जून 1984 में हज़ारों श्रद्धालु श्री हरमंदिर साहिब में श्री गुरु अर्जन देव जी के शहीदी गुरपुरब को मनाने के लिए एकत्र हुए थे. इनमें गोद में बच्चों को उठाए माताएं, परिवार के साथ आई स्कूली छात्राएं, आध्यात्मिक शांति की तलाश में आई बुजुर्ग महिलाएं और गुरु के दर पर माथा टेकने आए श्रद्धालु शामिल थे. किसी ने नहीं सोचा था कि उनमें से कई कभी अपने घर वापस नहीं लौट पाएंगे. भारतीय सरकार ने पंजाब के अमृतसर स्थित गोल्डन टेंपल परिसर पर सैन्य कार्रवाई करते हुए ऑपरेशन ब्लू स्टार शुरू किया.
हर साल जब सिख पंथ जून 1984 के घल्लूघारा (नरसंहार) को याद करता है, तो श्री हरमंदिर साहिब में हुई घटनाओं का ज़िक्र किया जाता है, लेकिन सबसे मार्मिक कहानियों में वे महिलाएं और बच्चे शामिल हैं जो इस त्रासदी का हिस्सा बने. उनकी विरासत सिख स्मृति में विशेष स्थान रखती है, क्योंकि यह उस दृढ़ता, श्रद्धा और साहस को दर्शाती है, जो लंबे समय से सिख महिलाओं की पहचान रही है. सिख इतिहास में महिलाओं को हमेशा अत्यंत सम्मान दिया गया है. पांच सौ वर्ष पहले गुरु नानक देव ने महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव को चुनौती देते हुए कहा था, “उसे नीचा क्यों कहा जाए, जिससे राजा तक जन्म लेते हैं?”
गुरु गोबिंद सिंह ने 1699 में खालसा पंथ की स्थापना के माध्यम से इस विचार को आगे बढ़ाया. सिख महिलाओं को “कौर” नाम देकर उन्होंने उन्हें जाति, वंश और सामाजिक स्थिति से अलग एक स्वतंत्र पहचान दी. कौर केवल किसी की बेटी या पत्नी नहीं थी, बल्कि गरिमा, साहस, स्वायत्तता और आध्यात्मिक समानता से युक्त एक स्वतंत्र व्यक्तित्व थी. जून 1984 में शहीद हुई महिलाओं ने इन्हीं आदर्शों को जीवंत किया.
सबसे हृदयविदारक कहानियों में गुरदासपुर की बीबी सतनाम कौर और बीबी वाहेगुरु कौर की कहानी शामिल है. दोनों बहनें स्कूल में पढ़ती थीं जब उनकी मृत्यु हुई. बलजिंदर सिंह कोटभारा द्वारा लिखित कौरनामा भाग-3 के अनुसार, जब उनके पिता मोहर सिंह ने श्री हरमंदिर साहिब पर सैन्य कार्रवाई देखी और पवित्र स्थल के अपमान की आशंका जताई, तो उन्होंने विरोध करने का फैसला किया. पुस्तक के अनुसार, इस प्रतिरोध के दौरान उन्होंने अपनी दोनों बेटियों को सेना के टैंकों के सामने खड़ा कर दिया. दोनों लड़कियों की मौत हो गई और टैंक नष्ट हो गए. चाहे इसे बलिदान, प्रतिरोध या श्रद्धा का कार्य माना जाए, सतनाम कौर और वाहेगुरु कौर की कहानी सिख स्मृति में एक विशेष स्थान रखती है. उनकी शहादत आज भी उस गहरी आस्था और प्रतिबद्धता का प्रतीक मानी जाती है, जिसे कई सिख जून 1984 की घटनाओं से जोड़कर देखते हैं.
एक और भावुक करने वाली कहानी बरनाला जिले के संघेड़ा गांव से जुड़ी है. कौरनामा भाग-3 में दर्ज गवाही के अनुसार, भाई जग्गा सिंह के नेतृत्व में एक समूह गांव से श्री हरमंदिर साहिब पहुंचा था. जब हिंसा बढ़ी तो उन्होंने गुरु राम दास सराय में शरण ली. भाई जग्गा सिंह ने अपनी पत्नी, मित्र मिथू सिंह, दो बेटियों—बिंदर कौर और गुरमीत कौर—और एक बेटे को खो दिया. कुछ ही क्षणों में उनका पूरा परिवार उजड़ गया. उनकी कहानी जून 1984 से जुड़ी सबसे दर्दनाक घटनाओं में गिनी जाती है और यह याद दिलाती है कि गुरु के घर आए आम श्रद्धालुओं को कितनी बड़ी मानवीय कीमत चुकानी पड़ी.
