Thursday, 26 May, 2022
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क्यों लोहिया अपने जन्मदिन के बजाय 23 मार्च को शहादत दिवस मनाने पर जोर देते थे

1931 में 23 मार्च को भगत सिंह और उनके साथियों की शहादत के बाद लोहिया ने अपना जन्मदिन मनाना बन्द कर ही दिया था.

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हमारे देश के आधुनिक इतिहास में कई ऐसे दिन हैं, जिन्हें हमारे एक से ज्यादा नायकों की जयंतियां या शहादत दिवस होने का श्रेय हासिल है. जब भी ऐसा कोई दिन आता है, हमें उसे उन सभी नायकों के बीच ‘बांटने’ की असुविधा का सामना पड़ता है. आज की यानी 23 मार्च की तारीख भी उनमें से एक है. 1910 में उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले के अकबरपुर कस्बे में जो अब अम्बेडकरनगर जिले का मुख्यालय है, इसी दिन प्रख्यात समाजवादी चिंतक डॉ. राममनोहर लोहिया का जन्म हुआ था. स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान 1931 में क्रूर अंग्रेजों ने इसी दिन शहीद-ए-आजम सरदार भगत सिंह और उनके राजगुरु व सुखदेव जैसे क्रांतिकारी साथियों को शहीद कर डाला, तो यह उनका शहादत दिवस भी हो गया.

2 अक्टूबर के बारे में तो बताने की जरूरत भी नहीं कि 1869 में पोरबन्दर में इसी दिन पैदा हुए मोहनदास कर्मचंद गांधी हमारे राष्ट्रपिता हैं, जबकि 1904 में इसी दिन मुगलसराय में जन्मे ‘गुदड़ी के लाल’ नन्हे ने पहले तो अपनी स्थिति के लिए इंच-दर-इंच संघर्ष कर किया, फिर लालबहादुर शास्त्री के रूप में देश का दूसरा प्रधानमंत्री बनकर राष्ट्रपिता के गुणों, मूल्यों व नैतिकताओं के अगली राजनीतिक पीढ़ी में अंतरण की बेमिसाल कोशिशें कीं.

इसी तरह 11 अक्टूबर को लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जयंती है और स्टार ऑफ द मिलेनियम अमिताभ बच्चन का जन्मदिन भी. लोकनायक का जन्म 1902 में उत्तर प्रदेश व बिहार की सीमा पर स्थित सिताबदियारा गांव में इसी दिन हुआ था. हम जानते हैं कि उन्होंने 1977 में हमें दूसरी आजादी दिलायी थी. वह आजादी जो इंदिरा गांधी ने जून, 1975 में इमर्जेंसी लगाकर और सारे मौलिक अधिकार छीनकर खत्म कर दी थी. 1942 में इसी दिन ‘मधुशाला’ के सर्जक हरिवंश राय बच्चन के घर अमिताभ बच्चन पैदा हुए.


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31 अक्टूबर का दिन तो भारतीय राजनीति के तीन बड़े धुरंधरों-सरदार वल्लभभाई पटेल, आचार्य नरेन्द्रदेव और इंदिरा गांधी से जुड़ा हुआ है. 1875 में बाम्बे प्रेसीडेंसी (अब गुजरात) के नडियाद में इस तिथि ने लाडबा व झवेरभाई पटेल को उनकी चौथी संतान का मुंह दिखाया तो हमने सरदार वल्लभभाई पटेल जैसा लौह पुरुष पाया और 1889 में इसने संयुक्त प्रांत (अब उत्तर प्रदेश) के सीतापुर में जवाहिरा व बलदेव प्रसाद के घर अविनाशीलाल को जन्माया तो हमने उसे भारतीय समाजवाद के पितामह आचार्य नरेन्द्रदेव में बदलते देखा.

लेकिन 1984 में पगलायी हुई आतंकवादी हिंसा ने देश का दीया बुझाने के लिए इसी तिथि को चुना और तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को उनके निवास पर उन्हीं के सुरक्षाकर्मियों के हाथों शहीद करा दिया, तो पाने का यह सिलसिला पलटकर गंवाने में बदल गया. इस तरह कि हम अभी तक हिसाब नहीं लगा पाये कि हमने उस दिन गांधी को गंवाकर कमला और जवाहरलाल की बेटी व देश की पहली महिला प्रधानमंत्री के अलावा क्या-क्या गंवाया!

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जब भी इस तरह के बंटवारे वाली तारीखें आती हैं, जताती हैं कि अपनी विरासत व विभूतियों को याद करने की तमीज के लिए हमें नीर-छीर या कि निर्मल विवेक की दरकार है. सवाल है कि क्या हम अपने आचरण से यह प्रदर्शित कर पा रहे हैं कि वह हमारे खासकर हमारी सरकारी और सामाजिक व्यवस्थाओं के पास है?

