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मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान । गेटी
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मध्य प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस की धार्मिक सियासत के बीच विस्थापन, आदिवासी अधिकार, कुपोषण, भुखमरी, रेत खनन, व्यापमं घोटाला, महिला सुरक्षा, किसानों की बदहाली जैसे मुद्दे कहीं गुम हो गए हैं.

नई दिल्ली: मध्य प्रदेश में करीब 15 साल पहले 2003 में जब विधानसभा चुनाव हो रहे थे तब गली-गली में नारा गूंज रहा था, ‘पानी-सड़कें-बिजली गोल, दिग्गी तेरी खुल गई पोल.’ कांग्रेस के 10 साल के शासन से उपजे सत्ता विरोधी लहर में भाजपा का यह नारा बहुत लोकप्रिय हुआ था. उस समय भाजपा के प्रचार टीम की अगुआई भगवा पहनने वाली उमा भारती कर रही थी लेकिन चुनाव के केंद्र में सड़क, बिजली और पानी जैसी आधारभूत समस्याएं थीं.

मध्य प्रदेश में अब 2018 में एक बार फिर विधानसभा चुनाव हो रहे हैं. पिछले 15 सालों से यहां भाजपा की सरकार है लेकिन अभी का परिदृश्य अलग दिख रहा है. प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी की भूमिका में अब कांग्रेस है. फिलहाल कांग्रेस का कोई शीर्ष नेता भगवा नहीं पहनता है और हर नेता जनता की समस्याओं को उठाने की बात कर रहा है लेकिन एक नजर हम पिछले कुछ महीनों में उनके भाषणों और जनता द्वारा उठाए गए नारों पर डाल लेते हैं.

सबसे पहले चर्चा कांग्रेसी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की करते हैं. चुनावी साल की शुरुआत होने से पहले 30 सितंबर 2017 को दिग्विजय सिंह नर्मदा परिक्रमा पदयात्रा पर निकल गए जो 192 दिन तक चली और 9 अप्रैल 2018 को समाप्त हुई. उन्होंने इसे धार्मिक यात्रा बताया और कहा कि यह राजनीति से दूर है लेकिन उनकी इस यात्रा में राजनीतिक यात्रा के वो सारे तत्व मौजूद थे जो होने चाहिए.

फिलहाल विपक्षी पार्टी द्वारा इसके बाद भी चुनावी साल में बहुत सारे अभियान और यात्राएं हुईं जिनकी एक बानगी हम देख लेते हैं. जब प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष कमलनाथ को बनाया गया तो वो सबसे पहले दतिया के पीतांबरा पीठ मंदिर दर्शन को पहुंचे. दिग्विजय सिंह ने अभी कुछ महीने पहले समन्वय यात्रा की शुरुआत ओरछा के राम राजा मंदिर से की.


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ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने चुनावी अभियान की शुरुआत महाकालेश्वर मंदिर में पूजा अर्चना से की. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी प्रदेश में जहां भी दौरे पर जा रहे हैं तो उस स्थान विशेष के प्रसिद्ध किसी मंदिर से ही अपना प्रचार शुरू करते हैं. पार्टी ने राहुल गांधी की कैलाश मानसरोवर यात्रा को भी इस चुनाव में खूब भुनाया. इस दौरान शिव भक्त राहुल, राम भक्त राहुल, नर्मदा भक्त राहुल के नारों से कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने ख़ूब प्रचार किया.

अब कांग्रेस की कुछ घोषणाओं और यात्राओं पर नजर डाल लेते हैं. बीते दिनों मध्य प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष कमलनाथ ने घोषणा की कि अगर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनती है तो लगभग 23,000 ग्राम पंचायतों में गोशालाओं का निर्माण कराया जाएगा. हर ग्राम पंचायत में एक गोशाला बनेगी. जो विज्ञापन कमलनाथ की ओर से जारी किया गया उसमें लिखा था, ‘प्रदेश की हर पंचायत में गोशाला बनाएंगे, ये घोषणा नहीं, वचन है.’ साथ ही कांग्रेस ने प्रदेश में सरकार बनने पर नर्मदा परिक्रमा पथ निर्माण, राम गमन पथ निर्माण बनाने जैसा वादा कर रखा है.

