Saturday, 4 December, 2021
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UP के बागपत में कट्टर BJP वोटर्स को नहीं है मोदी के ‘हृदय परिवर्तन’ पर भरोसा, योगी को मिली शाबाशी

RLD के पुराने गढ़ बागपत ने 2014 में BJP को वोट देना शुरू किया, लेकिन किसान अब जयंत चौधरी की पार्टी में वापस आने के संकेत दे रहे हैं. बहुत से लोग अभी भी UP की योगी आदित्यनाथ सरकार को पसंद करते हैं.

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बागपत: पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बागपत ज़िले के सरूरपुर गांव के एक 52 वर्षीय गन्ना किसान अनिल नैन ने, 2017 असेम्बली चुनावों और 2019 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को वोट दिया था. लेकिन संभावना ये है कि ख़ुद को ‘कट्टर’ बीजेपी समर्थक बताने वाले नैन आगामी चुनावों में अपना वोट बदल सकते हैं.

नैन और उनके आसपास के बहुत से दूसरे लोगों के लिए, इस संभावित ह्रदय परिवर्तन का ताल्लुक़, पिछले साल लाए गए नरेंद्र मोदी सरकार के तीन कृषि क़ानूनों और उसके बाद पंजाब, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश में हुए विरोध प्रदर्शनों से है.

पिछले हफ्ते एक महत्वपूर्ण फैसले में, पीएम मोदी ने ऐलान किया कि इन क़ानूनों को रद्द कर दिया जाएगा, क्योंकि सरकार किसानों के एक वर्ग को उनकी अहमियत से संतुष्ट नहीं कर सकी, लेकिन नैन उससे बहुत ख़ुश नहीं हैं.

22 बीघा (क़रीब 9 एकड़) खेती की ज़मीन के मालिक नैन ने कहा, ‘मैं क़ानून रद्द करने के मोदी सरकार के फैसले के स्वागत करता हूं. लेकिन उन्होंने ये फैसला उस दबाव में किया, जो हम किसानों ने उन पर बनाया था. ये सिर्फ कोई ह्रदय परिवर्तन नहीं है. अगर वो ऐसा सोचते तो इसे कभी लाते ही नहीं’.

जाट-बहुल गांव सरूरपुर में, जहां क़रीब 20,000 लोग रहते हैं, व्यापक रूप से नैन के ही विचार गूंजते हैं. बहुत से गांववासी कहते हैं कि कृषि क़ानूनों और बाद के विरोध प्रदर्शनों ने बीजेपी के प्रति उनका रवैया बदल दिया है.

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दिप्रिंट ने बागपत के बहुत से गांवों का दौरा किया, जहां बहुत से लोगों ने कहा कि उनका बीजेपी से मोहभंग हुआ है. लेकिन कुछ दरारें भी नज़र आईं, चूंकि कुछ बीजेपी मतदाताओं ने ज़ोर देकर कहा कि कुछ दूसरे कामों की वजह से, जो योगी आदित्यनाथ सरकार कर रही है, वो पार्टी के साथ बने रहेंगे.

पश्चिमी यूपी, जहां जाट मतदाताओं के बीच कभी चौधरी अजीत सिंह के राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) की तूती बोला करती थी, वहां 2014 लोकसभा चुनावों के बाद से इस समुदाय की निष्ठा बीजेपी की तरफ मुड़ गई थी. पिछले असेम्बली चुनावों में पार्टी ने इस क्षेत्र से भारी जीत हासिल की थी.

लेकिन, कृषि क़ानूनों का मुद्दा अब हवा का रुख़ आरएलडी और उसके युवा नेता तथा स्वर्गीय अजीत सिंह के बेटे जयंत चौधरी के पक्ष में मोड़ सकता है.


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‘मोदी किसान-विरोधी हैं’

नैन की तरह सरूरपुर के ज़्यादातर किसान गन्ने की खेती करते हैं, जो 2017 के बाद से क्षेत्र के कृषि संकट के केंद्र में रहा है. इसलिए किसान आंदोलन गांव के लोगों के लिए अपनी पहचान का मुद्दा ज़रूर था- बहुत से लोगों ने इसमें शिरकत की और समर्थन दिया- लेकिन क़ानून या उनकी वापसी से उनकी फौरी समस्याओं का ज़्यादा समाधान नहीं होता.

दिप्रिंट ने पहले ख़बर दी थी, कि किस तरह गन्ने की स्थिर क़ीमतों और बढ़ती इनपुट लागत ने प्रदेश के गन्ना किसानों के लिए मुसीबत पैदा कर दी है. उसके बाद से योगी आदित्यनाथ सरकार ने गन्ने के स्टेट एडवाइज़री प्राइस में 3 प्रतिशत का इज़ाफा किया है, जो 2017 के बाद गन्ना क़ीमतों में पहला बदलाव था.

