sajjad gani lone
सज्जाद गली लोन की कैसी होगी राजनीति/ सोशल मीडिया
Text Size:
  • 16
    Shares

अभी तक भावनात्मक और संवेदनशील मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमने वाली कश्मीर की राजनीति क्या बदलने जा रही है?  ‘हल’ और  ‘क़लम दवात’ द्वारा भावनात्मक और संवेदनशील मुद्दो के सहारे की जा रही राजनीति से हट कर कश्मीर की राजनीति अर्थव्यवस्था और विकास के प्रतीक के तौर पर जानी जाने वाले प्रतीकों के आसपास घूमने की तैयारी में है. कश्मीर में अलगाववादी राजनीति से मुख्यधारा में आए सज्जाद लोन ने अपनी पार्टी को नई सोच के साथ जो नया रूप देना शुरू किया है उससे कश्मीर की राजनीति नई दिशा पकड़ती दिखाई देती है.


यह भी पढ़ें: जब वाजपेयी ने लाल चौक पर झंडा फहराने को बेकरार भीड़ को होशियारी से संभाला


उल्लेखनीय है कि जम्मू कश्मीर में अलगाववादी राजनीति से मुख्यधारा में आए सज्जाद लोन एक नई राजनीतिक ताक़त बन रहे हैं.अब्दुल्ला व मुफ़्ती परिवारों के गढ़ में सज्जाद बेहद आक्रामकता के साथ सेंध लगा रहे हैं. विज्ञान व तकनीक में रूचि रखने वाले सज्जाद ने ‘सेब’ को अपनी पार्टी-पीपुल्स कांफ्रेस का चुनाव चिन्ह बनाया है. यह अपने आप में काफ़ी दिलचस्प भी है और महत्वपूर्ण भी. पार्टी के नीले रंग के झंडे में ‘सेब’ को जोड़ कर काफी हद तक यह साफ करने की कोशिश की है कि वे भावनात्मक और संवेदनशील मुद्दों से दूर हट कर राजनीति करने के इच्छुक हैं.

‘हल’ और ‘क़लम दवात’ की तरह ‘सेब’ का कोई संवेदनशील व भावुकता से भरा न तो इतिहास रहा है और न ही रिश्ता. ऐसे में सज्जाद द्वारा ‘सेब’ को अपना चुनाव चिन्ह बनाना काफ़ी महत्वपूर्ण माना जा रहा है और इसे नए ज़माने की राजनीति के रूप में देखा जा रहा है. ऐसी राजनीति जो विकास व प्रगति के साथ जुड़ी हो और जो भावनाओं के मक़ड़जाल में न उलझाए.


यह भी पढ़ें: भारत से नाराज़ होकर चीन के करीब जा रहा है नेपाल


‘सेब’ को पार्टी का चुनाव निशान बनाने के उनके इस निर्णय को बहुचर्चित ‘एप्पल’ ब्रांड के साथ भी जोड़ कर देखा जा रहा है. उनके विरोधी मानते हैं कि ‘सेब’ का निशान मशहूर मोबाइल कंपनी के लोगो की नकल भर है. मगर पीपुल्स कांफ्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व विधायक अब्बास वानी नहीं मानते कि ‘एप्पल’ से प्रेरित होकर ही ‘सेब’ चिन्ह को चुना गया. उनका कहना है कि सेब कश्मीर की अर्थव्यवस्था का मुख्य साधन है और हर कश्मीरी के साथ जुड़ा हुआ है.

यह विकास का प्रतीक है. वानी का कहना है कि कश्मीर में भावनाओं और संवेदनाओं के साथ खेलने का खेल बहुत हो चुका है अब कश्मीर के विकास व रोज़गार चाहिए. हालांकि वे इस बात से इंकार भी नहीं करते कि ‘एप्पल’ के कारण युवाओं को ‘सेब’ का निशान आकर्षित करेगा. ‘सेब’ को पार्टी का चिन्ह बनाने का सुझाव अब्बास वानी का ही थी जिसे सज्जाद लोन ने स्वीकार कर बक़ायदा सार्वजनिक रूप से वानी का धन्यवाद भी किया है.

