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हिंदी/ फोटो- डीडी न्यूज
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सब भौंचक रह गए. हिन्दी कविता पढ़ने सुनने की उस बन्द कमरे वाली बैठकी में तब चालीसी के चंगुल में कसमसाते पन्द्रह लोगों का जमावड़ा हो चुका था. फिर वहां दस लोगों के एक जत्थे का आगमन हुआ. आगंतुकों में कुछ स्कूल से हाल ही में निकली बालाएं और कुछ किशोरावस्था को लांघते बालक शामिल थे. इनकी आमद पर खिचड़ी केश वालों को तो अकबकाना था ही, जो वे न चौंकते तो अचरज़ होता. वो इसलिए कि अभी कुछ पल पहले ही उनमें से कई यह कहते बरामद हो चुके थे कि आज का युवा ’दृष्टिसंकुचन’, ’पेकैजान्धता’ एवम् ‘सोशलमिडिया मेनिया’ से ग्रसित हैं. पूजा के पहले जैसे घर के बुजुर्ग दूर रहते थे बिन नहाए-धोए ‘टट्टी गवेड़े’ बच्चों से गोया वैसे ही आज के छोरा-छोरी हिन्दी से चार बिल्लात छेंटी (चार बिलस्त की दूरी) बना कर निकलते हैं, कि कोर्स से इतर किसी किताब पर युवा दमड़ी भी ख़र्च नहीं करना चाहते ख़ासकर हिन्दी की.


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दिल का दर्द साझा करते हुए किसी लेखक बन्धु ने अपना मोबाइल निकाल एक जूना संदेसा पढ़ा, ’सर नीड एक कॉपी ऑफ योर बुक, जस्ट फॉर रीडिंग, पढ़ कर जल्दी से रिटर्न कर दूंगा,’. सारी महफ़िल एकमत थी कि कृपण मानस से संक्रमित पाठक के करीब हिन्दी की किताब जैसे पेड़ पर लटकी केरियां कि कब कोई तोता मुंह मारे या कब अमराई में हवा चले, पकी केरी गिरे और वो गपक लें. ऐसे लोगों के चलते ही हिन्दी खतरे में है और हिन्दी लेखक फटे हाल. अब आप से झूठ क्या कहूं कुछ लमहों पहले तक जब मैं भी उसी महफ़िल में बैठा सहमति में शिद्दत से सर हिला रहा था…बस ऐन उसी वक़्त उनकी आमद हुयी.

बैठक एक कला विथिका में जमी थी, सो लगा कि नुमाईश देखने की ग़रज़ से आए ’लुंगाड़े’ भूल से हमारे बीच आ बैठे हैं. खातिर दारी भी की गयी. पूछ-ताछ, बात-चीत में कुछ ये बातें सामने आईं.

‘नहीं हम तो पोएम के लिए ही आए हैं..’

‘आप को ख़बर कैसे हुयी..’

‘फेसबुक से’

‘फेऽऽस बुक से?’

‘जी सर’, उनमें से एक बोला, ‘मैं पोएम लाईक करता हूं. पढ़ना भी चाहता था. पर कहां पढ़ें, कौन सी

बुक से पढ़ना चाहिए यह इनफार्मेशन ही नहीं मिलती थी. फिर लोगों के फेसबुक स्टेटस पर पोएम पढ़ने लगा. वहीं से न्यूज मिली इस प्रोग्राम की, तो दोस्तों के साथ यहां आ गया!’

आज से दो बरस पहले के इस वाकिए ने युवा पीढ़ी के प्रति मेरी सोच को झकझोरा अवश्य पर उसमें कुछ विशेष बदलाव नहीं हो सका. मानस में गहरे पैठा ख़ुदपरस्ती का दरख़्त जैसे बरगद का वृक्ष, मामूली थपेड़े का उस पर असर हो भी तो कैसे! उसे उखाड़ने के लिए तो चाहिए कोई बाहुबली, कोई सुनामी. ऐसी एक सुनामी से मेरा सामना जयपुर में हुआ. जयपुर, जहां प्रतिवर्ष भरता है एक कुम्भ-साहित्य का महाकुम्भ, ’जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल’ (जे.एल.एफ.) के झण्डे तले बतौर वक़्ता जब पिछले दिनों सपन्न इस समागम में पहुंचा तो दीदे यों फैलीं कि चिरी की चिरी रह गईं. क्या तो मंजर था. किताबों के लिए इतने कितने लोग कि दो मनकों के बीच से निकलने के लिए पवन भी अपना बदन सिकोड़ने को मज़बूर.