लेकिन, ऐसा लगता है कि इससे ज़मीनी स्तर पर बढ़ती इनपुट लागतों और भुगतान में देरी की भरपाई नहीं हुई है. नैन जैसे किसान इस संकट के लिए सीधे सीधे योगी सरकार को क़सूरवार ठहराते हैं, और ऐसा प्रतीत होता है कि कृषि क़ानूनों ने बीजेपी के ‘किसान-विरोधी’ होने की धारणा को और बढ़ा दिया है.

सरूरपुर के एक और गन्ना किसान, 56 वर्षीय सतबीर नैन जिनके पास चार बीघा ज़मीन है, ने कहा कि पिछले दो वर्षों से उन्हें अपनी उपज के नियमित भुगतान नहीं मिले हैं. उन्होंने कहा, ‘मेरे पास थोड़ी सी ज़मीन है. जब भुगतान नहीं मिलता तो घर तथा खेत के लिए, मासिक ख़र्च चलाना भी मुश्किल हो जाता है.

सतबीर ने कहा, ‘बहुत अच्छी बात है कि मोदी ने क़ानून वापस ले लिए, लेकिन उनके इन क़ानूनों के लेकर आने से ही साबित हो जाता है कि वो किसान-विरोधी हैं. उनके होश में आने के लिए हमारे बेटों को मरना नहीं चाहिए था’. सतबीर ने भी पिछले दो चुनावों में बीजेपी को ही वोट दिया था.

‘छोटे किसानों का नुक़सान’

ऐसा लगता है कि क़ानून वापसी से कोई भी संतुष्ट नहीं है, सुधार के समर्थक भी नहीं, जिससे गांवों के अंदर भी मतभेद पैदा हो गए हैं. बागपत के जाट किसानों की युवा पीढ़ी में, ख़ासकर जिनके पास छोटे खेत हैं, काफी निराशा है.

‘छोटे किसानों का नुक़सान हो गया,’ ये कहना था 32 वर्षीय आज़ाद नैन का, जिनके पास खेड़की गांव में खेती की 10 बीघा ज़मीन है.

आज़ाद ने कहा, ‘हमारे जीवन और व्यवसाय को दलाल लोग चलाते हैं. तीन कृषि क़ानून हमें उनसे बचा सकते थे. हम जहां चाहते वहां अपनी उपज बेंच सकते थे और अगर हम चाहते तो नहीं भी बेच सकते थे. मुझे बहुत निराशा हुई है कि उन्हें वापस ले लिया गया है’.

अनिल नैन के विपरीत आज़ाद का वोट बीजेपी के साथ ही रहेगा. आज़ाद ने कहा, ‘ज़रा यहां की सड़कें देखिए. पहले आप इतने आराम से दिल्ली से यहां नहीं आ सकते थे. बीजेपी सरकार ने यही काम किया है’.

उन्होंने आगे कहा, ‘देशभर में किसान मुसीबत में हैं. विपक्षी पार्टियों के शासन वाले सूबों में भी. हम इसलिए मुसीबत में हैं क्योंकि हम छोटे हैं. मुझे नहीं लगता कि कोई सरकार उसे बदल पाएगी. इसलिए समझदारी इसमें है कि वोट उन्हें दिया जाए, जो कम से कम दूसरी सुविधाएं दे रहे हैं’.


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‘मोदी योगी सरकार को काम करने नहीं दे रहे’

इस इलाक़े में जो दिलचस्प चीज़ देखने को मिली, वो था मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रति सम्मान, उन लोगों में भी जो कहते हैं कि वो बीजेपी को वोट नहीं देंगे. इन लोगों का कहना है कि राज्य में टकराव इसलिए है, क्योंकि बीजेपी ‘यूपी को दिल्ली से चलाने की कोशिश कर रही है’.

आज़ाद ने कहा, ‘जब योगी जी आए तो उन्होंने सड़कें बनवाईं, उन्होंने हमें बिजली और पानी दिया. लेकिन पिछले क़रीब दो सालों में, लोकसभा चुनावों के बाद से, हम देख रहे हैं कि काम रुक गया है. मुझे नहीं लगता कि मोदी उन्हें काम करने दे रहे हैं’.

आज़ाद की बात के बीच में बोलते हुए, कृषि क़ानूनों के एक और समर्थक किसान सुनील सिंह ने कहा, ‘अगर योगी जी इंचार्ज होते, तो दबाव में आकर उन्होंने कृषि क़नूनों को कभी रद्द न किया होता. वो अपनी जगह पर अड़े रहते’.

सरूरपुर में सतबीर ने भी कहा, ‘योगी सरकार के आने के बाद से अपराध दर में निश्चित रूप से कमी आई है. पहले इन इलाक़ों में चोरी और हिंसा तक एक सामान्य बात थी. आज अगर आप, एक अकेली महिला रात में इस इलाक़े से गुज़रे, तो आपको कोई परेशानी नहीं होगी’.

उसने आगे कहा, ‘अगर योगी को उनकी हैसियत के हिसाब से काम करने दिया जाता, तो हम कहीं बेहतर स्थिति में होते. लेकिन बीजेपी यूपी को दिल्ली से चलाने की कोशिश कर रही है’.

