Monday, 8 August, 2022
होममत-विमतकभी तिरंगे को ‘अशुभ’ बताने वाले RSS, BJP के वारिस अब उसे घर-घर फहरवा रहे

कभी तिरंगे को ‘अशुभ’ बताने वाले RSS, BJP के वारिस अब उसे घर-घर फहरवा रहे

काश, हमारे लोकतंत्र के दबाव में वह (आरएसएस) देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने के अपने मंसूबे के बरक्स खुद को उन मानकों, मूल्यों, सपनों व सिद्धांतों वगैरह के प्रति भी समर्पित कर पाता, तिरंगा जिनका प्रतीक है.

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निस्संदेह, 8 साल पहले 2014 में नरेंद्र मोदी के ‘महानायकत्व’ के बूते अभूतपूर्व सत्तारोहण के बाद से भारतीय जनता पार्टी और उसकी सरकारें देश के तिरंगे को लेकर अपूर्व उत्साह का प्रदर्शन करती आ रही हैं. यह बात और है कि यह उत्साह भी तिरंगा यात्राएं निकालकर ‘गौरवान्वित’ होने की उनकी कोशिशों को जम्मू-कश्मीर के जनवरी, 2018 के बहुचर्चित कठुआ मामले में बलात्कारियों के लिए तिरंगा लहराने की शर्म से नहीं बचा पाता.

अलबत्ता, अब आजादी के अमृत महोत्सव के उपलक्ष्य में उन्होंने ‘हर घर तिरंगा’ अभियान की सफलता के लिए अनेक पापड़ बेलते हुए जिस तरह झंडा संहिता को बदल डाला है, यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी गत रविवार की ‘मन की बात’ में भी सारे देशवासियों से 13 से 15 अगस्त तक अपने घरों पर तिरंगे फहराने का आह्वान किया है, उससे धरती अपनी धुरी पर पूरे 360 अंश घूम गई लगती है. इस लगने का कारण उनके पितृपुरुषों के दृष्टिकोण में है, जिसके तहत वे तिरंगे को देश के लिए अशुभ और हिन्दुओं के लिए अस्वीकार्य बताया करते थे.

हम चाहें तो इसको अपने लोकतंत्र की शक्ति का प्रतीक या चमत्कार बताकर खुश भी हो सकते हैं कि तिरंगे को अशुभ व अस्वीकार्य बताने वालों के वारिस सत्ताधीश अब खुद उसे फहराने व सारे देश से फहराने का आह्वान करने को मजबूर हैं-वैसे ही जैसे सत्ता संभालने के लिए संविधान की शपथ लेने को. लेकिन इससे यह तथ्य नहीं बदलने वाला कि उनके पितृपुरुषों का, जिसमें आनुषंगिक संगठनों समेत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनसंघ व भाजपा के कर्णधार शामिल हैं, ज्यादातर इतिहास तिरंगे के सम्पूर्ण नकार या विद्वेष के लिए उसके ‘सबसे अलग’ इस्तेमाल का रहा है.


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आरएसएस ने तिरंगे को नहीं किया स्वीकार

जानकारों के अनुसार संविधानसभा में राष्ट्रध्वज के निर्धारण की प्रक्रिया में उसके एच.बी.कामथ, सेठ गोविन्ददास, सर्वपल्ली राधाकृष्णन, तजम्मुल हुसैन, डॉ. एच.सी. मुखर्जी, आर. के. सिधवा, जयपाल सिंह, ज्ञानी गुरुमुख सिंह, मुसाफिर, जयनारायण व्यास, सरोजनी नायडू, फैंक रेजीनाल्ड, एन्थानी, मनिस्वामी पिल्ले जैसे सदस्यों ने पं. जवाहरलाल नेहरू के प्रस्ताव का समर्थन कर तिरंगे को एक स्वर से राष्ट्रीय झंडे के रूप में स्वीकार किया तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को उसे आधे-अधूरे मन से भी स्वीकार करना गवारा नहीं था, क्योंकि तब उसे तिरंगे के बजाय भगवा झंडा चाहिए था और उसके नेता उसी के प्रति अनुराग जताते घूम रहे थे.

