Saturday, 4 December, 2021
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कृषि कानूनों पर बहस में असली मुद्दे से मोदी सरकार भी कतरा गई और कानूनों के विरोधी भी

अब जबकि कृषि कानून वापस ले लिये गए हैं, कृषि उपज मंडी समिति (APMC) व्यवस्था कितनी कारगर रही है या नहीं रही इस पर विचार करके एक नयी शुरुआत की जा सकती है

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तीन कृषि कानूनों को वापस लेने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फैसले से भारतीय कृषि कानून तथा नीति के इतिहास में नियंत्रित कायापलट की कोशिश के सबसे तकलीफदेह तथा अजीबोगरीब प्रकरण का पटाक्षेप हो गया है. इसकी एक वजह यह है कि इतिहास रचने की धुन में केंद्र सरकार ने राज्यस्तरीय सुधारों के मौजूदा गतिशील इतिहास की पूरी तरह से उपेक्षा कर दी.

पिछले एक साल में, इस तरह के अनुभवों के आधार पर अधिक उपयुक्त नियामक व्यवस्था के बारे में विचार-विमर्श करने की तमाम कोशिशों को गलत समय और गलत इरादे से की गई कोशिश, या अधिक-से-अधिक मासूम आदर्शवाद बताकर दरकिनार कर दिया गया, या निहित स्वार्थों के द्वारा यथास्थिति बनाए रखने की कोशिश बताकर खारिज कर दिया गया. लेकिन कानून के जरिए सुधार की ऐसी कोई कोशिश की जाए तो उसमें नियमन के मकसद, डिजाइन और क्षमता पर विचार-विमर्श को केंद्रीय तत्व बनाया जाना चाहिए. इस दृष्टि से देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि तीनों कृषि कानून सही मंशा और गलत प्रक्रिया वाला मामला नहीं था, जैसी कि कई लोगों की शिकायत थी; सबसे पहली समस्या यह थी कि वे कानून जनहित यानी किसानों और उपभोक्ताओं के हित में कृषि बाज़ारों के नियमन की बुनियादी जरूरत को पूरा करने में बुरी तरह विफल होने जा रहे थे.

कहा गया कि इन कानूनों का विरोध करने वाले ढोंगी हैं क्योंकि इन सुधारों पर व्यापक सहमति पहले ही बन चुकी है. लेकिन यह तर्क आम सहमति की गलत व्याख्या करता है और इससे विचलन का सही अंदाजा भी नहीं लगता. भारत के कृषि बाज़ारों के मामले में पिछले 20 वर्षों में दो मॉडल कानूनों और सुधारों के कई राज्यस्तरीय कदमों के जरिए एक आम सहमति बन चुकी है. वह यह है कि विभिन्न राज्यस्तरीय कृषि उपज मंडी समिति (एपीएमसी) अधिनियम के तहत स्थापित मंडी व्यवस्था को खोला जाए ताकि सभी राज्यों के प्राथमिक कृषि बाजारों में आने वाले तमाम ख़रीदारों और किसानों के बीच लेन-देन तथा व्यापार के लिए कई ठिकाने और माध्यम विकसित हो सकें. (28 में से जिन 27 राज्यों में एपीएमसी एक्ट लागू थे उनमें सिफ़ारिशों के मुताबिक बड़े संशोधन कर लिये गए थे और ख़रीदारों के लिए एकीकृत लाइसेंस, एक जगह बाजार फीस वसूली व्यवस्था, निजी थोक बाज़ारों के कारोबार की व्यवस्था, एपीएमसी मंडी के बाहर किसानों से सीधी खरीद, और ई-ट्रेडिंग की व्यवस्था कर दी गई थी).


