Saturday, 4 December, 2021
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कृषि कानूनों की घर वापसी से साफ है कि दादागिरी से कानून पास करना समझदारी नहीं

बीजेपी का चाहे जितना वर्चस्व हो भारत राज्यों का एक संघ है और उनमें से केवल 12 में ही उसके मुख्यमंत्री सत्ता में हैं. कृषि राज्यों का विषय है और अधिकांश भारत आंख मूंद कर उसका अनुसरण नहीं करता

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तीन नए कृषि कानूनों को रद्द करने की घोषणा करके मोदी सरकार ने एक सही कदम उठाया है. लंबे समय से घिसट रहे झगड़े को सुलझाने का यही एक रास्ता था लेकिन इससे यह तथ्य नहीं बदल जाता कि इन कृषि कानूनों से कुल मिलाकर सुधार ही होता और किसानों का भला होता. यह तथ्य भी नहीं बदल जाता कि ये कानून शुरू से ही निष्प्राण और परस्पर विरोधी थे.

लोकतंत्र में यह महत्व नहीं रखता कि किसी नीति के बारे में शासक कितने आश्वस्त हैं कि वह जनता के हित में है. शासकों को पहले जनता को इस बारे में आश्वस्त करना होता है. 2020 की गर्मियों में जब यह सुधारवादी कदम उठाया गया था तब किसी को इसकी जरूरत नहीं महसूस हो रही थी. जो भी, शासकों को संसद में मिला बहुमत अभी ताजा, और जोश बढ़ाने वाला था. विपक्ष नदारद था. मीडिया कुल मिलकर विरोधी नहीं था बल्कि दोस्ताना ही था. इन सुधारों के समर्थक जिनमें यह लेखक भी शामिल था, कह रहे थे कि संकट का लाभ उठाना चाहिए. सो, संसदीय प्रक्रियाओं की बारीकियों की चिंता क्यों की जाए? छलांग लगाने से पहले पाराशूट की जांच क्यों की जाए?

शुरू के कुछ सप्ताहों के अंदर ही साफ हो गया कि किसी ने पूर्व तैयारी करने, विपक्ष या अपने सहयोगियों (मसलन शिरोमणि अकाली दल) के साथ ही मिलकर आम सहमति बनाने या भावी बदलावों से प्रभावित होने वालों को आश्वस्त करने की जहमत नहीं उठाई थी. बिना विचार-विमर्श के, बिना बहस किए, सर्जिकल स्ट्राइकनुमा नोटबंदी जैसा घालमेल कर चुकी मोदी सरकार को यह तो पता होना ही चाहिए था कि आप झटका देने और दबदबा जताने की नीति अपनाते हुए बड़े फैसले नहीं कर सकते.

कृषि क़ानूनों के मामले में पहली बड़ी गलती यह की गई कि उन्हें अध्यादेश के रूप में लाया गया. हम जानते है कि जब आपको क्रूर बहुमत हासिल हो जाता है तब आप समझने लगते हैं कि आप संसद के साथ भी मनमानी कर सकते हैं. अध्यादेश जारी कर दो तो उसके बाद इसे कानून बना देना एक औपचारिकता रह जाती है. इसका अर्थ यह होता है कि संसद की मंजूरी निश्चित हो जाती है और बहस महज किताबी मतलब की बनकर रह जाती है.

यह सब ऐसे मसलों के लिए तो चल सकता है जिन पर पहले से व्यापक सहमति हो या जो कम लोगों को प्रभावित करते हों लेकिन जब आप कृषि जैसे राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मसले को उठा रहे हों जिससे आपकी करीब आधी आबादी सीधे प्रभावित होती हो वैसे मसले को क्या अध्यादेश के जरिए ही निबटाना जरूरी है? इस सोच से कि ओ भाई तुम देहाती, गंवार लोग! हम जानते हैं कि तुम्हारी भलाई किसमें है. इसलिए, हमें शुक्रिया कहो और काम पर लग जाओ!

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मानव जाति के पहले और सबसे परंपरागत व्यवसाय, खेती के मामले में यह सब नहीं चलता. कृषि के कारोबार पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाए जाते हुए सख्त रूप ले लेते हैं. आप चाहे कितने भी लोकप्रिय हों अगर आप यह सोचते हैं कि उन्हें किसी फरमान से बदल देंगे तो आप मुगालते में हैं. हरित क्रांति से पहले पांच साल तक उसके लिए जमीन तैयार की गई थी, किसानों से सीधा संवाद करके उन्हें समझाया-बुझाया गया था. उस क्रांति के विचार के देसी प्रचारक उभरे और उन्होंने लक्षित क्षेत्र के किसानों को कायल किया. अब हम तीन अध्यादेशों के जरिए रातोरात उनकी आदतों और अर्थव्यवस्था को बदल डालना चाहते हैं.

