछली सरकार में राज्य के बिजली मंत्री थे. उन्होंने इस महीने की शुरुआत महाराष्ट्र में ऊर्जा विभाग और राजस्व मंत्रालय के विवाद की वजह से सूबे में बिजली संकट की बात कही थी. उन्होंने बुधवार को एक प्रेस नोट में अपने इन्हीं आरोपों को एक बार फिर से दोहराया है.

कांग्रेस के मंत्रियों और विधायकों ने राकांपा नियंत्रित राज्य वित्त विभाग से पर्याप्त धन नहीं मिलने की शिकायत तो की है. लेकिन भाजपा के इन आरोपों को खारिज करते हुए वे एकजुट नजर आ रहे हैं. दोनों दलों ने केंद्र पर कोयले की कमी का आरोप लगाया है.

महाराष्ट्र सरकार ने 2012 में राज्य को लोड-शेडिंग से मुक्त घोषित कर दिया था. जिन जगहों पर उपभोक्ता नियमित रूप से अपने बिलों का भुगतान करने में विफल थे बस उन्हीं कुछ जगहों पर बिजली कटौती की जा रही थी.

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गर्मियों की समय से पहले शुरुआत, अपर्याप्त कोयले की आपूर्ति और कोविड-19 लॉकडाउन के बाद से बिजली की बिजली की मांग में भारी उछाल का हवाला देते हुए महाराष्ट्र राज्य विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड (MSEDCL) पिछले एक महीने में कुछ नियोजित और अस्थायी बिजली कटौती का सहारा ले रही है.

हालांकि 23 अप्रैल के बाद से कोई लोड-शेडिंग नहीं हुई है. मगर मुंबई के कई हिस्सों में ट्रांसमिशन लाइनों के ट्रिपिंग के कारण इस सप्ताह दो बार बिजली कटौती का सामना करना पड़ा है.


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आरोप-प्रत्यारोप का खेल गरमाया

बावनकुले ने इस महीने की शुरुआत में आरोप लगाया था कि MSEDCL के पास कोयला खरीदने या बिजली खरीदने के लिए खुले बाजार में टेंडर निकालने के लिए पैसे नहीं हैं.

उन्होंने, एनसीपी को ऊर्जा विभाग को धन जारी नहीं करने के लिए जिम्मेदार ठहराया और कहा कि इसी वजह से लोड-शेडिंग जैसे रास्ते अपनाए जा रहे हैं.

बुधवार को जारी अपने ताजा प्रेस नोट में बावनकुले ने कोयले की कमी का रोना रोकर केंद्र के ‘पाले में बॉल डालने’ के लिए एमवीए सरकार की भी आलोचना की.

उन्होंने बताया कि 2015 में मोदी सरकार ने छत्तीसगढ़ की गारे पाल्मा खदान से कोयला लेने की अनुमति दे दी थी और 2019 तक कागजी कार्रवाई भी पूरी कर ली गई. उस समय बावनकुले बिजली मंत्री थे. उन्होंने दावा किया कि नवंबर 2019 में एमवीए सरकार के सत्ता में आने के बाद से उसने छत्तीसगढ़ से कोई कोयला खनन नहीं किया है.

बावनकुले ने कहा, ‘सरकार पूरी तरह से अक्षम है और अपनी नाकामियों को बोझ केंद्र पर डाल रही है. इस खदान से 4,000 मेगावाट बिजली का उत्पादन होता है. लेकिन पार्टी के अंदरूनी विवाद के चलते एमवीए सरकार ने खदान का उपयोग बिल्कुल नहीं किया है.’

बावनकुले के ये बयान कांग्रेस विधायकों की उन शिकायतों के बाद आए हैं जिसमें उन्होंने गठबंधन एमवीए में तीसरे पहिये की तरह महसूस किए जाने की बात कही थी.

