Wednesday, 5 October, 2022
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दिमागी दबाव बनाने के लिए हवाई क्षेत्र के अतिक्रमण के चीनी खेल का भारत को देना होगा जवाब          

भारत के सामने अपनी सेना को संसाधन पहुंचाने का ही मसला नहीं है, उसके राजनीतिक नेतृत्व को नारेबाजी छोड़कर नतीजे देने वाले सुधारों को लागू करना पड़ेगा. 

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भारत और चीन की सेनाओं के बीच इस महीने के शुरू में हुई वार्ता के मुद्दों में लद्दाख में हवाई क्षेत्र के अतिक्रमण का मुद्दा भी शामिल हो गया. दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के आस-पास विश्वास बढ़ाने वाले कदमों को लेकर 1996 में किए गए समझौते का उल्लंघन करने के आरोप लगाए. इस समझौते में कहा गया है कि तमाम तरह के लड़ाकू विमान जिनमें फाइटर, बॉम्बर, टोही, मिलिट्री ट्रेनर, हथियारबंद हेलिकॉप्टर और दूसरे हथियारबंद दूसरे विमान शामिल हैं. एलएसी के दोनों ओर 10 किमी के क्षेत्र में उड़ान नहीं भरेंगे. इस मकसद से सैन्य तनाव पर काबू करने के लिए एक अलग हॉटलाइन बनाई जाएगी या मौजूदा हॉटलाइन का इस्तेमाल किया जाएगा. लेकिन, यह महज एक कल्पना ही होगी कि हॉटलाइन लड़ाकू विमान की गति का मुक़ाबला कर पाएगी. ज्यादा-से-ज्यादा, यह घटना के बाद सूचनाओं के लेन-देन में काम आ सकती है.

भारतीय नजरिए से देखें तो तिब्बत के पठार पर चीन ने अपनी जो हवाई ताकत जुटाई है. वह उसके लिए चिंता का बड़ा कारण है. जिस तरह इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास किया गया है और बड़ी संख्या में फौजी विमान तैनात किए गए हैं उसके बाद, भारतीय वायुसेना की पहले जो भी बढ़त रही हो वह खत्म हो गई है.

चीन का दिमागी खेल 

ताइवान, पूर्वी एशिया, दक्षिण चीन सागर में अमेरिका और उसके मित्र देशों के साथ चीन की बढ़ती फौजी टक्कर से हमें उसकी इस व्यापक रणनीति की ओर ध्यान जाना चाहिए कि भारत के साथ उसकी बड़ी सैन्य टक्कर रणनीतिक टकराव के मुख्य मोर्चे से उसका ध्यान भटकाएगी. भारत के रणनीतिक योजनाकार चीन की सकल राष्ट्रीय शक्ति में वृद्धि पर तो ध्यान दें ही, उन्हें याद रखना चाहिए कि ताकत और वह भी फौजी ताकत संदर्भ के साथ बदलती रहती है. चीन भारत के खिलाफ कितनी ताकत का इस्तेमाल करेगा, यह इस पर निर्भर होगा कि अपने मुख्य हितों को पूरा करने के बाद उसके पास कितनी ताकत बची है. दूसरी ओर, चीन के आक्रामक तेवर और अहंकार के कारण उसके खिलाफ एकजुट हो रहे देशों की संख्या बढ़ रही है. इसलिए भारत के मुक़ाबले उसकी तुलनात्मक ताकत कमजोर पड़ रही है.

तिब्बत में चीन की बढ़ती हवाई ताकत ऐसा आदर्श सैन्य आधार है जिस पर सैन्य शक्ति की ऐसी छवि बनाई जा सकती है जिसका इस्तेमाल मनोवैज्ञानिक वर्चस्व बनाने के लिए किया जा सकता है और इसमें जवाबी कार्रवाई के उकसावे का खतरा न्यूनतम रहता है. इसके अलावा, ताकत का प्रदर्शन करने और शक्तिशाली होने की छवि प्रदर्शित करने के लिए लड़ाकू विमान की तस्वीर काफी माकूल होती है. धमकाने के लिए यह आदर्श साधन है और चीन ने ताइवान में इनका खूब इस्तेमाल किया है.

सार यह कि हवाई ताकत अक्सर बड़े दिमागी खेल का हिस्सा होता है.

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हवाई ताकत की सैन्य प्रभावशीलता अनुभव से हासिल ज्ञान और विकसित सिद्धांत की दृष्टि से हासिल वैचारिक क्षमता में भी निहित होती है. कहा जा सकता है कि इस मामले में भारतीय वायुसेना को बढ़त हासिल है क्योंकि उसे युद्ध का ज्यादा अनुभव है और उसने तकनीकी रूप से विकसित देशों की वायु सेनाओं के साथ कार्रवाई की है. इसके साथ, तिब्बत में चीनी वायुसेना जिस ऊंचाई पर है उसके कारण वह मैदानी क्षेत्र से ऑपरेशन करने वाली वायुसेना के मुक़ाबले मुश्किल में होगी. लेकिन, मनोवैज्ञानिक दृष्टि से चीन सूचना क्षेत्र में इस धारणा के बूते बढ़त ले सकता है कि भारतीय विमानन उद्योग और इन्फ्रास्ट्रक्चर अभी खुद को विकसित करने में ही जुटा हुआ है.

