Sunday, 26 June, 2022
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4 राज्यों के 5 उप-चुनावों में मिली हार के बाद, BJP को सताई बिहार में हार और बंगाल में गति की चिंता

कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में असेम्बली सीटें जीतीं, जबकि बिहार की सीट पर RJD ने क़ब्ज़ा किया- जहां BJP सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा है- और बंगाल में TMC विजयी रही. TMC ने आसनसोल लोकसभा सीट भी जीत ली.

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नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को चार राज्यों- बंगाल, बिहार, छत्तीसगढ़, और महाराष्ट्र में हुए पांच उपचुनावों में हर सीट पर शिकस्त हासिल हुई है- जिनके नतीजे शनिवार को घोषित किए गए.

बंगाल में पार्टी ने आसनसोल की अपनी पुरानी लोकसभा सीट गंवा दी, जो पिछले साल उसके पूर्व सांसद और केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो के इस्तीफे से ख़ाली हुई थी. बाबुल ने ख़ुद भी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) उम्मीदवार के नाते बैलीगंज विधान सभा सीट जीत ली.

सभी चुनाव उन सूबों में हुए जहां बीजेपी विपक्ष में है- सिवाय बिहार के जहां वो सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा है और जहां बोचहां असेम्बली सीट पर उसे राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के हाथों करारी हार मिली है.

लेकिन बीजेपी नेताओं ने दिप्रिंट से कहा कि पांच उप-चुनावों में हार का कोई संदेश नहीं है, हालांकि बंगाल में पार्टी का वेग बनाए रखने और बिहार में अपने घर को दुरुस्त रखने की चिंता ज़रूर है.

दिल्ली में एक वरिष्ठ बीजेपी नेता ने कहा, ‘छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में हमारा वोट प्रतिशत गिरा नहीं है- वो 40 प्रतिशत से अधिक है. चिंता बिहार को लेकर है जहां आरजेडी के पक्ष में सहानुभूति लहर बन गई, और सत्ता में रहने के बावजूद हमारा वोट शेयर घट गया. उप-चुनाव में आमतौर पर सत्ताधारी पार्टी जीत जाती है. पश्चिम बंगाल एक और चिंता का विषय है- अपनी तालिका बनाए रखने के लिए हमें अपनी गति बरक़रार रखनी है. हमने अच्छा प्रचार किया लेकिन विपक्षी एकता को नहीं तोड़ पाए’.

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बंगाल

बंगाल में सत्तारूढ़ टीएमसी ने आसनसोल लोकसभा सीट और बैलीगंज असेम्ली सीट, दोनों पर कब्ज़ा कर लिया है, जहां उसके उम्मीदवार क्रमश: शत्रुघन सिन्हा और बाबुल सुप्रियो- दोनों पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजेपी से दलबदलू हैं- भारी अंतर से विजयी रहे.

आसनसोल में सिन्हा 6,56,358 वोटों के साथ विजयी रहे, जबकि बीजेपी के अग्निमित्रा पॉल 3,53,149 मतों के साथ बहुत पीछे रह गए. इस बीच सुप्रियो- जिन्होंने पिछले साल कैबिनेट से हटाए जाने, और दल बदलकर टीएमसी में आने के बाद आसनसोल सीट से इस्तीफा दे दिया था- 20,000 वोटों के अंतर से विजयी रहे. यहां पर बीजेपी उम्मीदवार तीसरे स्थान पर रहा; दूसरे स्थान पर सायरा शाह हलीम रहीं, जिन्हें 30,000 से अधिक वोट मिले.

दो सीटों पर अपनी पार्टी की जीत के बाद, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ट्वीट करके ‘निर्णायक जनादेश’ के लिए मतदाताओं का आभार प्रकट किया, और इसे ‘नववर्ष का एक गर्मजोशी भरा उपहार’ क़रार दिया- उनका इशारा बंगाली नववर्ष पोहेला बोइशाख की ओर था जो शुक्रवार को था.

सिन्हा की जीत, जिनका संबंध बिहार से है- जिस कारण प्रचार के दौरान बीजेपी ने उनपर ‘बाहरी’ का ठप्पा लगा दिया था- साथी बिहारी और पार्टी उपाध्यक्ष यशवंत सिन्हा के साथ मिलकर, जो एक और पूर्व बीजेपी मंत्री और मोदी सरकार के आलोचक हैं, उत्तर भारत में अपने पदचिन्ह फैलाने की टीएमसी की योजनाओं को बढ़ावा दे सकती है.

दिप्रिंट से बात करते हुए, बंगाल बीजेपी के एक नेता ने कहा, ‘ये अपेक्षित था. उप-चुनाव में, जैसा कि असेम्बली चुनावों में हुआ था, ममता की पकड़ ढीली नहीं हुई है. हमारे प्रचार में कुछ ख़ामियां थीं, लेकिन उप-चुनावों के नतीजों से हम निष्कर्ष नहीं निकाल सकते. लेकिन लोकसभा चुनाव एक अलग खेल होते हैं, और उनमें हम अच्छी टक्कर देंगे’.

बिहार

बीजेपी की सबसे असाधारण हार बिहार में रही, जहां वो सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा है. बोचहां सीट पर आरजेडी को 48.52 प्रतिशत के निर्णायक मतों से जीत हासिल हुई.

इस उप-चुनाव की ज़रूरत वीआईपी विधायक मुसाफिर पासवान की मौत से पड़ी, जिनका बेटा अमर कुमार पासवान आरजेडी उम्मीदवार था, और जिसने बीजेपी की बेबी कुमारी को क़रीब 37,000 वोटो से हरा दिया, जबकि विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) उम्मीदवार गीता देवी को 29,279 वोट प्राप्त हुए.

