Wednesday, 25 May, 2022
होममत-विमतपुतिन के दिल्ली दौरे से मोदी को फायदा हो सकता है, उन्हें सिर्फ रूस-चीन की खाई को और गहरा करना है

पुतिन के दिल्ली दौरे से मोदी को फायदा हो सकता है, उन्हें सिर्फ रूस-चीन की खाई को और गहरा करना है

नई दिल्ली की अमेरिका के साथ बढ़ती गलबहियां उसे मॉस्को से मोलतोल में शह दिला देगी.

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पिछले हफ्ते रूस-भारत-चीन त्रिपक्षीय बैठक बिना हो-हल्ले के गुजर गई. आखिर में तीनों देशों ने सामान्य-सा साझा बयान जारी किया, जिसमें अफगानिस्तान, कोविड महामारी से जंग और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसी वैश्विक बहुपक्षीय व्यवस्था में सुधार के संबंध में बेहद आमफहम बातें की गईं.

जाहिर है, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों-अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस-में कोई भी अपने वीटो पावर को रत्ती भर कम करना नहीं चाहेगा. लेकिन संयुक्त राष्ट्र की अहमियत पर चर्चा कभी बाद में की जाए.
जो भी हो, रूस-भारत-चीन की बैठक बेहद दिलचस्प थी, बेशक, सिर्फ इसलिए नहीं कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर के कंप्यूटर स्क्रीन पर कोणार्क सूर्य मंदिर का दृश्य था. इन तीनों देशों की बैठक का संदर्भ भी उतना ही दिलचस्प था. आइए, इस पहलू को टटोलें.


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रूस यकीनन चीन का जूनियर पार्टनर नहीं

एक तो, यह त्रिपक्षीय बैठक रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के 6 दिसंबर को भारत दौरे के आसपास हुई. आखिर महामारी शुरू होने के बाद पहली बार रूसी राष्ट्र-प्रमुख द्विपक्षीय बैठक के लिए किसी दूसरे देश की यात्रा करने वाले हैं. (कोई अगर यह सोचकर हैरान है कि ऐसे में पिछली गर्मियों में जेनेवा में पुतिन की अमरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के साथ शिखर बैठक को क्या कहा जाए, तो वह द्विपक्षीय वार्ता नहीं थी).

यह भी पुरजोर संभावना है कि पुतिन फरवरी 2022 में विंटर ओलंपिक खेलों के लिए बीजिंग पहुंचेंगे-जबकि बाइडेन औपचारिक बॉयकाट पर गौर कर रहे हैं. इसलिए उनकी दिल्ली यात्रा खास अहमियत रखती है क्योंकि उन्होंने अपने देश में कोविड के मामलों में बढ़ोतरी के बावजूद यह फैसला किया है. त्रिपक्षीय वार्ता वाले प्रकरण के अलावा भारत और रूस के विदेश और रक्षा मंत्रियों के बीच 2+2 बातचीत भी होगी, जो फॉर्मेट कुछ साल पहले भारत और अमेरिका के बीच लोकप्रिय हुआ था. इसके अलावा, व्यापार और आर्थिक रिश्तों को बढ़ावा देने के लिए साझा बातचीत भी होगी.

यह भी दिलचस्प है कि पुतिन ने दिल्ली यात्रा का फैसला इसलिए किया है, ताकि इससे रूस की भारत के साथ रिश्ते में विशेष रुचि का संकेत दिया जा सके. भले ही जयशंकर और रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लवरोव के बीच इस बात को लेकर थोड़ा मतभेद हो कि भारत के समुद्री क्षेत्र को ‘भारत-प्रशांत’ (जैसा कि जयशंकर और अमेरिका कहते हैं) या ‘एशिया-प्रशांत’ कहा जाए (जैसा कि लवरोव और चीन कहना पसंद करते हैं).

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जो लोग यह कहते हैं कि रूस अब चीन के जूनियर पार्टर जैसा बर्ताव कर रहा है, तो पुतिन का शायद यह जताने का तरीका है कि दो-टूक रवैए से मध्यम मार्ग ज्यादा मुफीद है. यह भी कि दिल्ली और मास्को का रिश्ता चीन-रूस तनाव और मौजूदा दौर में मास्को और बीजिंग के बीच गलबहियां के बावजूद कायम रहा है. फिर यह भी कि रूस मजबूत, ताकतवर तथा स्वतंत्र विचारों वाले भारत में अपना निवेश जारी रखना पसंद करेगा.

चीन के साथ बैठक को हां

त्रिपक्षीय वार्ता की अहमियत की दूसरी वजह यह है कि जयशंकर चीन के विदेश मंत्री वांग यी से मिल रहे थे, भले वर्चुअल आयोजन में. यह साल भर पहले मास्को में उस मुलाकात के बाद हुआ, जब कथित तौर पर दोनों नेता लद्दाख पर किसी तरह की समझदारी बना पाए थे. कुछ जानकारों का कहना है कि भारत एलएसी पर भारत की ओर एक बफर जोन बनाने पर राजी हुआ था, लेकिन इस पर कोई औपचारिक ऐलान नहीं हुआ. दरअसल अरुणाचल प्रदेश में ‘चीनी गांव’ बसाए जाने की खबरों से चीन के साथ तनाव ही बढ़ा है.

