Monday, 8 August, 2022
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2024 पर टिकी मायावती की नजर, राष्ट्रपति चुनाव, UP उपचुनाव में BJP की ‘मदद’ के पीछे क्या है असल खेल

बसपा प्रमुख मायावती अपने राजनीतिक जनाधार की कीमत पर भाजपा का समर्थन करती दिख रही हैं और ये समर्थन एकतरफा नहीं लग रहा.

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नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश में पिछले हफ्ते हुए लोकसभा सीटों पर चुनाव में भाजपा ने आजमगढ़ और रामपुर दोनों सीटें समाजवादी पार्टी (सपा) से छीन लीं. इन सीटों को कभी सपा प्रमुख अखिलेश यादव और पार्टी के दिग्गज नेता आजम खान का गढ़ माना जाता था.

ऐसा लगता है कि भाजपा को इस जीत के लिए बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती का शुक्रगुजार होना चाहिए.

मायावती ने रामपुर में दलित वोटों का विभाजन रोकने के लिए बसपा उम्मीदवार को मैदान में नहीं उतारा, इससे इस सीट पर भाजपा और सपा के बीच सीधे मुकाबले की स्थिति बन गई. आजमगढ़ में उन्होंने एक मुस्लिम उम्मीदवार गुड्डू जमाली को मैदान में उतारा. माना जा रहा है कि इसका मकसद सपा के मुस्लिम वोट बैंक को बांटना और ओबीसी यादव समुदाय के भाजपा प्रत्याशी दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ को लाभ पहुंचाना था.

रामपुर में भाजपा के एक अन्य ओबीसी उम्मीदवार घनश्याम लोधी ने सपा के असीम रजा को 42,192 मतों से हराया.

लखनऊ स्थित बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर शशि कांत पांडे ने दिप्रिंट से बात करते हुए कहा, ‘मायावती जानती हैं कि वह सिर्फ जाटव-दलित वोटों से चुनाव नहीं जीत सकतीं.’

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उन्होंने कहा, ‘अन्य गैर-जाटव दलित पहले ही भाजपा में चले गए हैं. यूपी में चुनाव जीतने के लिए ऊंची जातियों खासकर ब्राह्मणों को लुभाने का उनका प्रयास विफल रहा है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘अब, 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले उनका तात्कालिक उद्देश्य सपा को कमजोर करना और अपने कार्यकर्ताओं को यह संदेश देना है कि दलित-मुस्लिम एकता हो सकती है, मुसलमान सपा से दूर जा रहे हैं और मुसलमान कोई सपा की बपौती नहीं हैं. अगर वह लोकसभा चुनाव में मुस्लिम वोटों का एक हिस्सा अपने खेमे में लाने में सफल रहती हैं, तो यह मायावती के लिए एक बड़ी जीत होगी.’

उपचुनाव नतीजों से पहले शनिवार को मायावती ने भाजपा के पक्ष में एक और फैसला लिया और वो यह कि बसपा राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के तौर पर एनडीए प्रत्याशी द्रौपदी मुर्मू को समर्थन करेगी. उन्होंने अपना फैसला सही ठहराते हुए कहा कि आदिवासी पूर्व में बसपा के आंदोलनो का एक अहम हिस्सा रहे हैं.

ये अकेले उदाहरण नहीं हैं जिसमें कभी दलित पहचान की राजनीति की चैंपियन और यूपी में एक प्रमुख पार्टी बसपा के लिए फैसलों से सीधे तौर पर भाजपा को फायदा हुआ हो.

पांडे के मुताबिक, अन्य बातों के अलावा, इसका एक कारण संभवत: यह भी है कि मायावती ‘केंद्रीय एजेंसियों की जांच से बचने के लिए’ भाजपा के पक्ष में खड़ी दिखना चाहती हैं.

पांडे ने कहा, ‘उम्र के इस पड़ाव पर आकर उनमें केंद्रीय एजेंसियों और एक ताकतवर पार्टी बन चुकी भाजपा के खिलाफ लड़ने का दृढ़ संकल्प नहीं बचा है. अपना उत्तराधिकारी घोषित करने की प्रक्रिया में वह पहले ही अपने परिवारिक सदस्य (भाई आनंद कुमार) को बसपा में एक महत्वपूर्ण पद पर पदोन्नत कर चुकी हैं.’

हालांकि, बसपा सांसद राम शिरोमणि वर्मा ने दिप्रिंट से बातचीत में कहा कि यह धारणा गलत है कि बसपा भाजपा की ‘मदद’ कर रही है. उन्होंने कहा, ‘आजमगढ़ चुनाव ने साबित कर दिया कि मुसलमान सपा की बपौती नहीं हैं. हमें 2024 में दलित वोटों के साथ मुस्लिम वोट भी मिलेंगे. हम ही सपा से लड़ सकते हैं.’

भाजपा के एक अंदरूनी सूत्र ने दिप्रिंट को बताया कि उनका पूरा ध्यान अब 2024 के लोकसभा चुनावों पर है. अंदरूनी सूत्र ने कहा, ‘हमारी साझी सियासी दुश्मन सपा है, जिसने विधानसभा चुनावों में 32 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया और 125 सीटों पर मजबूत स्थिति में है.’