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कृषि कानूनों पर बहस में चूक

वैसे, कृषि कानूनों पर बहस में आम तौर पर यह भुला दिया जाता है कि इस बात पर सहमति तो छोड़िए, इसका संकेत तक नहीं किया गया कि मकसद को हासिल करने का सबसे अच्छा तरीका भारत के कृषि बाज़ारों को एक केंद्रीय कानून के जरिए ‘बाजार क्षेत्र’ (राज्यों के अपने कानूनों के तहत काम करने वाले) और मुक्त ‘व्यापार क्षेत्र’ (अब केंद्रीय कानून के तहत) में मनमाने ढंग से विभाजित करना है. यह नियमन को और अधिक अस्पष्ट बना देता है और टकराव की जमीन तैयार करता है. यह कृषि उपजों के गंभीर ख़रीदारों, जिनमें बड़े निगम भी शामिल हैं, के लिए एक दुःस्वप्न है क्योंकि उन्हें न केवल राज्यों के अंदर बल्कि उनके बाहर भी तमाम तरह की नियमन व्यवस्थाओं से निपटना पड़ता. इस बारे में भी कोई समझौता नहीं था कि मंडी से बाहर की बिक्री के लिए ‘पैन कार्ड’ के सिवा किसी नियमन का पालन नहीं करना पड़ेगा— न पंजीकरण कारवाना होगा, न ख़रीदारी के लिए लाइसेंस लेना होगा, न किसी पक्ष के लिए जोखिम से बचाव की व्यवस्था होगी, न बाजार संबंधी सूचना का प्रसारण होगा या बाजार के लिए खुफिया व्यवस्था और विवाद निपटारे की नौकरशाही व्यवस्था होगी. यह बाजार में लेन-देन को और अपारदर्शी बना देगा और इसके साथ सूचना संबंधी जाना-पहचाना असंतुलन होगा.

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ये कोई छोटे-मोटे संशोधन नहीं थे, ये डिजाइन संबंधी गहरी खामियां थीं. प्राथमिक कृषि जींसों के लेन-देन और व्यापार के कई सुनियंत्रित स्थलों को तैयार करने, और उपयुक्त शर्तों और प्रक्रियाओं को लागू किए बिना व्यापार को पूरी तरह विनियंत्रित करने में फर्क है. अगर पंजीकरण, कीमतों और लेन-देन के रेकॉर्ड रखने और विवादों का समय पर और विश्वसनीय का निपटारा जैसी बातें ख़रीदारों के लिए बहुत कष्टदायी एवं दमनकारी लगती हैं तो इससे यह उजागर होता है कि सुधारों की हमारी कल्पना में कृषि संबंधी लेन-देन को कितना कम महत्व दिया गया है, और इसकी वास्तविक जरूरत कितनी है यह कम उजागर होता है. कोई यह अपेक्षा नहीं कर सकता कि सरकार नियंत्रित केंद्रों से बाहर भंडारों के निजी व्यापार की छूट देने का उसी तरह स्वागत किया जाएगा.

विडंबना यह है कि अधिकतर राज्यों में अधिकतर किसान इन्हीं स्थितियों में प्राथमिक लेन-देन करते हैं. हम जानते हैं कि भारतीय किसानों का विशाल हिस्सा, खासकर लघु एवं सीमांत किसानों का, जिनके नाम पर ये कानून लाए गए वे सबसे पहले तो एपीएमसी मंडियों में जाते नहीं हैं, भले ही इनमें से कई जानते हैं कि ऐसी मंडियां उनके इलाके में या आसपास मौजूद हैं या उनकी पहुंच से बाहर हैं. इस दृष्टि से, जिसे नये कृषि क़ानूनों के लिए उनका खामोश समर्थन माना जा रहा है वह वास्तव में इस बात का हताश एहसास है कि चीजें किस तरह चलती हैं. मुझे बिहार के उन किसानों से हुई बातचीत की याद आ रही है, जो अपनी उपज गांव के व्यापारियों को ही बेच रहे थे और जिन्हें तब तक यह खबर नहीं मिली थी कि उनकी एपीएमसी मंडियां प्रादेशिक अधिनियम को रद्द किए जाने के, जिसकी घोर प्रशंसा नीति निर्माताओं और उद्योग जगत ने की थी, कई वर्ष बाद बंद कर दी गई थीं. यह किसानों की अज्ञानता का मामला नहीं है बल्कि उन सुधारों की अप्रासंगिकता का है जिनमें सुधारों के प्रस्तावों और प्रक्रियाओं में किसानों और उनकी वास्तविक स्थितियों तथा सीमाओं को केंद्र में नहीं रखा गया है. कृषि बाजार के सच्चे सुधारों के लिए किसानों को यह समझाया जाता कि उनका मार्केटिंग जीवन और उसके नतीजे बदल जाएंगे, न कि यह कि यह सब जस का तस रहेगा.