दिलचस्प बात यह है कि जयशंकर फिर भी त्रिपक्षीय वार्ता की ओर बढ़े. कुछ लोग इसे पाखंड कहना पसंद करेंगे. वजह यह कि भारत तब एक चीनी नेता से बातचीत कर रहा है जब चीनी फौज भारतीय सैनिकों को अपने ही इलाके में गश्त करने नहीं दे रही है. हालांकि कुछ दूसरे लोग कहेंगे कि भारत को इस वार्ता की मेजबानी करने के लिए इसलिए राजी किया गया होगा, ताकि पुतिन जब यहां आएं तो मेज साफ-सुथरी हो.

सवाल यह है कि किसने यह फैसला किया होगा? क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने यह फैसला किया कि झूठी शान बघारने से निजात पाने के लिए वार्ता की मेजबानी करके चीन के आगे झुकता हुआ दिखने में कोई शर्म नहीं है? क्या भारत को ऐसा करने के लिए रूसियों ने राजी किया? क्या भारत ने इस दिशा में आगे बढऩे का फैसला इसलिए किया क्योंकि वह देखना चाहता था कि रूसी और चीनी सार्वजनिक तौर पर क्या कहते हैं?
कुल मिलाकर, यह करना सही था, क्योंकि यह बेहतर है कि भारत जैसी मंझले स्तर की ताकतों को जल्दी अपने पत्ते नहीं खोल देने चाहिए.


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भारत की संतुलन साधने की कोशिश

तीसरे, रूस-भारत-चीन जैसी बेजान-सी बैठक से भारत को इस सवाल से रू-ब-रू होने का मौका मिलता है कि वह कैसी ताकत बनना चाहता है. यह सवाल उसे 1947 में आजाद होने के बाद (और शायद उससे पहले) से ही परेशान करता रहा है और इस सवाल से फिर मुठभेड़ का वक्त इससे बेहतर और नहीं हो सकता.

पुराने अच्छे दिनों में, ‘‘गुट-निरपेक्ष’’ वह नारा था, जिससे नई दिल्ली को अपनी घरेलू आर्थिक कमजोरियों पर काबू पाने में मदद मिली थी. हालांकि वह दो महाशक्तियों के बीच नाजुक और उबड़-खाबड़ रास्ते में संतुलन साधना सीख गया.

आज, शीत-युद्ध के बाद की दुनिया में चीन बढ़ रहा है और अमेरिका बीजिंग और मास्को के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है-जल्दी ही बाइडेन और पुतिन के बीच वर्चुअल शिखर बैठक होने की संभावना है-भारत को विभिन्न दिशाओं में अपनी अहमियत के विस्तार का तरीका जरूर आजमाना चाहिए. परिपक्व होने का संकेत यह भी है कि अपना पक्ष न चुनें, बल्कि सभी दिशाओं में खेलना सीखें.

मसलन, एक पखवाड़े भी नहीं हुए कि दिल्ली ने संयुक्त राष्ट्र में क्रीमिया में मानवाधिकार उल्लंघनों पर उक्रेन प्रायोजित प्रस्ताव के खिलाफ वोट दिया. कुछ लोग कहेंगे कि भारत कश्मीर में अपनी कारगुजारियों का बचाव कर रहा था, लेकिन सच्चाई यह है कि मामला इससे अधिक बड़ा था. 2014 में ही, जब रूस ने क्रीमिया पर कब्जा दोबारा किया और उसको लेकर पश्चिमी दुनिया में काफी शोरगुल मचा था, भारत ने कहा था कि क्रीमिया रूस के प्रभाव-क्षेत्र का ही हिस्सा है.

आज, नई दिल्ली की अमेरिका से बढ़ती गलबहियां भले ही जश्न की वजह हो, मगर उसे मास्को से मोलतोल में भी दोनों तरफ से इस्तेमाल किया जा सकता है. इस नजदीकी में चीन एक प्रमुख वजह है, लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या मास्को और बीजिंग के बीच खाई को चौड़ी करने में नई दिल्ली सक्षम है या वह उस दिशा में खेलने को तैयार है.
लब्बोलुआब यह कि रूस की भारत को अत्याधुनिक एस-400 ट्रियूमएफ मिसाइल देने को तैयार है, यह साफ संकेत है कि वह रिश्ते प्रगाढ़ करना चाहता है. क्रेमलीन के इस प्यार का बदला चुकाना आसान है. मोदी और रूसी भाषा में पारंगत जयशंकर (बतौर युवा कूटनयिक रूसी उनके स्पेशलाइजेशन की भाषा थी) दोनों ही यह काम बिना आंख झपकाए कर सकते हैं.

वाकई रूस-भारत-चीन त्रिपक्षीय बैठक में निवेश का रोमांचक पहलू यह होगा कि क्या भारत रूस से अपनी करीबी के बल पर चीन और अमेरिका दोनों से कुछ शह लेने की ओर बढ़ पाता है. असलियत तो यही है कि चाहे ‘भारत-प्रशांत’ हो, या ‘एशिया-प्रशांत’, वह है तो हिंद महासागर ही. तो, दुनिया को यह एहसास होने दिया जाए.

(लेखिका दिप्रिंट में वरिष्ठ कंसल्टिंग एडिटर हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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