उन्होंने कहा, ‘बसपा 2024 के लोकसभा चुनावों में त्रिकोणीय लड़ाई में भाजपा की मदद करेगी क्योंकि केवल एक समुदाय (जाटव) के समर्थन के साथ वह 2019 के अपने प्रदर्शन को कतई नहीं दोहरा सकती (जब बसपा ने 10 सीटें जीतीं थी) और, लड़ाई द्विध्रुवीय होने पर सपा भाजपा को बड़ा नुकसान पहुंचा सकती है. सपा के मुस्लिम और ओबीसी वोट बैंक को तोड़ना जरूरी है. बसपा के अलावा कोई और पार्टी इसमें हमारी मदद नहीं कर सकती. अंतत: लाभ हमारा ही होगा. यह सीधा-सा सियासी गणित है.’


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मायावती ने मौन समर्थन जताया

पिछले कुछ वर्षों में मायावती अलग-अलग तरीकों से भाजपा का समर्थन करती दिखाई दी हैं.

जुलाई 2019 में जब केंद्र ने संसद में तीन तलाक विधेयक पेश किया, तो बसपा ने मतदान से दूर रहकर सरकार की परोक्ष रूप से मदद की. अगस्त 2019 में मायावती ने अनुच्छेद-370 को खत्म करने के केंद्र के फैसले का समर्थन करके सभी को हैरत में डाल दिया.

मार्च में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान बसपा ने यह देखते हुए कि मुस्लिम-यादव गठजोड़ सपा को सफलता दिला सकता है, पार्टी के खिलाफ 88 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा.

बसपा का कोई भी उम्मीदवार नहीं जीता लेकिन ऐसा माना जाता है कि इसने मुस्लिम वोटों का जमकर विभाजन किया और इसकी वजह से कई सीटों पर भाजपा को जीत हासिल हुई.

इसके अलावा, उन्होंने अखिलेश की 117 और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की 203 रैलियों के मुकाबले केवल 18 सार्वजनिक रैलियां कीं. उनकी आक्रामकता की कमी और गैर-जाटव दलितों के स्पष्ट तौर पर पार्टी से दूरी बना लेने की वजह से बसपा यूपी विधानसभा में सिर्फ एक ही सीट तक सीमित हो गई है. इसकी तुलना में रालोद ने काफी बेहतर प्रदर्शन किया. इसने सपा के साथ गठबंधन में 33 सीटों पर चुनाव लड़ा और आठ पर जीत हासिल करने में सफल रही.

मायावती के पास 2017 में 22 प्रतिशत वोट शेयर था, जो 2022 में घटकर मात्र 12 प्रतिशत, मुख्यत: जाटव, रह गया. इस साल के विधानसभा चुनाव में बसपा का प्रदर्शन 2017 के बाद सबसे खराब है, जब उसने 19 सीटें जीती थीं. 2019 में सपा के साथ गठबंधन के दौरान पार्टी ने 10 लोकसभा सीटें जीती थीं.

जी.बी. पंत सोशल इंस्टीट्यूट, इलाहाबाद में प्रोफेसर बद्री नारायण ने कहा, ‘बसपा का सिकुड़ता जनाधार वास्तव में भाजपा के लिए मददगार ही साबित हुआ है.’

उन्होंने कहा, ‘मायावती के दलित मुद्दों पर अपनी आक्रामकता खो देने और भाजपा-आरएसएस की तरफ से लुभाए जाने और मोदी सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिलने की वजह से अन्य दलित समूहों ने बसपा से दूरी बना ली है. इसके अलावा, पार्टी में अपना कोई भविष्य नजर न आता देख लालजी वर्मा, राम अचल राजभर और इंद्रजीत सरोज जैसे कई बड़े दलित नेता बसपा को छोड़कर सपा के साथ चले गए.’


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बसपा-भाजपा की नजदीकी एकतरफा नहीं

नवंबर 2020 में राज्य सभा चुनाव के दौरान भाजपा अन्य सहयोगियों की मदद से यूपी में आसानी से नौ सीटें जीत सकती थी, लेकिन पार्टी ने केवल आठ उम्मीदवारों को मैदान में उतारा, जिससे एक सीट पर बसपा के रामजी गौतम की जीत सुनिश्चित हुई.

फरवरी में यूपी चुनावों के दौरान जब सियासी जंग द्विध्रुवी— सपा और भाजपा के बीच सीधी टक्कर— बनती नजर आ रही थी तबी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक टीवी इंटरव्यू के दौरान अप्रत्याशित रूप से मायावती की तारीफ कर डाली और कहा, ‘मुझे विश्वास है कि बसपा वोट हासिल करेगी. मुझे नहीं पता कि इसकी वजह से वो कितनी सीटें जीत पाएगी लेकिन उसे वोट जरूर मिलेंगे.’

इस टिप्पणी ने चुनाव बाद गठबंधन की अटकलों को जन्म दिया लेकिन माना जाता है कि भाजपा ने बसपा को लड़ाई में बने रखने की ये सारी कवायद पूर्वी यूपी में अपनी जीत के लिए पार्टी की जरूरत को देखते हुए की थी.

मायावती ने भी उनकी इस टिप्पणी पर काफी सधी प्रतिक्रिया दी, ‘ये उनका बड़प्पन है कि उन्होंने सच को स्वीकार किया.’

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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