साफ कहें तो डॉ. लोहिया भारतीय राजनीति के संभवतः अकेले ऐसे नेता थे, जिनके पास इसको लेकर एक सुविचारित सिद्धांत था. वे हर हाल में शहादत दिवसों को जयंतियों पर तरजीह देने के पक्ष में थे. उनका मानना था कि जन्म पर हमारा कतई वश नहीं होता और हम पैदा होते हैं तो सिर्फ उन माता-पिता या परिजनों-प्रियजनों के होते हैं, जो हमारा या हम उनका चुनाव नहीं होते. लेकिन शहादतें बिना हमारे कुछ कहे, हमारे पक्ष, उसूलों व मान्यताओं का ऐलान कर देती हैं. यह भी बता देती हैं कि हम अपनी शहादत तक वास्तव में किनके लिए जीते-मरते रहे?

यकीनन, हमारे पास अपने देश या समाज को देने के लिए जान से बढ़कर कुछ नहीं होता. दिल की बात बीच में लायें तो वह भी जान की सलामती तक ही सलामत रहता है. ऐसे में कोई देश के लिए अपनी जान लुटा दे तो शहादत दिवस पर उसे सलाम करने के लिए हजार जन्मदिन या जयंतियां कुर्बान की जा सकती हैं. इसीलिए 1931 में 23 मार्च को भगत सिंह और उनके साथियों की शहादतों के बाद उन्होंने (लोहिया) खुद तो अपना जन्मदिन मनाना बन्द कर ही दिया था, अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को भी उसे मनाने से मना कर दिया था. कोई बहुत आग्रह करता तो उससे साफ कह देते थे कि अब 23 मार्च सरदार भगत सिंह, राजगुरू व सुखदेव का शहादत दिवस है और उसे उसी रूप में याद किया जाना चाहिए.

अपने बारे में उनका कहना था : ‘लोग मेरी बात सुनेंगे पर शायद मेरे मरने के बाद’ और जयंतियों की बाबत यह कि किसी भी विभूति की जयंतियां मनाना या प्रतिमाएं लगाना तब तक शुरू नहीं किया जाना चाहिए, जब तक इतिहास पूरी तरह निरपेक्ष होकर उसके योगदान की समीक्षा करने में सक्षम न हो जाये. उन्होंने इसके लिए बाकायदा एक समय सीमा तय की थी, जो दशकों में नहीं शताब्दियों में थी. यह और बात है कि आज की तारीख में वह समय सीमा उनके अनुयायी तक स्वीकार नहीं कर रहे.

यों, उनके इस ‘सिद्धांत’ में एक और खामी है. यह कि जयंतियों व शहादतों के बीच प्राथमिकताओं के चुनाव में यह भले ही हमारी मदद करता हो, अक्टूबर की 2 तारीख को बापू और शास्त्री जैसी दो महान विभूतियों की जयंतियों के अद्भुत संयोग से जुड़ी उलझनें नहीं सुलझा पाता. कई बार हमारी सरकारें और समाज 2 अक्टूबर को ‘श्रद्धासुमन’ अर्पित करने के लिए अपने स्टोर रूमों में धूल खा रही महात्मा की तस्वीरें निकालकर धुलवाते-पोंछवाते हैं, तो इतना विवेक भी नहीं प्रदर्शित कर पाते कि उनमें से कुछ सुमन शास्त्री जी की तस्वीरों के नाम कर दें. ठीक है कि वे गांधी जैसे महात्मा नहीं थे, लेकिन उनका योगदान इतना उपेक्षणीय भी नहीं कि उनकी जयंती पर पड़ने वाली महात्मा की जयंती की छाया को इतनी लम्बी कर दिया जाये कि वह उसका अंधेरा बन जाये.

इसी तरह सेलीब्रिटीज को अपना रोल माडल मानने वाली पीढ़ी को 11 अक्टूबर को अमिताभ बच्चन का जन्मदिन ‘सेलीब्रेट’ करते हुए याद नहीं आता कि वहीं लोकनायक जयप्रकाश नारायण का जन्मदिन भी है. ऐसे में 23 मार्च को शहाद-ए-आजम भगत सिंह और डॉ. लोहिया के बीच तर्कसंगत चुनाव की बात भी क्या की जाये?

इसी कारण, और तो और, हरिवंशराय बच्चन जैसे अपने समय के महत्वपूर्ण व लोकप्रिय कवि भी भाई लोगों की निगाह में अमिताभ बच्चन के पिता भर रह गये हैं. प्रसंगवश, हरिवंशराय बच्चन ने अपनी आत्मकथा में शायद इसी स्थिति की कल्पना करते हुए पूछा था- क्या भूलूं, क्या याद करूं? ताजा संदर्भ में हमारे लिए इसे खुद से इस रूप में पूछना उपयुक्त होगा : अपने नायकों की जयंतियों व शहादत दिवसों पर उन्हें कैसे याद करें और कैसे भूलें? इसकी तमीज कहां से लायें?

(लेखक जनमोर्चा अख़बार के स्थानीय संपादक हैं, यह लेख उनका निजी विचार है)


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