Friday, 12 August, 2022
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पाकिस्तान और चीन एक गैर-भरोसेमंद तालिबानी सरकार की उम्मीद कर रहे हैं, भारत को भी यही करना चाहिए

हक़्क़ानी गुट के भारत विरोधी एजेंडा के कारण पाकिस्तान तालिबानी सरकार में उसकी प्रभावशाली भूमिका चाहता है इसलिए हमें सचेत रहने की जरूरत है.

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अफगानिस्तान में तीन सप्ताह की मुहिम में तालिबान ने पंजशीर घाटी को छोड़ पूरे मुल्क को अपने कब्जे कर लिया था. अब ताजा खबरें आ रही हैं कि पंजशीर में भी विरोधियों ने घुटने टेक दिए हैं. मुल्क पूरी तरह से हथियारबंद तालिबानी लड़ाकों के कब्जे में तो था मगर राजधानी काबुल में कोई सरकार नहीं थी. तालिबानी नेताओं के मातहत कामचलाऊ किस्म का प्रशासन काम कर रहा है. इसका अर्थ यह है कि तालिबान के विभिन्न गुटों के बीच आपसी तनाव कायम है और उसका कोई निपटारा नहीं हुआ है.

पाकिस्तानी आईएसआई के चीफ के काबुल दौरे से साफ है कि पाकिस्तान विभिन्न गुटों के बीच सुलह कराने के साथ-साथ यह कोशिश भी कर रहा है कि उससे जुड़े हक़्क़ानी गुट जैसे गुटों को राजनीतिक लाभ का बड़ा हिस्सा मिले. पाकिस्तान की ख़्वाहिश है कि उसकी सीमा से सटे प्रमुख अफगान सूबों की गवर्नरी हक़्क़ानी गुट को मिले. यह तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) को पाकिस्तान में अपने निशानों पर सीमा पार से हमले करने से रोकने में काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है. हाल में बलूचिस्तान में एक टीटीपी लड़ाके के फिदायीन बम हमले से साफ है कि इस ओर से खतरा कायम है. तालिबानी सरकार में हक़्क़ानी गुट की प्रभावी भूमिका में पाकिस्तान की दिलचस्पी की एक वजह इस गुट का भारत विरोधी एजेंडा भी है. पाकिस्तान अफगानिस्तान में भारत की किसी तरह की मौजूदगी नहीं चाहता, ना ही यह चाहता है कि वहां भारत का सहायता कार्यक्रम चले. वह यह भी चाहेगा कि भारत के साथ अफगानिस्तान का व्यापार भी शुरू ना हो. लेकिन तालिबान के कुछ गुटों को यह पसंद नहीं हो सकता है, खासकर मुल्ला बरादर के दोहा गुट को. लेकिन हक़्क़ानी गुट से पाकिस्तानी एजेंडा के समर्थन की उम्मीद की जा सकती है.

अगर काबुल में भारत फिर से मौजूद हुआ तो उसके दूतावास या उसके कर्मचारियों पर आतंकी हमला हो सकता है और तब भारत जल्दबाज़ी में वापस लौट सकता है. पाकिस्तानी आईएसआई की शह पर भारतीय राजनयिक मिशनों पर हक़्क़ानी गुट के हमलों के इतिहास के मद्देनजर तालिबानी सरकार में राजनीतिक सत्ता और पदों के बंटवारे में भारत की विशेष दिलचस्पी होगी. हक़्क़ानी गुट को अगर काफी बड़ी भूमिका दी गई, तो भारत के हित में यही होगा कि वह तालिबानी सरकार के आश्वासनों के बावजूद काबुल में अपनी राजनयिक मौजूदगी बहाल करने में जल्दबाज़ी ना करे. अफगानिस्तान के साथ रिश्ता बनाए रखना और उसके लोगों को मानवीय सहायता देते रहना अच्छी बात है लेकिन फिलहाल इससे आगे बढ़ना ठीक नहीं होगा.


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भारत की स्थिति भिन्न है

यूरोपीय देशों और अमेरिका के मुक़ाबले भारत की स्थिति भिन्न है. तालिबानी शासन में मानवाधिकारों के उल्लंघन और महिलाओं पर हमलों को लेकर चिंता तो जाहिर की जा रही है, लेकिन उनकी मुख्य चिंता यह है कि अफगान शरणार्थियों को वे अपने देश में आने से कैसे रोकें. इसलिए जर्मनी की एंजेला मर्केल जैसी नेता ज़ोर दे रही हैं कि पश्चिमी देशों को तालिबान से बात करनी चाहिए.