चीन हवाई क्षेत्र के उल्लंघनों पर वार्ता करने को जो तैयार हुआ है उसे उसकी इस चाल के संदर्भ में देखा जाना चाहिए कि वह उत्तरी सीमाओं पर सैन्य टकराव को बंद करना चाहता है. बड़ा खेल यह है कि भारत को इस उप-महादेश में ही सीमित करके रखा जाए.

चीन फिलहाल उत्तरी सीमाओं पर सैन्य खतरे को बढ़ाने में लगा है. अग्रिम मोर्चों पर अपनी थल सेना स्थायी रूप से तैनात करना और इसके साथ हवाई शक्ति में इजाफा उसके राजनीतिक इरादों को स्पष्ट करता है.

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राजनीतिक नेतृत्व आगे आए

भारत के लिए चुनौती यह है कि वह अपनी नौसैनिक क्षमता में तेजी से वृद्धि लाते हुए हिमालय क्षेत्र में चीन के खेल को नाकाम करे. चीन जिस तरह दूसरे क्षेत्रों में टकराव में उलझ रहा है वह भारत के लिए अपनी सैन्य क्षमताएं तेजी से बढ़ाने का मौका प्रदान कर रहा है. चीन उत्तर में जहां-तहां सैन्य दबाव जो बढ़ा रहा है वह उसकी ऑपरेशन संबंधी चाल है. हवाई और जमीनी क्षेत्रों में अतिक्रमणों का जैसे को तैसा वाले अंदाज में उसके क्षेत्र में अतिक्रमण करके जवाब दिया जाना चाहिए क्योंकि चीन यही भाषा समझता है. भारत को जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया करने से बचना भी जरूरी लेकिन यह करने से ज्यादा कहना आसान है और इसके लिए राजनीतिक-सैन्य हलक़ों के बीच ज्यादा संवाद जरूरी है. दुर्भाग्य से, इस तरह के संवाद में निरंतरता और गहराई की कमी है. संरचना को लेकर चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) की बड़ी पहल और थिएटर कमांड सिस्टम की ओर कदम दरअसल सिविल-मिलिट्री संवादों और सेनाओं के बीच एकजुटता को बेहतर बनाने के लिए उठाए गए थे लेकिन वे ठंडे बस्ते में चले गए हैं.

मुख्य मुद्दा नेशनल डिफेंस को पर्याप्त संसाधन मुहैया कराना ही नहीं है बल्कि यह भी है कि राजनीतिक नेतृत्व ने जिन सुधारों को बेहद जरूरी माना है उन्हें आगे बढ़ाए. वह नारों से ऊपर उठकर परिणाम केंद्रित उपायों पर ज़ोर दे. उसे इस तथ्य को मानना होगा कि वक़्त भारत के पक्ष नहीं है. वैसे, कई पहल की गई है, जिनमें रक्षा उत्पादन के सेक्टर में की गई पहल भी शामिल है. लेकिन उनमें से अधिकांश या तो कागजी शेर जैसे हैं या उनकी प्रगति सुस्त है. इस बीच, सुधारों को मिल रहे राजनीतिक संरक्षण का इस्तेमाल प्रचार में और चुनावी फायदा उठाने में भी किया जाने लगा है.

नेशनल डिफेंस के क्षेत्र में बेहद जरूरी सुधारों की सुस्त गति राजनीतिक और रणनीतिक दृष्टि से अस्वीकार्य होनी चाहिए. संसदीय निगरानी में कोताही बनी हुई है और घरेलू राजनीति की चालों के कारण यह उम्मीद भी कमजोर हो रही है कि इन्हें प्रभावी रूप से लागू किया जा सकेगा. इसमें शक नहीं है कि ज़िम्मेदारी कार्यपालिका के विभिन्न अंगों की है. राजनीति, नौकरशाही और सैन्य हलक़ों के नेतृत्व को अगुआई करनी पड़ेगी, उन्हें सरकार के पूरे तौर-तरीके में तालमेल बिठाना पड़ेगा और गति बढ़ानी पड़ेगी. भारत जब आज़ादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है तब, जो लोग सत्ता की बागडोर थामे हुए हैं उन्हें यह एक पसंद के तौर पर नहीं बल्कि जरूरत के तौर पर सक्रिय करे यही उम्मीद की जानी चाहिए.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
(लेफ्टिनेंट जनरल (डॉ.) प्रकाश मेनन (रिटायर) तक्षशिला इंस्टीट्यूशन में स्ट्रैटेजिक स्टडीज के डायरेक्टर हैं; वे नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल सेक्रेटेरिएट के पूर्व सैन्य सलाहकार भी हैं. उनका ट्विटर हैंडल @prakashmenon51 है. व्यक्त विचार निजी है)

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