वीआईपी पहले राज्य में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन (एनडीए) का हिस्सा थी, लेकिन जब उसने उत्तर प्रदेश में बीजेपी के खिलाफ विधान सभा चुनाव लड़े, और इसके नेता मुकेश साहनी ने बीजेपी नेताओं की आलोचना की, तब से इनके रिश्तों में खटास आ गई. वीआईपी के तीनों विधायक दल बदलकर बीजेपी में आ गए, जबकि साहनी को, जो एमएलसी थे, उनके मंत्री पद से हटा दिया गया.

बोचहां के लिए प्रचार के दौरान बीजेपी नेताओं ने- जिनमें केंद्रीय मंत्री और दर्जनों विधायक शामिल थे- चुनाव क्षेत्र में ही डेरा जमा लिया था, ये दिखाने के लिए वीआईपी से अलग होने का पार्टी का रास्ता सही था, लेकिन उनके सामने आरजेडी की ओर एक निर्णायक झुकाव आड़े आ गया.

बीजेपी नेताओं के अनुसार, उप-चुनाव के नतीजों से न केवल पूर्व विधायक के बेटे आरजेडी उम्मीदवार के प्रति एक सहानुभूति लहर का पता चलता है, बल्कि ऊंची भूमिहार जाति के वोटों में भी, जो पारंपरिक रूप से बीजेपी का एक मज़बूत जनाधार रहे हैं, आरजेडी की ओर शिफ्ट नज़र आता है. इसी महीने हुए एमएलसी चुनावों में आरजेडी के छह विजयी उम्मीदवारों में से पांच भूमिहार थे.

नतीजों से ये भी पता चलता है कि वीआईपी ने निषाद समुदाय के बीच अपना जनाधार बरक़रार रखा है, और 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले बीजेपी को निषाद नेताओं की ज़रूरत है.

इस जीत के बाद 76 सीटों के साथ आरजेडी, असेम्बली में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन जाएगी, बीजेपी से सिर्फ एक कम, हालांकि इससे नीतीश कुमार सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

महाराष्ट्र

महाराष्ट्र की कोल्हापुर उत्तर असेम्बली सीट पर जयश्री जाधव ने- कांग्रेस विधायक चंद्रकांत जाधव की विधवा, जिनकी दिसंबर में मौत के कारण उप-चुनाव हुआ- बीजेपी उम्मीदवार सत्यजीत कदम को 19,000 से अधिक मतों से हरा दिया.

ये हार राज्य में बीजेपी काडर के लिए विशेषरूप से एक बड़ा झटका है, चूंकि कोल्हापुर बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष चंद्रकांत का गृह क्षेत्र है, जिन्होंने उप-चुनाव के लिए पार्टी के प्रचार में अपनी पूरी ताक़त झोंक दी थी.

कांग्रेस की जीत से महा विकास अघाड़ी (एमवीए) को भी बल मिला है, जिसमें शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) और कांग्रेस शामिल हैं, जिन्होंने ये चुनाव मिलकर लड़ा था, इसके बावजूद कि गठबंधन के तीनों सहयोगियों के बीच अकसर मनमुटाव हो जाते हैं.

नतीजों का ऐलान होने के बाद शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत ने कहा, कि ये जीत इसलिए भी सराहनीय है कि बीजेपी की ओर से एमवीए नेताओं पर ‘झूठे आरोप’ लगाए जा रहे थे- उनका आशय केंद्रीय एजेंसियों द्वारा की जा रही कई जांचों से था.

राउत ने कहा, ‘जीत से साबित हो जाता है कि बीजेपी ने सस्ती और गंदी राजनीति का खेल खेला है, मतदाताओं ने उसे पसंद नहीं किया है. ये छत्रपति शिवाजी महाराज की भूमि है, और बीजेपी की नफरत की राजनीति यहां काम नहीं करेगी…एमवीए के तीनों घटकों ने, जो एकजुट होकर लड़े, एक अच्छी मिसाल क़ायम की है’.

कोल्हापुर उप-चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण था, कि ये मुम्बई तथा पुणे समेत महाराष्ट्र के प्रमुख निकाय चुनावों से पहले- जो इसी साल होने हैं- शायद आख़िरी चुनाव था.

छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ में सत्ताधारी कांग्रेस ने खैरागढ़ सीट जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जेसीसीसी) से छीन ली, जिसका गठन एक पूर्व सीएम दिवंगत अजीत जोगी ने, 2016 में कांग्रेस से निष्काषित किए जाने के बाद किया था. ये सीट पिछले साल नवंबर में जेसीसी विधायक देवव्रत सिंह की मौत से ख़ाली हुई थी, जो ख़ैरागढ़ के पूर्व राज परिवार के सदस्य थे.

कांग्रेस की यशोदा वर्मा ने बीजेपी के कोमल जंघेल को 20,000 से अधिक मतों से हरा दिया, जबकि दिवंगत विधायक के बहनोई को टिकट देकर एक सहानुभूति लहर हासिल करने की जेसीसी की कोशिशों का कोई असर नहीं हुआ- उन्हें केवल 1,220 वोट हासिल हुए. बीजेपी के लिए, दिसंबर 2023 में राज्य में होने वाले विधान सभा चुनावों में, फिर से सत्ता हासिल करने के उसके प्रचार को झटका लगा है.


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