वरिष्ठ राजनीति विज्ञानी डाॅ. रामबहादुर वर्मा बताते हैं कि 14 जुलाई, 1946 को संघ प्रमुख गुरू एम. एस. गोलवलकर का दावा था कि भगवा झंडा ही हमारी महान संस्कृति को सम्पूर्णता में व्यक्त करता है. यह ईश्वर का रूप है और हमें विश्वास है कि अंत में पूरा राष्ट्र इस भगवा ध्वज के आगे सिर नवायेगा. दूसरी ओर जुलाई 1947 में बाबासाहब डाॅ. भीमराव अम्बेडकर के बम्बई प्रवास के दौरान हिन्दू महासभा के कार्यकर्ताओं ने उनसे भेंट की और सुझाया था कि भगवा झंडे को ही राष्ट्रीय झंडा बनाया जाये. 10 जुलाई, 1947 को बाबासाहब वापस दिल्ली जाने लगे तो हिन्दुत्ववादियों द्वारा उन्हें शांताक्रूज हवाई अड्डे पर भगवा झंडा अर्पित कर कहा गया था कि उसके लिए आंदोलन करना पड़ा तो वे वह भी करेंगे.

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डाॅ. वर्मा के अनुसार उस दौर में संघ का अंग्रेजी मुखपत्र ‘आर्गनाइजर’ उन दिनों इसको लेकर लगातार व्यथित था कि संविधान सभा तिरंगे को राष्ट्रीय झंडा बनाना चाहती है. 7 जुलाई, 1947 के अंक में ‘नेशनल फ्लैग’ शीर्षक से उसमें प्रकाशित उसके सम्पादकीय में मांग की गयी थी कि तिरंगे की जगह भगवा को राष्ट्रध्वज बनाया जाना चाहिए. उसमें यह भी कहा गया था कि ‘भारत के सभी सम्प्रदायों एवं दलों को स्वीकार्य झंडे का तर्क देना मूर्खता के सिवा कुछ नहीं है. वही झंडा राष्ट्रीय झंडा हो सकता है, जो अकेले हिन्दूू राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता हो. हम सभी सम्प्रदायों की इच्छाओं, आकांक्षाओं को पूरा करने की दृष्टि से झंडे का चयन नहीं कर सकते.’ इतना ही नहीं, यह लिखते हुए कि भगवा झंडे को सिर्फ वही नहीं अपना सकते जो मूर्ख या दुष्ट हैं, कहा गया था सिर्फ यही झंडा (भगवा झंडा) हिन्दुस्तान का सच्चा राष्ट्रीय झंडा हो सकता है. राष्ट्र को वही सिर्फ यही मान्य होगा.

तीन की संख्या को बताया था अशुभ

स्वाधीनता के पूर्व इस प्रकरण पर इस मुखपत्र में लिखे गये प्रायः सभी सम्पादकीयों में तिरंगे की जगह भगवा झंडे को राष्ट्रीय झंडा बनाने की मांग की जाती रही थी. आजादी के सिर्फ एक दिन पहले उसके 14 अगस्त, 1947 के अंक में ‘मिस्ट्री बिहाइंड द भगवा ध्वज’ शीर्षक लेख प्रकाशित हुआ था, जिसमें लालकिले पर भगवा झंडा फहराने की मांग के साथ तिरंगे को राष्ट्रीय झंडा बनाने की खुलकर निंदा की गयी थी. लिखा गया था: ‘वे लोग जो भाग्य के बल पर सत्ता में आ गये हैं, हमारे हाथों में भले ही तिरंगा पकड़ा दें, पर यह कभी हिन्दुओं का आदर नहीं पा सकेगा और न उनके द्वारा अपनाया जा सकेगा. तीन की संख्या अपने आप में अशुभ है और तीन रंगों वाला झंडा निश्चित रूप से मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभाव डालेगा और यह देश के लिए हानिकारक होगा.