छह घोषित तथा दो अघोषित मंचों से सुबह से शाम तक लगातार संवाद. अपने चयनित सत्र में पहुंचने की बेताबी में धकियाते दौड़ते लोग. अपने पसंदीदा लेखक से भेंट करने, उसके हस्ताक्षर प्राप्त करने को कतार बद्ध लोग. दौड़ते, कतार में लगे, शामियानें में शिद्दत से रचनाकार को सुनते और मंच से सवाल करते लोगों में इतने ढेर सारे युवा कि इस पीढ़ी के किताब से विरक्त होने सम्बन्धी तमाम जुमले अफ़वाह साबित होने ही वाले थे कि तभी मन-संसद का विरोधी पक्ष चीख़ने लगा -’ये अंग्रेजीदां लोग हैं, हिन्दी का हाल निरखो’.

नतीजन मेरी नज़र फ़ौरन शिकारी में तब्दील हो, जुट गयी उनकी तलाश में जो हिन्दी किताबों के सत्र में आ-जा रहे था. सुकून हुआ कि वे सत्र भी सुनकारों से अटे पड़े थे. बल्कि कुछ एक में तो हालात ऐसे बने की शामियाने में लोगों को घुसने से रोकने के लिए पहलवानों की तैनाती हुयी. ऐसे में जब कोई सेंधमार भीतर घुसता तो फिल्म हेरा-फेरी के कार की पिछली सीट पर बैठने को लेकर हुयी मारामारी का दृश्य साकार हो जाता- एक आदमी बाएं दरवाजे से जबरन भीतर, तो धक्के से दूसरा दाएं द्वार से धड़ से बाहर!


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हिन्दी की भूख़ से बिलबिलाते इन लोगों में भी युवाओं की संख्या अच्छी खासी थी. अलबत्ता अंग्रेजी सत्रों के बाद वक्ताओं से उनकी किताब पर हस्ताक्षर करवाने वाली कतार हिन्दी सत्रों से नदारद थी. यहां श्रोता लेखकों के संग सेल्फी लेकर ही प्रसन्न था. ऐसा क्यों? जो अधीरता इनमें हिन्दी के लेखकों को सुनने में दिखी वह उनकी किताब किनने में क्यों नज़र नहीं आती? क्यों श्रोता को खरीदार में बदलने में हिन्दी लेखक कमज़ोर पड़ता है?

यहां मुझे स्मरण हो रहा है कुछ कालपूर्व दिल्ली में मिले उस नवयुवक का जिसने सत्र के उपरान्त मुझसे कहा था, ’कितना अच्छा हिन्दी बोलते हैं आप, आई लव्ड योर फ्लालेस हिन्दी. मैं भी कोशिश करता हूं पर प्योर हिन्दी बोल नहीं पाता. व्हाट शुड आय डु सर?’

बोलना चाहता था कि हिन्दी के अख़बार पढ़ा करो. फिर ध्यान हुआ कि भाषा का बंटाधार करने का तो हिन्दी के अखबारों ने बीड़ा उठा रक्खा है. सो ऐंठती जुबां पर काबू कर पूछा, ‘हिन्दी में क्या पढ़ा है मित्र?’

‘प्राब्लम तो यही है सर, हिन्दी ही ठीक से रीड नहीं कर पाता.’

‘दक्षिण से हो?’

‘नहीं सर, यू.पी. से..’