उन दिनों को याद की जाने वाली महिलाओं में हरियाणा के करनाल की बीबी उपकार कौर भी शामिल हैं. कौरनामा भाग-3 में दर्ज उनके शब्द सिख आस्था की भावना को दर्शाते हैं. आत्मरक्षा की सिख परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि गुरु हरगोबिंद साहिब ने मिरी-पीरी के सिद्धांत का प्रतीक दो तलवारें धारण की थीं. पीरी आध्यात्मिक अधिकार, भक्ति और ईश्वर स्मरण का प्रतीक है, जबकि मिरी सांसारिक अधिकार, शक्ति और अन्याय के खिलाफ खड़े होने की जिम्मेदारी का प्रतीक है. यह सिद्धांत सिखों को सिखाता है कि वे नाम से जुड़े रहें, लेकिन जरूरत पड़ने पर अपनी रक्षा, पीड़ितों की सुरक्षा और धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाने के लिए भी तैयार रहें. उन्होंने गुरु गोबिंद सिंह की उस शिक्षा को भी याद किया, जिसमें एक सिख को आध्यात्मिकता और साहस दोनों का प्रतीक बनने की बात कही गई है.
यह त्रासदी क्षेत्र, समाज और जाति की सीमाओं से परे थी. इनमें मानसा की सोधान देवी भी शामिल थीं, जो एक ब्राह्मण परिवार से थीं और धार्मिक जत्थे के साथ श्री हरमंदिर साहिब आई थीं.
बचे हुए लोगों के अनुसार, गांव किला हकीमा का समूह गुरु राम दास सराय में शरण लिए हुए था, तभी गोलीबारी तेज हो गई. हमले के दौरान एक गोली सोधान देवी को लगी और उनकी मौके पर ही मौत हो गई. शायद सबसे दर्दनाक गवाही संगरूर जिले के बतूहा गांव की दो वर्षीय सुरिंदर कौर की है. उनके पिता प्रीतम सिंह के अनुसार, परिवार 3 जून 1984 को श्री हरमंदिर साहिब पहुंचा था. जब ऑपरेशन ब्लू स्टार शुरू हुआ तो वे परिसर के अंदर फंस गए और बाहर निकलने का कोई सुरक्षित रास्ता नहीं था. कई दिनों तक उन्होंने भय और भोजन-पानी की भारी कमी के बीच जीवित रहने की कोशिश की.
प्रीतम सिंह ने बताया कि जीवित रहने के लिए परिवार को नालियों में बहता पानी पीना पड़ा. हालात और खराब होने पर उन्होंने खून मिले पानी तक को पी लिया, क्योंकि कोई दूसरा स्रोत उपलब्ध नहीं था.
दुर्भाग्यवश, ऑपरेशन के दौरान परिसर में हुई गोलाबारी और फायरिंग के बीच सुरिंदर कौर की मौत हो गई. उनकी कहानी उन मासूम महिलाओं और बच्चों की पीड़ा की मार्मिक याद दिलाती है, जो इस हिंसा की चपेट में आ गए थे, और जून 1984 की घटनाओं की मानवीय कीमत को सामने लाती है.
पंथ की बेटियां
इन कहानियों के साथ-साथ कई अन्य महिलाओं के नाम भी ऐतिहासिक दस्तावेजों और पारिवारिक यादों में दर्ज हैं. इनमें फिरोजपुर की बीबी जसविंदर कौर, जालंधर की बीबी परमजीत कौर भंगाला, डिंगरियां की बीबी रविंदर कौर, चीमा की बीबी करतार कौर, चीमा की बीबी परमजीत कौर, मालेरकोटला की बीबी सुखविंदर कौर और बीबी महिंदर कौर, अमृतसर की बीबी गोपाल कौर अठवाल, लिधरां की बीबी गुरदेव कौर, कैरों की बीबी धर्म कौर, देहरादून की बीबी प्रीतम कौर, जौरा की बीबी प्रकाश कौर, बीबी मलकीत कौर, बीबी सवितर कौर, बीबी सुरजीत कौर, बीबी काको कौर, अमरजीत कौर, जरनैल कौर, सिमरजीत कौर, कुलदीप कौर, मिसरीवाला की परमजीत कौर, राज कौर, फेल्लोके की सुरजीत कौर, कोट खालसा की गुरप्रीत कौर और कोट खालसा की मनजीत कौर शामिल हैं.
उनकी कहानियां भले ही गांवों, पारिवारिक यादों और ऐतिहासिक अभिलेखों में बिखरी हुई हों, लेकिन उनके बलिदान सिख इतिहास के ताने-बाने में गहराई से जुड़े हुए हैं. उन्हें केवल इसलिए याद नहीं किया जाता कि वे पीड़ित थीं, बल्कि इसलिए कि वे सिखों की शहादत की परंपरा का हिस्सा बन गईं.