तालिबान की ओर से कुछ पेशकश अफगानिस्तान में उसके शासन को वैधता प्रदान करने के लिए पर्याप्त होगी ताकि परेशान अफगानों के लिए अपने दरवाजे ना खोलने का औचित्य हाथ लगे, और उन्हें अपने नये शासकों की दया पर छोड़ा जा सके. इन दिनों पश्चिमी टिप्पणियां जमीनी हकीकत को कबूल करने, और ‘अपनी नाक बंद करके’ बर्बर तथा कट्टरपंथी गुट से बात करने और जिहादी आतंकियों को परे रखने में उसकी मदद लेने की बातें कर रही हैं.

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विडंबना यह है कि तालिबान ही सबसे कामयाब जिहादी गुट है और अपनी जीत को हर जगह जिहाद की कामयाबी के रूप में देख रहा है. उसे एक ‘राष्ट्रवादी’ संगठन के रूप में पेश किया जा रहा है, जो केवल अफगानिस्तान पर शासन करना चाहता है. लेकिन राष्ट्रवाद से तालिबान प्रेरणा नहीं लेता है. उसका इस्लामी ब्रांड वह औज़ार है, जो राष्ट्रवादी तथा क़बायली पहचानों को इस्लाम के व्यापक खांचे में समाहित कर देता है. यह पाकिस्तान के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि उसे डर है कि पख्तून पुनः संयोजनवाद डुरंड रेखा का अतिक्रमण न कर डाले. चीन और रूस को भी इसी तरह की चिंता है. रूस ने काबुल में अपना दूतावास बनाए रखा है लेकिन इसके साथ ही वह उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास भी कर रहा है ताकि अफगानिस्तान से जिहादी तत्व सीमा पार से आतंकी हमला ना कर बैठें. चीन लगभग रोज यह आश्वासन चाह रहा है कि पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामी आंदोलन, ऊईघर उग्रवादी गुट को अफगान जमीन से चीन के शिंजियांग को खतरा पहुंचाने की छूट ना दी जाए. तालिबान के आश्वासनों पर किसी को भरोसा नहीं है. भारत को भी नहीं करना चाहिए.

तालिबान की जीत खतरनाक

पूरा इस्लामी जिहादी खेमा तालिबान की जीत को किसी राष्ट्रवादी आंदोलन की सफलता के रूप में नहीं देख रहा है बल्कि इसे पश्चिम तथा मुस्लिम विरोधी माने जाने वालों के खिलाफ कट्टरपंथी व हिंसक ब्रांड के इस्लाम की जीत के रूप में देख रहा है. ऐसे ही एक ब्रांड को अब सत्ता और आधार मिल गया है. इस जीत से बड़ी-बड़ी उम्मीदें बांधी जा सकती हैं, जिससे हिंसक उग्रवाद को नया बढ़ावा मिल सकता है. इससे उन ताकतों को भारी मनोविज्ञानिक प्रोत्साहन मिल सकता है, जिसके क्या नतीजे सामने आएंगे यह ना तो स्पष्ट हैं और ना उनका कोई अंदाजा है. भारत में इसका असर जम्मू-कश्मीर में निश्चित महसूस होगा.

भारत में बहस यह हो रही है कि हमें तालिबान से बात करनी चाहिए या नहीं, उसकी सरकार बन जाए तो उसे मान्यता दी जाए या नहीं, उसके आश्वासनों पर भरोसा किया जाए या नहीं और उनके आधार पर वहां फिर अपनी राजनयिक और सहायक मौजूदगी बहाल की जाए या नहीं. सरकार ने तालिबान से संवाद करने और संबंध बनाने का फैसला कर लिया है. इसमें और औपचारिक मान्यता देने में अंतर है. भारत इस मामले में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहमति में शामिल हो सकता है, जो कि इस शर्त पर होगी कि तालिबान अपने मुल्क में मानवाधिकारों के मानकों का पालन करेगा और आतंकी गुटों को दूसरे देशों के खिलाफ कार्रवाई के लिए अफगान की जमीन का इस्तेमाल नहीं करने देगा. इसके बाद हमें काबुल में अपनी राजनयिक मौजूदगी बहाल करने और विकास तथा जनकल्याण में सहायता फिर से शुरू करने का अहम फैसला करना पड़ेगा. इसके लिए हमें सभी जोखिमों तथा लाभों का सावधानी से आकलन करना चाहिए क्योंकि तालिबान के आश्वासनों पर बहुत भरोसा नहीं किया जा सकता.

(श्याम सरन पूर्व विदेश सचिव और सीपीआर में सीनियर फेलो हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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