बात युवा के साहित्य से जुड़ाव की चल रही है तो इसके मुतअल्लिक़ एक वाक़िया और याद आ गया. दिल्ली में घटित उपर्युक्त घटना के चंद दिनों बाद ही इंदौर में आयोजित एक साहित्य सम्मेलन के मंच पर तीन नामचीन पर अधेड़ साहित्यकार विराजित थे. ख़ूब श्रोता जुटे थे, बोलो तो आयोजक परेशान कि तिल किधर धरें. गर्मागर्म बहस चल रही थी. मुद्दा था समकालीन हिन्दी से गुम होता लोक रंग. चर्चा इस बिन्दु पर आकर थमी कि जब समकालीन लेखक, विशेषतः युवा, के मानस में जब लोक-संस्कृति नहीं धड़कती तो वह साहित्य में किस तरह बनी रहेगी? करतल ध्वनी से श्रोताओं ने मंच से अपनी सहमति का इज़हार किया. तभी कसमसाते युवा और झूमते प्रौढ़ सुनकारों के मध्य से एक स्त्री-स्वर उभरा, ‘आपने कहा कि हम युवाओं की वजह से साहित्य लोक से कट गया है तो मुझे बताएं कि साहित्यकारों ने पिछले दिनों में युवा वर्ग को लोक के क़रीब लाने का क्या प्रयास किया है? मैं उन्नीस बरस की मालवा में पली-बड़ी लड़की हूं. मुझे मेरे परिवार वालों से मालवा-संस्कृति का कभी परिचय नहीं मिला. कोई किताब मिली भी तो उनको लोक प्रथाओं को अच्छा सिद्ध करता पाया. ऐसे में क्या आप यह बताएंगे कि मैं साहित्य में अपने लोक को बचाने का प्रयास कैसे करुंगी?’ मंच पर ठहाका लगाते साहित्यसृजकों के जबड़े झूल गए. ताली पीटने को उठे हाथ हवा में थमें के थमें! शामियाने में सब सुन्न-सुट्ट!

यहां जयपुर में आज मेरी मति भी सुन्न थी हिन्दी सुनने तथा पढ़ने वालों की संख्या में विराट अंतर देख कर. जो कुछ हिन्दी इन दिनों परोस रही है अगर वह युवा मानस के संग तरंगित नहीं होता तो

हिन्दी लेखकों को सुनने के लिए इस आपाधापी के क्या मायने? कहा जा रहा है हिन्दी एक कठिन भाषा है, चुनांचे वह सर्वग्राही नहीं. जो यह सच है तो युवाओं में शुद्ध हिन्दी बोलने सुनने की उत्कंठा क्यों? इतने सवालों के बीच से ख़्याल उभरा कि किशोरों से सीधे सम्वाद ही आने वाली पीढ़ी में हिन्दी की स्वीकार्यता का ’लिटमस टेस्ट’ हो सकता है.

मेरी इस अवधारणा को जांचने का मौक़ा भी जे.एल.एफ. ने ही दिया. उसीके ’ऑऊटरीच’ कार्यक्रम के तहत मैं पहुंचा जयपुर के एक नामचीन कॉन्वेन्ट स्कूल में. मेरी शर्त थी कि बातचीत हिन्दी में होगी, और विषय रहेगा ’जो घूमा नहीं व¨ फला नहीं’. पर कक्षा में घुसा तो दिल धक्क. ग्यारहवीं-बारहवीं के बच्चों से बात करवाने का वादा था, और सामने था नवीं कक्षा के छुटकु. क्या इस वय के अंग्रेजीदां श्रोता ऐसे विचित्र विषय से ठीक तरह से जुड़ पाएंगे? बहरहाल, गांधी, अमृतलाल वेगड़, डारविन, सुभाष, राहुल सांकृत्यायन से आरम्भ हुयी बात ’तालाब’, ’अमृतस्य नर्मदा’ फूल और पाखियों से होते हुए जब हिमालय की वादियों में पहुंची तो पचास मिनिट का पूर्वनिर्धारित समय समाप्त हो चुका था. मेरे थमने का उपक्रम करते ही अब तक सांस थामें बैठे नन्हें श्रोता सम्वेद स्वर में बोल उठे,’न¨ऽ न¨ऽऽ’. बच्चों का दोपहर-भोज का समय चूक गया पर सवा दो घण्टे बाद भी वे उठने को राजी न थे. इस दौरान जो प्रश्न बच्चों ने खड़े किए उसका तो कोई सानी नहीं. वैसे तो मैं भावविभोर था पर कहीं कुछ खटक भी रहा था. मैंने लक्ष्य किया वे बच्चे पर्दे पर नुमाया साधारण से हिन्दी के वाक्य भी ठीक से पढ़ने में अक्षम थे.

यह तो होना ही था. हाल ही में प्रकाशित ’असर’ सर्वेक्षण के हवाले से माना जा सकता है कि पिछले वर्षों में शिक्षा का प्रसार तो बढ़ा पर हिन्दी लिपि को पढ़ने के स्तर में खास सुधार नहीं हुआ है. हिन्दी भाषी प्रदेशों को देखों तो आठवीं कक्षा के पचहत्तर फ़ीसद बच्चे सिर्फ़ दूसरी कक्षा के स्तर की हिन्दी ही पढ़ सकते हैं. यदि दिल्ली और जयपुर की बात करें तो यह आंकड़ा क्रमशः चौंसठ तथा चौरासी प्रतिशत है.