‘सेब’ को अपना चुनाव चिन्ह बना कर सज्जाद ने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वीयों को मनोवैज्ञानिक रूप से मात दी है. ‘सेब’ कश्मीर की पहचान है और उसकी अर्थव्यवस्था से गहरे तौर से जुड़ा हुआ है. कश्मीर का हर घर किसी न किसी रूप से सेब के साथ जुड़ाव रखता है.

भावनाओं के खेल से दूर

वरिष्ठ पत्रकार दिनेश मन्होत्रा मानते हैं कि पहली बार कश्मीर में संवेदनशील मुद्दों से हट कर कुछ सोचने की कोशिश की गई है. दिनेश मानते हैं कि भावनाओं से न खेल कर सज्जाद लोन ने कश्मीर जैसी जगह पर नई तरह से राजनीति करने का जो साहस दिखाया है वह अपने आप में काफी महत्व रखता है.

सज्जाद लोन इन दिनों अपनी पार्टी को नए रूप व नई ताक़त से सक्रिय करने में जुटे हुए हैं. हर दिन कोई न कोई बड़ा नेता उनके दल में शामिल हो रहा है. उन्होंने सबसे अधिक नुकसान पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) को पहुंचाया है. पीडीपी के आधा दर्जन बड़े नेता व पूर्व विधायक सज्जाद लोन के दल -पीपुल्स कांफ्रेस में शामिल हो चुके हैं. अभी तक सज्जाद लोन ने अपने दांव एक मझे हुए नेता के रूप में खेले हैं और निश्चित रूप से पीडीपी व नेशनल कांफ्रेस की नींद ख़राब की है.

‘प्रतीकों के सहारे राजनीति’

उल्लेखनीय है कि कश्मीर में प्रतीकों के सहारे राजनीति होती रही है. ’हल’ और ‘क़लम दवात’ के आसपास सक्रिय रही कश्मीर की राजनीति के परिप्रेक्ष्य में यह कहना गलत नहीं होगा कि ’हल’ और ‘क़लम दवात’ मात्र चुनाव निशान भर नहीं हैं बल्कि अपने आप में गहरा ‘अर्थ’ लिए हुए हैं.

लंबे समय तक कश्मीर की राजनीति नेशनल कांफ्रेस के चुनाव चिन्ह ‘हल’ के करीब घूमती रही है. हालांकि ‘हल’ को 1940 में नेशनल कांफ्रेस के पहले अधिवेशन में पार्टी चिन्ह के रूप में चुना गया था, मगर इस चिन्ह को 1931 में कश्मीर में महाराजा के ख़िलाफ़ हुए विद्रोह के साथ जोड़ कर देखा जाता रहा है.

1931 के आंदोलन से ही शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला का उदय हुआ था. शेख़ ने कश्मीर के किसानों से भूमि सुधारों का जो वादा किया था उसे उन्होंने 1950 में सत्ता में आने पर पूरा भी किया. नेशनल कांफ्रेस को अपना मज़बूत आधार बनाने में ‘हल’ की एक मुख्य भूमिका रही है.

जिस समय नेशनल कांफ्रेस का गठन हुआ उस समय कश्मीर में राजशाही के ख़िलाफ़ आक्रोश चरम पर था और स्थिति काफ़ी संवेदनशील थी. नाज़ुक हालात में नेशनल कांफ्रेस और उसके निशान ‘हल’ का जन्म हुआ. शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला के ‘नया कश्मीर’ और बाद में पार्टी के ‘स्वायत्तता’ के नारे के साथ भी ‘हल’ को जोड़ कर देखा जाता रहा है. कश्मीर में लंबे समय तक ‘हल’ के साथ भावनात्मक रूप से लोग जुड़े रहे हैं, दौर चाहे शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला का रहा हो या फ़ारूक़ व उमर का नेशनल कांफ्रेस की ताक़त बढ़ाने में लाल झंडे में सफ़ेद रंग में अंकित ‘हल’ की एक अहम भूमिका रही है.

