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विवाह समारोह की रिप्रेज़ेंटेशनल फोटो | कॉमन्स
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लगभग 70 पीढ़ियां पहले, हमारे पूर्वजों ने अंतर-विवाह करना बंद कर दिया और एण्डोगेमस समूह बनाये

हाल के वर्षों में सबसे रोमांचक खोजें जेनेटिक्स और जीनोमिक्स के क्षेत्र में रही हैं , क्योंकि इससे भारतीय आनुवंशिक कोड को समझने में महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि मिली है. “हू वी आर ऐंड हाउ वी गॉट हियर”, यह हार्वर्ड वैज्ञानिक डेविड राइख की मानव उत्पत्ति पर लिखी हालिया पुस्तक का शीर्षक है जो हमारे डीएनए के टुकड़ों से मिली जानकारी को मिलाकर लिखी गयी है.

मैं पक्षपातपूर्ण हो सकता हूं, लेकिन भारत के बारे में लिखे अध्याय – जोकि प्रिया मुरजानी, के थंगराज, लालजी सिंह, वाघेश नरसिम्हान और कई अन्य सहयोगियों के काम पर आधारित हैं – सबसे आकर्षक हैं. पिछले दशक में इन वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण सबूत खोज निकाले हैं जो दर्शाते हैं कि भारत में ज़्यादातर लोग दो पूर्वज आबादियों के मिश्रण से आते हैं जिन्हें वे एन्सेस्ट्रल नॉर्थ इंडियन (एएनआई) और एन्सेस्ट्रल साऊथ इंडियन (एएसआई) कहते हैं, और यह एएनआई घटक ऊपरी जाति और उत्तर भारतीयों के बीच भारी मात्रा में पाया जाता है. अन्य शोधकर्ताओं ने इसके और पहलू भी उजागर किये हैं और दर्शाया है कि कि एएनआई और एएसआई, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के निवासी, तिब्बती-बर्मा और ऑस्ट्रो-एशियाटिक समूह भी भारत की इस विशाल जनसंख्या में योगदान देते हैं.


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बेशक, सबसे बड़ा रहस्य जो प्राचीन डीएनए की मदद से हल हो सकता है वह है हड़प्पा वासियों की पहचान करना और हमें बताना कि उनके साथ क्या हुआ. राखीगढ़ी में मिला एक 4,500 वर्षीय कंकाल इस पहेली में महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो रहा है क्योंकि इस कंकाल में एएसआई जीन तो पाए गए लेकिन एएनआई नहीं . आने वाले वर्षों में और भी खोजें होने की सम्भावना है क्योंकि आनुवंशिकीविद और पुरातत्त्वविद एक-दूसरे को बेहतर तरीके से तो जानेंगे ही, विचारक और लेखक भी हमारी उत्पत्ति के बारे में और भी अधिक ठोस सबूत प्रस्तुत करेंगे.

डीएनए अवशेष बताते हैं कि 4,000 से भी अधिक साल पहले, एएनआई और एएसआई में अंतर्विवाह का प्रचलन नहीं था. अगले लगभग 2,000 वर्षों तक उन्होंने व्यापक रूप से अंतर्विवाह किया, जिसके परिणामस्वरूप लगभग सभी वंशज (यानी, हम) एएनआई और एएसआई का मिश्रण हैं. फिर, लगभग 70 पीढ़ियां पहले, हमारे पूर्वजों ने अंतर-विवाह करना बंद कर दिया और एण्डोगेमस या एक ही गोत्र वाले समूहों को बनाया जिन्हें हम जाति के रूप में जानते हैं. भारतीयों ने लगभग 2,000 साल पहले अपने जाति समूहों के भीतर शादी करना शुरू कर दिया था.


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हड़प्पावासी कौन थे यह अकादमिक और राजनीतिक रूचि का विषय हो सकता है लेकिन जातीय जीनोमिक्स की सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में अत्यधिक उपयोगिता है और यह हमारे भविष्य को भी आकार देने की क्षमता रखता है.

राइख़ इसे बहुत अच्छी तरह से प्रस्तुत करते हैं. वे लिखते हैं, ” भारत छोटी आबादियों की एक बड़ी संख्या से मिलकर बना है “. वे बताते हैं कि यूरोप के विपरीत सिरों पर रहने वाले लोगों की तुलना में सैकड़ों वर्षों तक एक ही गांव में एक साथ रहने वाले जाति समूहों में दो से तीन गुना अधिक तौर पर आनुवांशिक भिन्नता पायी जाती है.

थंगराज और उनके सह-शोधकर्ताओं ने पाया कि उन्होंने जिन 263 एण्डोगेमस समूहों का अध्ययन किया था, उनमें 81 से अधिक लोगों में दुनिया के सबसे प्रसिद्ध एण्डोगेमस समूहों में से गिने जानेवाले आस्खेनाजी यहूदियों और फिन्स की तुलना में “आइडेंटिटी बाय डिसेंट ” की मात्रा अधिक थी. इनमें से 14 समूहों की आबादी दस लाख से अधिक होने का अनुमान लगाया गया था. अब, क्योंकि कुछ प्रकार की आनुवांशिक बीमारियां एण्डोगेमी के कारण उत्पन्न होती हैं – कारण चाहे करीबी सम्बन्धियों से विवाह या एक ही पूर्वज से उत्पत्ति हो – हम उनके जोखिम को पहचान और कम कर सकते हैं. उन्होंने उदाहरण दिया कि कैसे एक सामुदायिक जेनेटिक परीक्षण कार्यक्रम की शुरुआत के बाद, टे-सैक्स सिंड्रोम जैसी बीमारियां जोकि किसी ज़माने में आस्खेनाजी यहूदियों में बहुतायत में पायी जाती थी, अब गायब हो चुकी हैं.


