Monday, 24 January, 2022
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क्रिकेट से राजनीति तक का सफर- कैसे खुद को ‘ठेठ बिहारी’ कहकर तेजस्वी यादव इस बार बिहार चुनाव में छाए रहे

तेजस्वी यादव ने अपने घोषणापत्र में राज्य के युवाओं को 10 लाख सरकारी नौकरियां देने का वादा किया है जिसे उन्होंने पहली कैबिनेट में पास कराने की बात कही है.

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नई दिल्ली: बिहार की राजनीति में लंबे समय तक प्रमुख चेहरा रहे लालू प्रसाद यादव की गैर-मौजूदगी में उनके बेटे तेजस्वी यादव के हाथों में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की इस बार विधानसभा चुनाव की कमान रही. तीनों चरणों के मतदान के बाद टीवी चैनलों के एग्जिट पोल तेजस्वी यादव के नेतृत्व में सरकार बनने का अनुमान लगा रहे हैं. मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर भी उन्हें सबसे ज्यादा लोगों की पसंद बताया जा रहा है.

आज नतीजों का दिन है. अब से कुछ देर में यह पता चल जाएगा कि बिहार की कमान इस बार किसके हाथों में जाती है. अगर एग्जिट पोल का अनुमान सही निकला तो राज्य के अगले मुख्यमंत्री होंगे चुनावी भाषणों में खुद को ‘ठेठ बिहारी’ कहने वाले लालू यादव के छोटे बेटे तेजस्वी यादव.

एंटी इनकंबेसीं की बात इस बार भले ही की जा रही हो लेकिन यह भी तय है कि तेजस्वी ने बिहार चुनाव की धार को बदला है. इस बार के चुनाव में एक बात जो खासतौर पर उभरी वो ये कि बेरोजगारी को मुद्दा बनाकर राजद नेता तेजस्वी यादव ने चुनाव की दिशा को ही बदल दिया. गौरतलब है कि तेजस्वी की रैलियों में काफी बड़ी संख्या में लोग नज़र आए.

बिहार की 243 विधानसभा सीटों में राजद 144 सीटों पर चुनाव लड़ी वहीं बाकी सीटें उसने अपने सहियोगियों के लिए छोड़ी. कांग्रेस ने 70 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे वहीं लेफ्ट पार्टियों को 29 सीटें मिली थी.

2015 के विधानसभा चुनाव में राजद और जदयू एक साथ मिलकर चुनाव लड़े थे. उस समय राजद को विधानसभा में सबसे ज्यादा 80 सीटें मिली थीं.

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किन मुद्दों के सहारे तेजस्वी ने अपना प्रचार अभियान पूरा किया, आइए इस पर एक नज़र डालते हैं.

10 लाख नौकरियों को वादा छाया रहा

कई राजनीतिक विशेषज्ञ ये मानते हैं कि बिहार में इस बार का विधानसभा का चुनाव विरला ही है और बेरोजगारी जैसे मुद्दे पर लड़ा जा रहा है.

तेजस्वी यादव ने अपने घोषणापत्र में राज्य के युवाओं को 10 लाख ‘सरकारी’ नौकरियां देने का वादा किया है जिसे उन्होंने पहली कैबिनेट में पास कराने की बात कही है.

घोषणापत्र में उद्योगों, शिक्षा, उच्च शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, स्मार्ट गांव, स्वयं सहायता ग्रुप समूह, पंचायती राज संस्थान, सामुदायिक विकास और गरीबी उन्मूलन, पशुपालन एवं मत्स्यपालन, स्वास्थ्य सेवाएं, सरकारी सेवा से जुड़े मुद्दे, खेल नीति जैसे मामलों को भी बढ़ावा देने की भी बात कही गई है.

नीतीश रहे निशाने पर

चुनाव प्रचार के दौरान तेजस्वी यादव ने बीते 15 सालों से बिहार की सत्ता पर काबिज रहे नीतीश कुमार को लगातार निशाने पर रखा और उन्हें थका हुआ बताया..कहा वो थक चुके हैं यही नहीं तेजस्वी ने उनके कामों का भी हिसाब मांगा.

एक चुनावी रैली में नीतीश कुमार ने आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद के बच्चों की संख्या पर हमला बोलते हुए कहा कि लोगों को बेटियों पर विश्वास ही नहीं है. इस पर तेजस्वी ने कहा था, ‘नीतीश जी मेरे बारे में कुछ भी अपशब्द कहे वो मेरे लिए आशीर्वचन है.’

‘परिपक्वता के साथ लड़ा चुनाव’

तेजस्वी यादव ने अपने चुनाव प्रचार में लगातार जनता के मुद्दों को उठाया जिसमें कोरोना के कारण लगे लॉकडाउन के समय के हालात हो या फिर राज्य की अन्य सुविधाओं की स्थिति.

दिप्रिंट को राजद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी ने बताया था, ‘मुझे तेजस्वी पहले से अधिक परिपक्व लगते हैं. आरजेडी की लिस्ट देखिए- इसमें एक नई सोशल इंजीनिरिंग है. आरजेडी ने समाज के सभी तबकों को जगह देने की कोशिश की है’.

चुनाव से कुछ दिनों पहले ही राजद के बड़े नेता रहे दिवंगत रघुवंश प्रसाद सिंह की मृत्यु हो गई थी. मृत्यु से पहले उन्होंने पार्टी से भी इस्तीफा दे दिया था लेकिन इस बीच पार्टी के भीतर के असंतोष को भी तेजस्वी यादव ने किसी भी तौर पर उभरने नहीं दिया और सभी को साथ लेकर प्रचार किया.

क्रिकेट से राजनीति तक

तेजस्वी यादव के लिए पहली पसंद राजनीति नहीं रही है. उन्होंने पहले क्रिकेट खिलाड़ी बनने का सोचा. उन्होंने दिल्ली के लिए अंडर-19 क्रिकेट, झारखंड के लिए रणजी ट्राफी और आईपीएल में दिल्ली डेयरडेविल्स की टीम में भी रहे. लेकिन आईपीएल में दिल्ली की तरफ से वो कभी मैदान में खेल नहीं सके.

लालू प्रसाद यादव ने अपनी किताब गोपालगंज टू रायसीना में लिखा भी है, ‘तेजस्वी शुरुआत से ही डाउन-टू-अर्थ रहा है. वो शायद ही कभी गुस्सा होता होगा. शायद क्रिकेट से उसके जुड़ाव ने उसे पहले ही मैच्योर कर दिया.’

2012 में क्रिकेट छोड़ने के बाद उन्होंने राजनीति की तरफ रूख किया और 26 वर्ष की उम्र में पहली बार 2015 में राघोपुर से विधानसभा का चुनाव लड़ा. चुनाव जीतने के बाद नीतीश-लालू गठबंधन की सरकार में वो उपमुख्यमंत्री बने. लेकिन कुछ ही महीनों के बाद नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बना ली.


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