कांग्रेस नेता और राज्य के बिजली मंत्री नितिन राउत ने कोयले की कमी के लिए केंद्र को जिम्मेदार ठहराया है. लेकिन उन्होंने बिजली के लंबित बिलों के लिए राज्य सरकार के विभिन्न विभागों की भी आलोचना की.

MSEDCL के पास सभी श्रेणियों के उपभोक्ताओं, आवासीय, कमर्शियल, इंडस्ट्रियल और कृषि से 64,093 करोड़ रुपये का बकाया है. इसके अलावा ग्रामीण विकास और शहरी विकास जैसे सरकारी विभागों ने भी कुछ बिलों का भुगतान नहीं किया है.

दिप्रिंट ने कई बार फोन कॉल और टेक्स्ट संदेशों के जरिए राउत से संपर्क करने कोशिश की, लेकिन अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है.

कांग्रेस और राकांपा के प्रवक्ताओं ने दोनों दलों के बीच दरार के आरोपों का जवाब नहीं दिया, लेकिन वे पर्याप्त कोयला उपलब्ध नहीं कराने के लिए केंद्र पर आरोप लगाने में एकजुट दिखे.

एनसीपी प्रवक्ता महेश तापसे ने कहा, ‘बिजली संकट सिर्फ महाराष्ट्र में नहीं, बल्कि 10 से 12 अन्य राज्यों में भी है. ऐसा इसलिए है क्योंकि क्योंकि भारत सरकार समय पर कोयला आवंटन नहीं कर पाई… कोयले का राज्य सरकार से कोई लेना-देना नहीं है.’ उन्होंने इसके लिए ‘भीषण गर्मी’ के कारण बिजली की बढ़ती मांग की ओर भी इशारा किया.

प्रदेश कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता अतुल लोंधे ने भी ऐसी ही दलीलें दीं.

उन्होंने कहा, ‘कोयला की आपूर्ति केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है. महाराष्ट्र इस संकट का सामना करने वाला अकेला राज्य नहीं है. गुजरात समेत हर जगह लोड शेडिंग हो रही है. यूपी भी चार घंटे बिजली सप्लाई कर रहा है. यह केंद्र सरकार की गलती है.’

‘भीषण गर्मी, आपूर्ति की कमी से संकट’

ऊर्जा विभाग के एक अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया कि लॉकडाउन के बाद से औद्योगिक गतिविधियों बढ़ने और समय से पहले गर्मियों की शुरुआत होने की वजह से फरवरी में ही बिजली की मांग तेजी से बढ़ गई और बिजली संकट गहरा गया.

पिछले दो महीनों में महाराष्ट्र पहले ही तीन हीटवेव का सामना कर चुका है. फिलहाल चौथी हीटवेव का दंश विदर्भ झेल रहा है.

ऊर्जा विभाग के एक अधिकारी ने कहा, ‘आम तौर पर राज्य को हर दिन 18,000-19000MW बिजली की जरूरत होती है. लेकिन अब डिमांड लगभग 20 फीसदी बढ़ गई है. मौजूदा समय में बिजली की मांग 24,000-26,000MW के बीच है.

ऊर्जा विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, मुंबई को छोड़कर, 28 मार्च से 14 अप्रैल तक पूरे राज्य में करीब डेढ़ घंटे तक लोड शेडिंग रही.

बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए, महाराष्ट्र कैबिनेट ने 8 अप्रैल को टाटा पावर की सहायक कंपनी कोस्टल गुजरात पावर से 760MW बिजली की खरीद को मंजूरी दी. लेकिन इससे समस्या का समाधान नहीं हो पाया है. राज्य में रुक-रुक कर लोड-शेडिंग की जा रही है. हालांकि 23 अप्रैल के बाद बिजली कटौती नहीं की गई है. MSEDCL बस किसी तरह से ‘पीक डिमांड’ को पूरा कर पा रहा है.

आने वाले महीने में पारा और अधिक बढ़ने की संभावना है. ऊर्जा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि बिजली की डिमांड बढ़कर 28,000 मेगावाट प्रति दिन हो सकती है.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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