आजादी के बाद भी संघ परिवार में तिरंगे की आलोचना करना नहीं ही छोड़ा था. विश्व हिन्दू परिषद के निर्देशन में काम करने वाली संत समिति ने 13 एव 14 अगस्त, 1982 को हुई अपनी एक बैठक में भारतीय संविधान को हिन्दूविरोधी घोषित करते हुए स्वामी मुक्तानंद सरस्वती की अध्यक्षता में चार सदस्यीय समिति का गठन किया था. समिति द्वारा तैयार दस्तावेज में राष्ट्रगान की भर्त्सना करते हुए घोषित किया गया था कि राष्ट्रीय झंडे में जो अशोक चक्र है, उससे साम्राज्यवाद की गंध आती है. अशोक चक्र की यह व्याख्या इस तथ्य के बावजूद थी कि यह प्रेम, समता व भाईचारे का प्रतीक है. इसे इस बात से मिलाकर देखा जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गत 11 जुलाई को नये संसद भवन की छत पर अशोक स्तम्भ की जिस अनुकृति का अनावरण किया, उसके सिंहों की मुखमुद्रा ऐसी बना दी गई है कि वह प्रेम, समता और भाईचारे की विलोम लगने लगे.

इसलिए हर घर तिरंगे को संघ परिवार की मजबूरी या अपने लोकतंत्र का चमत्कार मानते हुए भी याद रखना चाहिए कि उसके नेता तिरंगे को विद्वेष भड़काने के लिए भी इस्तेमाल करते रहे हैं. मुरली मनोहर जोशी का 1992 में श्रीनगर के लालचौक पर तो उमा भारती का 1994 में कर्नाटक के हुबली में तिरंगा फहराना ऐसा ही था.

हुबली में तो इसे लेकर बाद में हिंसा भड़क भी उठी थी.

गौरतलब है कि 2017 में जनता दल यूनाइटेड के बागी नेता शरद यादव के ‘साझा विरासत बचाओ’ सम्मेलन में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा था कि भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं या स्वयंसेवकों ने तिरंगे को तब तक नमन नहीं किया, जब तक सत्ता उनके हाथ नहीं आ गयी, तो भाजपा की ओर से जवाब देते हुए रविशंकर प्रसाद ने यह कहकर छुट्टी कर दी थी कि भाजपा का सत्तारोहण राहुल के पैदा होने के पहले ही शुरू हो गया था.

आरएसएस ने नागपुर मुख्यालय पर पहली बार फहराया झंडा

कैसे कहते कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 2002 में अपने नागपुर स्थित मुख्यालय पर पहली बार तिरंगा तब फहराया था, जब उसे लगा कि अन्यथा देश के प्रति उसकी निष्ठा पर सवाल खड़े किये जायेंगे. इससे पहले राष्ट्रप्रेमी युवा दल के तीन सदस्यों-बाबा मेंढे, रमेश कलम्बे और दिलीप चटवानी-ने 2001 के गणतंत्र दिवस पर उसके मुख्यालय पर तिरंगा फहराने का प्रयास किया तो संघ ने उन पर मुकदमा दर्ज करा दिया था और नागपुर केस नम्बर 176, अगस्त 2013 में अदालत द्वारा बाइज्जत बरी किये जाने तक उन्हें निशाने पर भी लिये रखा था.

मतलब साफ है कि तिरंगा फहराना देशभक्ति है तो संघ अभी 20-21 साल पहले ही देशभक्त हुआ है! काश, हमारे लोकतंत्र के दबाव में वह (संघ) देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने के अपने मंसूबे के बरक्स खुद को उन मानकों, मूल्यों, सपनों व सिद्धांतों वगैरह के प्रति भी समर्पित कर पाता, तिरंगा जिनका प्रतीक है.


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(कृष्ण प्रताप सिंह फैज़ाबाद स्थित जनमोर्चा अखबार के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)

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