अब कभी बिजली, पानी और सड़क जैसी आधारभूत समस्याओं को उठाकर सरकार में पहुंची भाजपा के नेताओं की चर्चा कर लेते हैं. प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान दिसंबर 2016 में नर्मदा सेवा यात्रा की शुरुआत करते हैं. इसके बाद वह दिसंबर 2017 में ‘एकात्म यात्रा’ पर निकल पड़े. उन्होंने एक महीने तक आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत के सिद्धांत के प्रचार के नाम पर प्रदेश भर में घूमकर सभाएं कीं. प्रदेशभर के संतों को अपने मंच पर जुटाया और उन्हें विभिन्न ज़िम्मेदारियां दीं.

इतना ही नहीं शिवराज ने अप्रैल माह में पांच संतों को राज्यमंत्री का दर्जा तक दे दिया था. ये संत नर्मदानंद महाराज, हरिहरानंद महाराज, कम्प्यूटर बाबा, भय्यूजी महाराज और पंडित योगेंद्र थे. शिवराज चौहान ने प्रदेश में अपने चुनावी अभियान जन आशीर्वाद यात्रा की शुरुआत उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर से की. तमाम चुनावी घोषणाओं के साथ मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश में गोमंत्रालय बनाया जाएगा जिससे गो-वंश की सेवा और उनकी सुरक्षा के लिए बेहतर तरीके से काम किया जा सकेगा.

यह उस मध्य प्रदेश के दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के चुनावी सरगर्मियां हैं जहां पर बिजली, पानी और सड़क के अलावा विस्थापन, आदिवासी अधिकार, कुपोषण, भुखमरी, रेत खनन, व्यापमं घोटाला, महिला सुरक्षा, किसानों की बदहाली जैसी समस्याएं मुंह बाये खड़ी हैं. प्रदेश में उधोग धंधों की बेहद कमी है, लेकिन विकास के मुद्दे से मध्य प्रदेश चुनाव दूर है.

कांग्रेस प्रवक्ता रवि सक्सेना कहते हैं, ‘हमारे नेता हर मंच से ये बातें उठा रहे हैं. मध्य प्रदेश कुपोषण में नंबर वन है. छोटी बच्चियों से बलात्कार में मध्य प्रदेश नंबर वन पर है. किसान आत्महत्या में तीसरे नंबर पर है. भ्रष्टाचार में नंबर दो है. वहीं, स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल हैं. नीति आयोग की गरीबी के नए आंकलन में चौथे नंबर पर है. इन सारी बातों को हम उठा रहे हैं. रोज हम एक सवाल पूछ रहे हैं, लेकिन सरकार जवाब नहीं दे रही है. आप स्वर्णिम मध्य प्रदेश की बात कर रहे हैं लेकिन सामाजिक सूचकांक कुछ और ही हालत बयां कर रहे हैं.’

निसंदेह मंदिर-मस्जिद जाने के अलावा कांग्रेसी नेता इन सवालों को उठा रहे हैं. सोशल साइट ट्विटर पर भी मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ’40 दिन, 40 सवाल’ पूछ कर राज्य की सत्तारूढ़ भाजपा सरकार को घेर रही है, लेकिन क्या यह काफी है?

ग्वालियर में रहने वाले स्थानीय पत्रकार दीपक गोस्वामी कहते हैं, ’इस बात में कोई संदेह नहीं है कि कांग्रेस सवाल उठा रही है लेकिन वह इस गंभीरता से नहीं उठा रही है कि जन-जन के जुबान पर उनकी बातें आ जाएं. अखबारों में उनके भगवा छवि की चर्चा हो रही है. जनता उसी के बारे में बात कर रही है. अब ट्विटर पर सवाल पूछकर आप सत्तारूढ़ भाजपा को कितना नुकसान पहुंचा पाएंगें, वह भी तब जब भाजपा की सोशल मीडिया टीम खुद बहुत मजबूत है और दूसरी बात सिर्फ सवाल पूछने से आपकी जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाएगी. आपको साथ में जनता को यह भी बताना होगा कि आप जब सत्ता में आएंगें तो इन समस्याओं से कैसे निजात दिलाएंगें. आपका विकास का रोडमैप क्या होगा? लेकिन ये बात कांग्रेस के चुनावी कैंपेन से गायब है. बस वह प्रदेश की हर पंचायत में गोशाला बनाने का वादा कर रही है.’