इन महिलाओं की यादें आज भी अमृतसर स्थित सचखंड श्री हरमंदिर साहिब परिसर में ऑपरेशन ब्लू स्टार स्मारक के भीतर बने शहीदी गैलरी में प्रदर्शित उनकी तस्वीरों के माध्यम से जीवित हैं. जब श्रद्धालु इस गैलरी से गुजरते हैं, तो वे आस्था, दुख और बलिदान की कहानियों से रूबरू होते हैं.
कौरनामा भाग-3 के लेखक बलजिंदर सिंह कोटभारा ने कहा, “इन महिलाओं के बारे में जानकारी जुटाने में मुझे लगभग पांच से छह साल लगे. आज भी मेरा मानना है कि बहुत कुछ ऐसा है जो अब तक दस्तावेजों में दर्ज नहीं हो पाया है. 1984 की घटनाओं और सिख इतिहास के अन्य महत्वपूर्ण अध्यायों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली महिलाओं को याद किया जाना चाहिए और उन पर अध्ययन होना चाहिए.”
उन्होंने कहा, “उनकी कहानियों को संरक्षित करना हम सभी की जिम्मेदारी है. संस्थाओं, विशेष रूप से शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) को इन विवरणों को दस्तावेजित करने, संरक्षित करने और प्रचारित करने के लिए विशेष प्रयास करने चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां इन महिलाओं के बलिदान, योगदान और ऐतिहासिक महत्व के बारे में जान सकें.”
जून 1984 की त्रासदी केवल हथियारबंद पुरुषों तक सीमित नहीं थी. माताएं, बेटियां, बहनें और यहां तक कि छोटे बच्चे भी उस दर्दनाक अध्याय का हिस्सा बने. उनकी तस्वीरें आज सिखों की दृढ़ता और स्मृति के स्थायी प्रतीक के रूप में खड़ी हैं. पत्रकार हरशरण कौर ने कहा, “एक अमृतधारी सिख महिला के रूप में मेरा मानना है कि हमसे पहले की महिलाओं का जीवन हमें आस्था, साहस और पंथ के प्रति समर्पण के अनमोल सबक देता है. 1984 के घल्लूघारा का हिस्सा बनी महिलाओं ने भी उसी भावना को जीवित रखा और शहादत के माध्यम से अपना योगदान दिया.”
उन्होंने आगे कहा, “खालसा विलक्षण है, अलग और असाधारण है, और इन बलिदानों को याद रखना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है. साथ ही हमें उनके जीवन से सीखने की कोशिश करनी चाहिए, बाणी और बाना दोनों से जुड़े रहना चाहिए, गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा दिए गए अमृत के उपहार को संजोकर रखना चाहिए और कभी भी खुद को गुरबाणी से दूर नहीं होने देना चाहिए.”
उनका बलिदान, हमारी जिम्मेदारी
जून 1984 के घल्लूघारा को चार दशक से अधिक समय बीत चुके हैं, लेकिन इन महिलाओं की याद आज भी जीवित है. सचखंड श्री हरमंदिर साहिब में स्थित शहीदी गैलरी एक स्थायी श्रद्धांजलि के रूप में खड़ी है, जो यह सुनिश्चित करती है कि आने वाली पीढ़ियां उन दुखद दिनों के चेहरों और कहानियों को याद रखें.
बीबी सतनाम कौर, बीबी वाहेगुरु कौर, बिंदर कौर, गुरमीत कौर, सुरिंदर कौर, बीबी उपकार कौर, सोधान देवी और कई अन्य महिलाओं की कहानियां केवल दुख और क्षति की कहानियां नहीं हैं. ये श्रद्धा, दृढ़ विश्वास और सिख धर्म के प्रति अटूट समर्पण की कहानियां हैं.
भाई परमजीत सिंह मंड, जो दल खालसा के कार्यकारी अध्यक्ष हैं, ने कहा, “बीबी उपकार कौर, बीबी परमजीत कौर, बीबी प्रीतम कौर, सतनाम कौर और वाहेगुरु कौर की शहादत हमें याद दिलाती है कि गुरु साहिब द्वारा दिया गया समानता का अधिकार केवल एक अधिकार नहीं था, बल्कि एक जिम्मेदारी भी थी. उनका साहस और अत्याचार के खिलाफ खड़े होने की उनकी इच्छा यह दिखाती है कि सिख महिलाएं हमेशा अपने धर्म और सिद्धांतों की रक्षा के लिए पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रही हैं.”
उन्हें याद करना केवल स्मरण का कार्य नहीं है, बल्कि एक कर्तव्य है. जब तक जून 1984 की कहानी सुनाई जाती रहेगी, तब तक पंथ की इन बेटियों को सिख स्मृति और इतिहास में सम्मानजनक स्थान मिलता रहना चाहिए.
दमनजीत कौर पंजाब की एक स्वतंत्र लेखिका हैं. व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं.
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