जयंत स्वीकार्य हैं, टिकैत उतने नहीं

दिप्रिंट से बात करने वाले बहुत से जाट किसान, विरोध के बाद क़ानून वापसी को अपनी पहचान की अभिव्यक्ति के तौर पर देखते हैं. उनमें बहुत से पुराने आरएलडी समर्थक थे, जो बीजेपी के पाले में आ गए थे, लेकिन अब चौधरियों के पास पलटते दिख रहे हैं.

शाहपुर बनोली गांव के 41 वर्षीय किसान श्रीपाल सिंह ने कहा, ‘मैं प्रदर्शन के लिए गाज़ीपुर बॉर्डर गया था. वहां का माहौल बिल्कुल काल्पनिक सा था. अपने जाट भाइयों को दिल्ली में तूफान उठाते देखना, एक अदभुत अनुभव था’.

उन्होंने आगे कहा, ‘हम चौधरी चरण सिंह की कहानियां सुनकर बड़े हुए थे कि उन्होंने जाट समुदाय के लिए कितना कुछ किया था. अब उनके पोते जयंत समुदाय की आवाज़ दिल्ली तक पहुंचाते दिख रहे हैं’.

पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह को व्यापक रूप से किसानों का चैम्पियन माना जाता था.

लेकिन, भारतीय किसान यूनियन नेता राकेश टिकैत के बारे में किसानों की धारणा कुछ मिली-जुली थी.

शाहपुर बनोली गांव के एक किसान अनिल सिंह का कहना था, ‘टिकैत आंदोलन का, और हम जाटों का चेहरा थे. लेकिन उन्हें खालिस्तानी ताक़तों को हमारे आंदोलन को बिगाड़ने की अनुमति नहीं देनी चाहिए थी. मैंने ख़बरों में भी देखा कि ख़ालिस्तानियों ने एक आदमी का हाथ काट दिया था. जाटों की ख़ालिस्तानियों से बराबरी नहीं करनी चाहिए’.

73 वर्षीय सुजीत सिंह ने कहा, ‘जयंत चौधरी जाट किसानों की आवाज़ उठा रहे हैं, लेकिन मेरे हिसाब से राकेश टिकैत अपने फायदे देख रहे हैं. जो पक्ष उन्हें ज़्यादा फायदा पहुंचाएगा, वो उसके साथ चले जाएंगे’.

सुजीत ने अपनी किशोरावस्था की एक कहानी सुनाई, जब उन्होंने चौधरी चरण सिंह को एक रैली में देखा, और उनके भाषण और व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुए. लेकिन पिछले दो चुनावों में सुजीत ने भी बीजेपी को वोट दिया.

सुजीत ने आगे कहा, ‘जाट बहुत स्वाभिमानी लोग हैं, लेकिन हम जाहिल नहीं हैं. हम बिना किसी कारण के हिंसक नहीं होते. पूरे देश में हमारे बारे में ये धारणा फैलाई गई है, पहले मुज़फ्फर नगर दंगों के बाद और फिर इन प्रदर्शनों की वजह से. ये धारणा सही नहीं है’.

‘2013 में मूर्ख बने’

2013 के मुज़फ्फरनगर दंगों के बारे में बदलती अधारणा, जिसमें 60 से अधिक लोग मारे गए, पश्चिमी यूपी क्षेत्र में महसूस की जा सकती है.

आरएलडी, जो अपने निष्ठावान जाट और मुस्लिम वोट-बेस की बदौलत, किसी समय क्षेत्र की एक बहुत बड़ी राजनीतिक ताक़त थी, उसके आधार में दंगों के बाद भारी कमी आई, चूंकि जाट बीजेपी के पीछे लामबंद हो गए.

पार्टी के गढ़ बागपत में, 2012 के प्रदेश चुनावों में आरएलडी का वोट शेयर लगभग 29 प्रतिशत था, जो 2017 तक आते आते गिरकर क़रीब 11 प्रतिशत रह गया.

लेकिन, अगर बीजेपी जाटों का भरोसा फिर से नहीं जीत पाती, तो अगले साल इसमें बदलाव हो सकता है.

सरूरपुर में अनिल ने कहा, ‘हमें लगा कि मुसलमान हमें परेशान कर रहे हैं और हमें निशाना बना रहे हैं. हमें लगा कि हमारा समुदाय ख़तरे में है. इसीलिए हमने उन्हें (बीजेपी) वोट दिया, क्योंकि हमें लगा कि आरएलडी हमें नहीं बचा सकती थी. अब हमारी समझ में आ गया है कि हमें किसी से बचने की ज़रूरत नहीं है’.

आज़ाद ने भी, जो अभी भी चुनावी तौर पर बीजेपी के पीछे है, कहा कि दंगे ‘करवाए गए थे’.

उसने आगे कहा, ‘हमें बेवक़ूफ बनाकर ये समझाया गया कि मुसलमानों के साथ समस्या है, सिर्फ इसलिए कि उन्हें (बीजेपी) हमारे वोट मिल जाएं. लेकिन मुझे मूर्ख बनने का खेद नहीं है. इस बहाने योगी जी तो मिल गए’.

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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