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भावी जोड़े अपने बच्चों में में बीमारियों के जोखिमों को जानने के लिए आनुवंशिक डेटाबेस का सहारा भी ले सकते हैं.

साधारण जेनेटिक परीक्षण अब एमआरआई स्कैन के जितना ही सस्ता हो चुका है. हालांकि चुनौती यह जानना है कि आखिर हम ढूंढ क्या रहे हैं. आस्खेनाजी यहूदियों ने बीमारियों की एक सूची की पहचान की है जो उनके समुदाय को विशेष रूप से प्रभावित करती है. हालांकि, यह सूची अन्य आबादियों के लिए काम नहीं करेगी. हमारे पास भारत में लगभग 5,000 एण्डोगेमस या अंतर्विवाहीय समूह हैं – जिसका अर्थ है कि हमें बीमारियों की 5,000 सूचियां बनाने की ज़रूरत है. एक सूची बनाने के लिए हमें प्रत्येक समूह से 200 व्यक्तियों के जीनोम अनुक्रमित करके उस समुदाय में प्रचलित आनुवांशिक बीमारियों के साथ उन्हें सहसंबंधित करना होगा. यदि हमारे पास सभी 5,000 समुदायों के लिए एक राष्ट्रीय जीनोमिक डेटाबेस हो तो एक साधारण सा परीक्षण आनुवंशिक बीमारियों के किसी भी जोखिम को उजागर करने में मददगार साबित होगा, जोकि आम व्यक्तियों और भावी जोड़ों, दोनों के लिए के लिए उपयोगी साबित हो सकता है. एक राष्ट्रीय जीनोमिक डेटाबेस स्थापित करना भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति का हिस्सा होना चाहिए.

इसलिए, सार्वजनिक स्वास्थ्य जाति को ख़त्म करने का एक और कारण है. अंतर्जातीय विवाह एक अच्छी बात है. हम भारतीयों की उत्पत्ति एएनआई, एएसआई और अन्य समूहों के 2,000 साल के स्वतन्त्र मिश्रण से हुई है. फिर जाति का उदय हुआ और हम कई नयी आबादियों में बंट गए.

क्या कुछ बदलेगा? बुरी खबर यह है कि पूरे भारत में, केवल 5-6 प्रतिशत विवाह ही अंतर्जातीय होते हैं. भारतीय मानव विकास सर्वेक्षण, जिसमें पूरे भारत के 42,000 से अधिक परिवार शामिल हैं, ने पाया कि यह संख्या 2004-5 और 2011-12 के बीच ज़्यादा नहीं बदली थी. मिज़ोरम (55 प्रतिशत), मेघालय (46 प्रतिशत), सिक्किम (38 प्रतिशत), जम्मू-कश्मीर (35 प्रतिशत) और गुजरात (13 प्रतिशत) में अंतर्जातीय विवाह दर उच्चतम थी जबकि मध्य प्रदेश (1 प्रतिशत), हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़ और गोवा (2 प्रतिशत प्रत्येक) और पंजाब (3 प्रतिशत) में सबसे कम. लोक फाउंडेशन और सीएमआईई द्वारा आयोजित एक अन्य सर्वेक्षण से पता चलता है कि हालाँकि दक्षिण भारतीय राज्यों में राष्ट्रीय औसत की तुलना में अंतर्जातीय विवाह दर अधिक है लेकिन तमिलनाडु में यह आंकड़ा केवल 3 प्रतिशत का ही है, जोकि रोचक है.


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लेकिन कुछ अच्छी खबरें भी हैं. लोक फाउंडेशन सर्वेक्षण से पता चलता है कि पहले की तुलना में अधिक भारतीय अपने बच्चों के लिए अंतर्जातीय विवाह स्वीकार कर रहे हैं. दिलचस्प बात यह है कि, सभी कारकों में, ज़्यादा पढ़ी लिखी महिलाएं अपने बच्चों के लिए अंतर-जाति विवाहों को तरजीह देती हैं. तो अगर आप अपनी जाति के बाहर किसी से शादी करने की सोच रहे हैं, तो आपकी संभावनाएं बेहतर होंगी यदि आपकी सास शिक्षित हो.

(प्रकटीकरण: मेरे परिवार का एक सदस्य एक ऐसी कंपनी के लिए काम करता है जो अनुवांशिक परीक्षण सेवाएं प्रदान करती है)

लेखक तक्षशिला इंस्टीट्यूशन के निदेशक हैं, जो सार्वजनिक नीति में अनुसंधान और शिक्षा के लिए एक स्वतंत्र केंद्र है.

Read in English: Inter-caste marriages are good for health of Indians. That’s what DNA testing tells us


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