हरित क्रांति 53 साल पहले आई थी. उसने अपना काम पूरा कर दिया है, यह जानने के लिए पंजाब को देखना ही काफी है. अगर नए कृषि कानूनों का सबसे प्रबल विरोध उस राज्य में हो रहा है जिसे इनकी सबसे ज्यादा जरूरत है तो इससे यही साबित होता है कि सुधारक (इस मामले में मोदी सरकार) ने पूर्व-तैयारी नहीं की.

इसके ऊपर वह अहंकार था जो लगातार दूसरी बार और कहीं बड़े बहुमत से सत्ता में वापसी से पैदा हुआ था. बीजेपी सत्ता के मद में इतनी डूब गई है कि आंतरिक बहस या असहमति को उसने इस कदर उपेक्षित कर दिया है कि कोई भी यह समझने या मानने को तैयार नहीं था कि पूरे उत्तर भारत में ‘मोदी का जादू’ जिस राज्य पर नहीं चला वह पंजाब ही क्यों है.


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सिखों को समझने की बीजेपी-आरएसएस की गहरी अक्षमता ने मामले को और पेचीदा बना दिया. हकीकत यह है कि सिखों और हिंदुओं में बेशक बहुत समानताएं हैं लेकिन वे हिंदू नहीं हैं. सिखों में बड़ी संख्या उन लोगों की है जो यह मानते हैं कि ईसाई या इस्लाम धर्म की तरह हिंदू धर्म को भी अपना नहीं माना जा सकता.

जब उनलोगों ने देख लिया कि सिख रास्ते पर नहीं आ रहे बल्कि दिल्ली की घेराबंदी करके अवज्ञा कर रहे हैं तब बदनाम करने और साजिश के झूठे आरोप लगाने की मुहिम शुरू कर दी गई. टीवी चैनलों पर उड़ान भरने भाजपाई परवाजों ने खालिस्तान, विदेशी हाथ, सिख उग्रवाद जैसे जुमले उछालने शुरू कर दिए. तब तक, नए कृषि कानूनों की पैरोकारी का समय निकल चुका था.

एक तो पंजाब, सिखों और जाटों को समझ पाने में बीजेपी की अक्षमता, इसके साथ इस तथ्य की उपेक्षा भी कि दिल्ली के करीब के बड़े क्षेत्र और हिंदी पट्टी में ऐसे करोड़ों लोग हैं जो नरेंद्र मोदी के पीछे आंख मूंद कर चलने को तैयार नहीं हैं. दूसरे, संसद के प्रति सम्मान की कमी भी. तो, खचरे को घोड़े आगे लगा दो, एक अध्यादेश उछाल दो और उसे राज्यसभा से जबरन मंजूर करवा लो. इस छल-छद्म को पूरे देश ने देखा. इस सबको जरा एक किसान बनकर देखिए, जो न केवल अपने पारंपरिक व्यवसाय बल्कि दो पीढ़ियों वाली जीवनशैली में किए जा रहे इस नाटकीय बदलाव के प्रति सबसे शंकालु और अनजान है. वह सोचता है कि ये लोग अचानक यह सब कर रहे हैं और इन्हें मेरे लिए बहुत बड़ी बात बता रहे हैं लेकिन मुझे यह सुविधा देने को क्यों तैयार नहीं हैं कि संसद के दोनों सदनों में इस पर उपयुक्त बहस और मतदान होता देख सकूं?

बीजेपी ने अपने कदम वापस खींचने का यह दूसरा बड़ा फैसला किया है. भूमि अधिग्रहण के नए विधेयक को भी इसी बदनुमा हड़बड़ी, बिना पूर्व-तैयारी और बिना आम सहमति बनाए लाया गया था. अपना बहुमत है, विधेयक पास करवा लो लेकिन राहुल गांधी एक चुस्त जुमले ‘सूट बूट की सरकार’ ने इस विधेयक का अंतिम क्रिया-कर्म कर दिया. हालांकि लोकसभा इसे पास कर चुकी थी लेकिन सर्वविजेता राजनीतिक नेतृत्व को कोई सबक भूलने के लिए पांच साल काफी होते हैं.