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एपीएमसी में सुधार के बारे में समझदारी

अब जबकि केंद्रीय कृषि कानून वापस लिये जा रहे हैं, अच्छी शुरुआत इस बात की समझ से की जा सकती है कि जिन कई राज्यों ने इन सुधारों को लागू किया है उनमें एपीएमसी मंडी व्यवस्था को खोलने से क्या बेहतर हुआ है और क्या नहीं. क्या कुछ क्षेत्रों और जींसों के कुछ बाज़ारों ने बेहतर काम किया है? और भी क्या-क्या बदलाव किए जा सकते हैं? कौन-सी समस्याएं कानून और नियमन से संबंध रखती हैं (मसलन, लाइसेंस वाली व्यवस्था की पंजीकरण वाली व्यवस्था लाना), और किन समस्याओं के लिए प्रशासनिक पुनर्गठन की जरूरत हो सकती है (मसलन, प्रादेशिक मंडी बोर्डों और मार्केटिंग निदेशालय के अधिकारों का बंटवारा)?

बाजार के बुनियादी ढांचे और विकास के लिए सार्वजनिक कोश का बेहतर आवंटन और उपयोग भी जरूरी है. और हमें यह भी समझना होगा कि कृषि सप्लाइ नेटवर्क (मसलन, भंडारण और प्रसंस्करण) में निजी निवेश कहीं नियमन संबंधी अड़चनों, नीची मांग या सार्वजनिक सुविधाओं (बिजली, सड़क आदि) की कमी के कारण तो कम नहीं हो रहा है. सबसे अहम सवाल यह है कि बाजार के साथ किसानों के जुड़ाव को मजबूत करने के सबसे कारगर उपाय क्या हैं? और किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ), कृषि ऋण व्यवस्था, कीमत एवं उगाही में समर्थन, और जोखिम के निवारण जैसे पहलुओं में अधिक तथा प्रभावी निवेश के लिए वास्तव में क्या किया जाना चाहिए?

अगर बाज़ार फीस और टैक्स एक समस्या है और राजस्व पैदा करने से नियमन के मकसद को चोट पहुंचती है, तो इस स्थिति से इस तरह कैसे निबटा जाए कि नियमन की वर्तमान क्षमता कमजोर न हो बल्कि वह इस तरह मजबूत हो कि उससे कृषि बाज़ारों में निष्पक्षता बरती जाए और प्रतिस्पर्द्धा को भी बढ़ावा मिले? अगर राज्यों के बीच टकराव पैदा होता है तो उसे दूर करने की क्या संस्थागत व्यवस्था की जा सकती है? उदाहरण के लिए, अगर विदेश व्यापार से जुड़े किसी फैसले से किस राज्य के उत्पादक प्रभावित होते हैं (जैसा कि पिछले साल प्याज के निर्यात को लेकर महाराष्ट्र के किसान प्रभावित हुए थे) और इसको लेकर केंद्र-राज्य के बीच समस्या पैदा होती है तो इसे कैसे सुलझाया जाएगा? बात जब स्थानीय या क्षेत्रीय बाज़ारों (जहां ख़रीदारों की गोलबंदी आम बात है) में प्रतिबंधित व्यापार गतिविधियों को रोकने, उनका पता लगाने और उनसे निबटने की आती है तब राज्य के नियमन प्राधिकरण को क्या करना चाहिए? जब बाज़ार की ताकत मुख्य जींस बाज़ारों, जींस से जुड़े समूहों, और कृषि व्यवसाय, व्यापार तथा खुदरा व्यापार के खेमों में केंद्रित हो जाए तब भारतीय प्रतिस्पर्द्धा आयोग की संस्थागत क्षमता और हमारे एंटी-ट्रस्ट नियमों को कैसे मजबूत किया जाए कि जब प्रतिबंधित व्यापार गतिविधियां जैसे ही शुरू हों, उनका प्रभावी उपाय किया जा सके?


