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Monday, 22 July, 2024
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IAS अधिकारी और BJP कैंडीडेट परमपाल कौर सिद्धू का इस्तीफा हुआ स्वीकृत, यह VRS से कैसे अलग है

उन्होंने पहले स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन किया था, लेकिन पंजाब सरकार ने उनके अनुरोध को अस्वीकार कर दिया था. हालांकि उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया है, जिसकी वजह से उन्हें पेंशन और अन्य सुविधाएं नहीं मिलेंगी.

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नई दिल्ली: पूर्व आईएएस अधिकारी परमपाल कौर सिद्धू का इस्तीफा स्वीकार होने और पंजाब सरकार द्वारा अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) जारी करने के बाद बठिंडा संसदीय सीट से भाजपा उम्मीदवार के रूप में नामांकन दाखिल करने का रास्ता साफ हो गया है.

बठिंडा में सातवें चरण में 1 जून को मतदान होना है.

2011 बैच की पंजाब काडर की आईएएस अधिकारी का इस्तीफा कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) ने स्वीकार कर लिया, जिसने सिद्धू को एनओसी जारी करने के लिए शुक्रवार को पंजाब सरकार को लिखा था.

अकाली दल के नेता सिकंदर सिंह मलूका की पुत्रवधू सिद्धू ने पहले स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन किया था, लेकिन पंजाब सरकार ने इसे इस आधार पर खारिज कर दिया था कि उन्होंने गलत विवरण दिया था और उन्हें वापस ज्वाइन करने का निर्देश दिया.

नामांकन दाखिल करने का समय तेजी से समाप्त होने के मद्देनज़र सिद्धू ने 8 मई को सेवा से इस्तीफा दे दिया.

तो, वीआरएस इस्तीफे से कैसे अलग है? दिप्रिंट आपको बता रहा है कि स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति और इस्तीफे के बीच क्या अंतर है.

अगर सिद्धू का वीआरएस स्वीकार कर लिया गया होता, तो वह अखिल भारतीय सेवा (मृत्यु-सह-सेवानिवृत्ति लाभ) नियम, 1958 के नियम 17(1) के अनुसार सेवानिवृत्ति पेंशन और मृत्यु-सह-सेवानिवृत्ति ग्रेच्युटी की हकदार होती.

नियम 16(2) कहता है कि सेवा का कोई सदस्य कम से कम 30 वर्षों तक काम करने के बाद या जब वे 50 वर्ष के हो जाएं, तो राज्य सरकार को तीन महीने का नोटिस देकर अपनी नौकरी से सेवानिवृत्त हो सकते हैं. हालांकि, यदि सदस्य निलंबित है, तो वे केंद्र सरकार की मंजूरी के बिना सेवानिवृत्त नहीं हो सकते. लेकिन, यदि सदस्य कहता है, तो राज्य सरकार नोटिस की अवधि कम कर सकती है, यदि उनके पास कोई अच्छा कारण हो और लिखित में स्पष्टीकरण हो.

जबकि, नियम 16(2ए) कहता है कि सेवा का कोई भी सदस्य 20 साल तक काम करने के बाद राज्य सरकार को तीन महीने का नोटिस देकर सेवानिवृत्त हो सकता है. यदि वे इस नियम द्वारा दी गई अनुमति से पहले सेवानिवृत्त होना चाहते हैं, तो उन्हें केंद्र सरकार से मंजूरी लेनी होगी. इसके अलावा, यदि वे किसी सरकारी स्वामित्व वाले निगम के लिए काम कर रहे हैं, तो वे स्थायी रूप से इसमें शामिल होने के लिए सेवानिवृत्त नहीं हो सकते हैं. इसके अतिरिक्त, विशिष्ट क्षेत्रों के सदस्य 15 साल की सेवा के बाद सेवानिवृत्त हो सकते हैं.

इसके अलावा, अखिल भारतीय सेवा (मृत्यु-सह-सेवानिवृत्ति लाभ) नियम, 1958 के 17(1) के अनुसार, “सेवा के उस सदस्य को सेवानिवृत्त पेंशन और मृत्यु-सह-सेवानिवृत्ति ग्रेच्युटी प्रदान की जाएगी जो सेवानिवृत्त होता है या जैसा कि ऊपर उल्लिखित है, नियम 16 के अंतर्गत सेवानिवृत्त होना चाहता है.

वीआरएस के विपरीत, यदि कोई अधिकारी इस्तीफा देता है, तो वह सेवानिवृत्ति लाभ का हकदार नहीं है. तीन अखिल भारतीय सेवाओं में से किसी एक के अधिकारी का इस्तीफा अखिल भारतीय सेवा (मृत्यु-सह-सेवानिवृत्ति लाभ) नियम, 1958 के नियम 5(1) और 5(1)(ए) द्वारा शासित होता है.

मृत्यु-सह-सेवानिवृत्ति लाभ (डीसीआरबी) नियमों के नियम 5(1) में कहा गया है, “सेवा से इस्तीफा देने वाले व्यक्ति को कोई सेवानिवृत्ति लाभ नहीं दिया जा सकता है.” हालांकि यदि परिस्थितियां वास्तव में कठिन हैं तो राज्य सरकार उन्हें अनुकंपा भत्ता दे सकती है. यह भत्ता उस भत्ते का दो-तिहाई तक हो सकता है जो उन्हें नौकरी से निकाले जाने या हटाए जाने के बजाय सेवानिवृत्त होने पर मिलता.

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में कहा था कि स्वेच्छा से सेवानिवृत्त होने वालों के विपरीत अगर सरकारी कर्मचारी सेवा से इस्तीफा देते हैं तो वे पेंशन के हकदार नहीं हैं. इसमें कहा गया था कि इस्तीफे की स्थिति में पूरी पिछली सेवा जब्त कर ली जाएगी और परिणामस्वरूप, कोई कर्मचारी पेंशन के लिए पात्र नहीं होगा.

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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