2019 के बाद से संसद ने कानून बनाने की ऐसी अफरातफरी खूब देखी है. उदाहरण के लिए, अनुच्छेद 370 और कश्मीर के विशेष दर्जे को लेकर किए गए फैसले को अचानक एक सुबह संसद में लाकर पटक दिया गया. शाम तक सब कुछ वैसे ही खत्म कर दिया गया जैसे भारतीय क्रिकेट टीम ने टी-20 विश्वकप में स्कॉटलैंड टीम को 39 गेंदों में निबटा दिया था. कश्मीर मसले पर विपक्ष बंटा हुआ था, राष्ट्रीय जनमत पक्ष में था, कश्मीर और कश्मीरी बहुत अलग थे. इसके बाद आया नागरिकता कानून (सीएए) जिसके साथ एनआरसी का शोर भी शामिल था लेकिन इससे बीजेपी को कुछ हासिल नहीं हुआ.

इस सबके बावजूद वह पश्चिम बंगाल हार गई, दिल्ली को अपनी आंखों के सामने जलते देखने की शर्म झेलनी पड़ी और अब अपने सबसे अहम, करीबी और दोस्ताना पड़ोसी बांग्लादेश के साथ रिश्ते संभालने के लिए जोड़-तोड़ करनी पड़ रही है. अब सीएए भी मृतप्राय है. जिस तरह इसकी पैकेजिंग और प्रस्तुति की गई उसी ने इसे मार डाला. आप इस तरह का कोई कानून बनाकर खाड़ी के अरबों और बांग्लादेश से दोस्ती की भी उम्मीद नहीं रख सकते हैं. एक बार मामला जब पार्टी के हित और राष्ट्रीय हित के अहम पहलुओं का हो, तब कदम वापस खींचने के सिवा कोई रास्ता नहीं रह जाता.

आर्थिक सुधारों के मामले में भी हम दो बड़ी कदम-वापसी देख चुके हैं. हालांकि उन फैसलों का हम संपादकीय रूप से समर्थन कर चुके हैं. संसद द्वारा एक साल पहले पारित नए श्रम कानूनों को अभी तक अधिसूचित नहीं किया गया है. लघु बचत की सरकारी योजनाओं के लिए बाज़ार की स्थितियों के मद्देनजर ब्याज दरें कम करने के फैसले को वापस ले लिया गया है. ऐसा लगता है, दोनों मामलों में किसी की सांसें फूलने लगी थीं.

किसी को कड़े सबक मिल गए हैं. यह सबक लोकतंत्र में, चाहे वह कितना भी दबा हुआ या आहत क्यों न हो, संसदीय बहुमत की सीमाओं के बारे में है कि वह अभी भी दस्तक दे रही है. दूसरे, आपका चाहे कितना भी वर्चस्व क्यों न भारत राज्यों का संघ है और 28 में से सिर्फ 12 राज्यों में आपके मुख्यमंत्री सत्ता में हैं. इसका अर्थ यह है कि भारत का बड़ा दायरा ऐसा है जो बिना सवाल उठाए आपके पीछे नहीं चल रहा है. राज्यों को साथ लिए बिना इसके बुनियादी ढांचे में परिवर्तन करेंगे तो आप घृष्ट, बेहद अहंकारी माने जाएंगे.

अंतिम सबक सबसे महत्वपूर्ण है. वह सबक एक महादेश के आकार के विविधतापूर्ण और संघीय व्यवस्था वाले देश को किसी राज्य के मुख्यमंत्री की तरह चलाने की कोशिश करने से संबंध रखता है. हमारे अधिकतर राज्यों में विधानसभाओं के सत्र आननफानन चलाए जाते हैं, कोई बहस नहीं होती, मुख्यमंत्री तानाशाह की तरह व्यवहार करते हैं. ये सभी दलों के रोग हैं. आप सोचते हैं कि आपके हाथ में सीबीआई, ईडी, एनआइए, एनसीबी जैसी एजेंसियां हैं तो आप सर्वशक्तिशाली हैं और संघीय भावना को भी कुचल सकते हैं. नहीं, आप ऐसा नहीं कर सकते.

क्या इन सबसे कोई सबक लिया जाएगा? हम नहीं जानते. स्मार्ट लोग आम तौर पर जीत से ज्यादा हार से सबक सीखते हैं लेकिन हमने अब तक जो होते देखा है उसके कारण इसकी संभावना यहां कम ही नज़र आती है.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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