‘राज्य के झंडे और नेशनल कांफ्रेस के झंडे में समानता’

विशेष राज्य का दर्जा हासिल होने के कारण जम्मू कश्मीर का अपना अलग झंडा है. राज्य के झंडे और नेशनल कांफ्रेस के ‘हल’ वाले लाल रंग के झंडे में काफी समानता है. राज्य के झंडे का रंग भी लाल है और बीचोंबीच सफ़ेद रंग में ‘हल’ बना हुआ है. एक बारगी देखने पर दोनों ही झंडे एक जैसे ही लगते हैं. फ़र्क़ बस इतना है कि राज्य के झंडे में ‘हल’ के संमातर तीन सीधी रेखाएं हैं.

शायद यही कारण है कि कश्मीर में लंबे समय से लाल झंडे और ‘हल’ को राज्य की अस्मिता के तौर पर देखा जाता रहा है. दिलचस्प व महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ‘हल’ वाले लाल रंग के राज्य के झंडे को लेकर अलगावादी संगठन व नेता भी काफ़ी संवेदनशील रहे हैं. अन्य कईं मामलों में मुख्यधारा के राजनीतिक दलों से गहरे मतभेदों के बावजूद राज्य के ध्वज और अन्य प्रतीकों को लेकर अलगावादी एकमत रहे हैं. इस सबको वह कश्मीर की विशेष पहचान से जोड़ कर देखते आ रहे हैं.

‘हरे रंग और ‘क़लम दवात’ के पीछे की राजनीतिक चालाकी’

‘हल’ की ताक़त में 1999 में उस समय थोड़ी कमी देखने को मिली जब मुफ़्ती मुहम्मद सईद ने पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) का गठन किया.’सेल्फ़ रूल’ के भावुक नारे के साथ जब हरे रंग के झंडे में मुफ़्ती ने ‘क़लम दवात’ को पीडीपी का चुनाव चिन्ह घोषित किया तो उन्होंने न केवल भावनात्मक ढंग से कश्मीर के लोगों से जुड़ने की कोशिश की बल्कि ‘कलम दवात’ से ‘हल’ के दुर्ग में सेंध लगाने के साथ-साथ उसके प्रभाव को भी कम करने का प्रयास किया.

पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) का गठन ऐसे समय पर हुआ जब पाक प्रायोजित आतंकवाद और अलगाववाद चरम पर था. हरे रंग के झंडे व ‘क़लम दवात’ के सहारे मुफ़्ती महोम्मद सईद ने नेशनल कांफ्रेस के साथ-साथ अलगाववादी खेमे में भी सेंध लगाने की कोशिश की और उन्हें सफलता भी मिली.

हरे रंग और ‘क़लम दवात’ को अपनी पार्टी के प्रतीकों के रूप में चुनने के पीछे मुफ़्ती की एक राजनीतिक चालाकी भी थी.

दरअसल 1987 में मुस्लिम यूनाईटेड फ़्रंट का चुनाव निशान भी ‘क़लम दवात’ ही था. मुस्लिम यूनाईटेड फ्रंट की टिकट पर ही हिज़बुल मुजाहिदीन के प्रमुख सैयद सलाऊद्दीन और सैयद अली शाह गिलानी सहित कईं हुर्रियत नेताओं ने चुनाव लड़ा था.

1987 के विधानसभा चुनाव को ही कश्मीर के वर्तमान हालात के लिए ज़िम्मेवार माना जाता है. इन चुनाव में धांधली के आरोपों के बाद ही सैयद सलाऊद्दीन सीमा पार चला गया और कुछ ही दिनों बाद कश्मीर में आतंकवाद ने दस्तक दे दी थी.

मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने मुस्लिम यूनाईटेड फ्रंट को 1987 में मिले भावुकता भरे जन समर्थन की वजह से ही हरे रंग और ‘क़लम दवात’ को पार्टी की पहचान से जोड़ा.

(लेखक जम्मू कश्मीर के वरिष्ठ पत्रकार हैं .लंबे समय तक जनसत्ता से जुड़े रहे अब स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं .)


  • 16
    Shares
Share Your Views

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here