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वो आगे कहते हैं, ’कभी बिजली, पानी और सड़क के मुद्दे पर जीतकर सत्ता में आई भाजपा अपने चुनावी अभियान में अपनी सफलताएं गिना रही है, अपने द्वारा किए गए विकास पर चर्चा कर रही है लेकिन वह चालाकी से उन वादों का जिक्र नहीं कर रही है जो उसने पूरे ही नहीं किए हैं. जैसे कुपोषण पर श्वेत पत्र लाने का वादा किया था लेकिन नहीं लाई. वह इससे बचने के लिए मंदिरों, नदियों और संतों का सहारा ले रही है. अपनी कुछ उपलब्धियां गिनाने के अलावा भविष्य के मध्य प्रदेश का प्लान उनके पास भी नहीं है.’

यानी मध्य प्रदेश में दोनों राजनीतिक दल जनता से सरोकारों से जुड़े चुनावी मुद्दों का सिर्फ उतना इस्तेमाल कर रहे हैं जिससे उनका काम चल जाए. फिलहाल अब मध्य प्रदेश में मतदान की तारीख आने को बमुश्किल 20 दिन ही बचे हैं लेकिन अभी तक भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों में अपना चुनावी घोषणापत्र जारी नहीं किया है.

वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं, ’कांग्रेस और भाजपा के पास विकास को लेकर अलग-अलग स्वस्थ एजेंडा नहीं हैं. यही कारण है कि भाजपा चाहती है कि भावानात्मक मुद्दों पर लोग उसे एक बार फिर मौका दें. कांग्रेस की समस्या ये है कि वह अब कुछ भी छोड़ना नहीं चाहती है.’

वो आगे कहते हैं, ’मध्य प्रदेश में किसानों की चर्चा थोड़ी बहुत हो रही है लेकिन सरकारें और विपक्ष दोनों संवेदनशील नहीं हैं. सरकार ने किसान आंदोलनों पर क्या किए उसे छोड़ दीजिए कांग्रेस के पास 10 ऐसे किसान नेता नहीं हैं जो इस मसले को सही ठंग से समझते हैं. उनके पास अपनी कोई अलग कृषि नीति नहीं है. अब जैसे बात नौकरियों की करते हैं. नई आर्थिक नीति के आने के बाद से भाजपा और कांग्रेस दोनों यह मानने लगी हैं सरकार के पास नौकरियां नहीं हैं. तो कांग्रेस के पास कुछ अलग नहीं है. अब वह सिर्फ सरकार को घेरने के लिए कहती है कि मोदी ने एक करोड़ नौकरियां देने का वादा किया था, शिवराज ने नौकरियां नहीं दी लेकिन वह भी कोई रोडमैप नौकरियों की नहीं दे रही है तो ऐसे मसलों पर चुप ही रहती है. अब हमारा समाज भावानात्मक है तो दोनों इसी आसान मुद्दे के इर्द गिर्द राजनीति कर रहे हैं.’

फिलहाल मध्य प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस हिंदू-मुस्लिम, मंदिर मस्जिद जैसे भावानात्मक मुद्दों के सहारे अपनी नैया पार लगाने का सपना देख रही है. इसकी बानगी इस दौरान दोनों ही दलों की कार्यप्रणाली, नीतियों और घोषणाओं में देखी जा सकती है. मध्य प्रदेश में विकास और दूसरे जनसरोकार से जुड़े मसले कहीं गुम हैं.


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