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वास्तविक कृषि बाज़ारों को गंभीरता से लें

इन सभी सवालों के जवाब खोजने के लिए भारतीय नेताओं और नीति निर्माताओं को वास्तविक और वास्तव में मौजूद कृषि बाज़ारों के प्रति गंभीरता बरतनी होगी, न कि क्रांतिकारी लफ्फाजी और सुधारों के विनियमन संबंधी तर्कों में उलझ जाना होगा. इसका अर्थ यह है कि आपको एक ऐसे देश में कृषि बाज़ारों के आम तथा खास ढांचे और संगठन को समझना होगा, जिस देश में छोटे उत्पादकों और बिक्रेताओं की संख्या बहुत बड़ी है और किसी भी बाजार क्षेत्र में खरीदार तुलनात्मक रूप से कम संख्या में हैं. इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी तरह की बिचौलिया व्यवस्था अकुशल और शोषक है या मजबूती हासिल करने के सभी उपाय खतरनाक हैं. कई प्राथमिक बाज़ार भी इसलिए ‘कमजोर’ हैं क्योंकि वे दूरदराज में स्थित हैं और उनके पास मार्केट सरप्लस सीमित है. कभी-कभी कुछ ग्रामीण व्यापारी प्रतिस्पर्द्धी स्थानीय बाज़ारों में अल्पाधिकारी व्यवस्था बन जाती है; क्षेत्र में जाकर शोध करने वालों को जींसों पर एकाधिकार रखने वाले स्थानीय गुटों (कार्टेल्स) की कहानियों का सामना भी करना पड़ा है. जैसे ओडिशा में हमें हाल में हरी मिर्च के ऐसे ही सिंडीकेट से सामना हुआ. इसका अर्थ यह है कि स्थानीय, प्राथमिक कृषि बाज़ारों में बाजार की ताकत कुछ बड़े खिलाड़ियों के हाथों में केंद्रित होना एक वास्तविक खतरा है. और यह सर्वविदित है कि बड़े पैमाने पर, कृषि-वाणिज्य व्यवस्था (मसलन अमेरिकी) के प्रमुख हलक़ों पर नियंत्रण कायम करके प्रतिबंधित व्यापार गतिविधियां चलाई जाती हैं.

इसलिए, उत्पादकों और उपभोक्ताओं के हित में कृषि बाज़ारों के सार्वजनिक नियमन के लिए एक मजबूत बहुस्तरीय व्यवस्था की जरूरत थी और पहले के मुक़ाबले आज भी ज्यादा जरूरत है. इन बाज़ारों की विशाल विविधता और जटिलता के मद्देनजर भी राज्यों को सुधारों तथा नियमन के मोर्चे पर आगे रहना होगा. इसके साथ ही राज्यों के बीच और केंद्र तथा राज्यों के बीच तालमेल तथा सहमति के लिए बेहतर संस्थागत व्यवस्था भी होनी चाहिए. अच्छी बात यह है कि तमाम राज्यों और बाज़ारों के अनुभवों से हमारे पास काफी जानकारी उपलब्ध है. हमें इन सबका उपयोग करना होगा.

इन विविध स्वार्थों के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती मंडी के कुशल से कुशल जानकार के भी होश उड़ा दे सकती है. लेकिन हमारे साझा हित इन सबके ऊपर भारी पड़ने चाहिए, और अंततः वे भारी पड़ेंगे. सभी भारतीयों के लिए लाभकारी आय, आजीविका, पोषण संबंधी सुरक्षा, और पर्यावरण अनुकूल कृषि को मजबूत करने की सबसे मूलभूत और साझा चुनौती के मद्देनजर भारत के पास लफ्फाजी छोड़कर वास्तविक प्रतिबद्धता दिखाने के सिवा और कोई उपाय नहीं है.


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(मेखला कृष्णमूर्ति सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में सीनियर फ़ेलो और ‘स्टेट कैपेसिटी इनीशिएटिव’ की निदेशक हैं, और अशोक यूनिवर्सिटी में एसोशिएट प्रोफेसर हैं. ये उनके निजी विचार हैं)

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