मायने यह कि हिन्दी के मान से नवयुवाओं का एक बड़ा तबका भाषिक-कुपोषण से ग्रस्त है. शालाओं से इतर भाषा का संस्कार देने वालों संस्थान, जैसे प्रकाशक, अख़बारों और घर-परिवार, भी अपनी जिम्मेदारी का उचित निर्वहन कहां कर रहे हैं. घरों में किताबों के कोने संकुचित होते जा रहे हैं और अख़बार भाषा नहीं संजो रहे. प्रकाशकों को तो लगता है कि युवा वर्ग के हिन्दी पाठक के बौद्धिक स्तर पर ही शुबह है. किसी समय के ’लुग्दी’ को साहित्य का जामा पहना कर परोसने की मानो होड़ सी लगी है.

सस्ती, छिछली, बाज़ी दफ़ा अश्लील किताबें ’युवा की आवाज़, ’अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ की ओट से कम उम्र पाठकों के बीच अतिशय प्रचार-प्रसार के संग उछाली जा रही है. इन किताबों के चलते हिन्दी की ओर मुड़े लोगों में से अंततः कितनों की गति गंभीर साहित्य की तरफ़ होगी यह तो समय बताएगा पर फिलवक़्त तो अनेक युवा साथी इन्हीं किताबों के चलते हिन्दी से परे सरक गए हैं. उधर पढ़ने को लालायितों तक उम्दा पुस्तकों की पुख़्ता ख़बर पहुंचने के ज़रिए संकुचित हो गए हैं. हर घर की चौखट पर सुबह सवेरे दस्तक देने वाले अख़बारों से हिन्दी पुस्तकों की समीक्षाएं लुप्तप्राय हैं. घर में साहित्य-चर्चा गुजश्ता वक़्त की बात हो चली है.

बालसाहित्य का हाल तो और भी बुरा है. बदलती सामाजिक संरचना के बायस नानी-दादियां परिवार का आवश्यक हिस्सा नहीं रहीं. मां-बापों में अवव्ल तो कथा कहने का शऊर ही नहीं ऊपर से उनको ’रिमोट एप’ के जरिए बच्चे के सम्पर्क में रहने के लिए प्रेरित किया जा रहा है. वैसे भी आला दर्जे का बाल साहित्य समकालीन हिन्दी में विरल है, ऊपर से जो सिरजा जा रहा है उसका समुचित प्रसार-प्रचार ही नहीं हो पाता. ’हिन्दी बेस्ट सेलर’ किताबों की सूची हो, पुस्तक विमोचन के मंच हों, या पत्रिकाओं में पुस्तक समीक्षा के पन्ने किवां सोशल मिडिया हर जगह से बालसाहित्य तो जैसे नदारद सा है. परिणामतः किताबों से जुड़ने की वयः में बच्चे मनलुभावन हिन्दी पुस्तकों से परिचित नहीं हो पाते. अंततः बच्चों का एक अच्छा खासा हिस्सा, जो हिन्दी साहित्य के कोण से लगभग निरक्षर रह जाता है, रस्किन बॉन्ड की लेखनी थाम पुस्तकों के संसार में घुसता है और जे.के. रॉवलिंग से गुज़रते हुए दूसरी दिशा में निकल जाता है.


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पाठकों की बाट जोहती हिन्दी की उम्दा किताबों को बेमौत मरने से बचाने हेतु बहुस्तरीय प्रयास आवश्यक हैं. स्याह बादलों के बीच आशा की किरण है सोशल मिडिया, प्राथमिक शालाओं के शिक्षक तथा बच्चों की चहेती जगह-मां की गोद. दिलख़ुश ख़बर है कि पिछले दिनों कई शिक्षकों ने अपने स्तर पर ग्रामीण अंचलों में पुस्तकालय शुरू किए और उन्हें अच्छा प्रतिसाद भी मिल रहा है. उनके ग्रंथालयों से निकली ख़बरें फेसबुक के माध्यम से दूसरों को प्रेरित भी कर रही हैं.

हिन्दी साहित्य को बच्चों व युवाओं तक पहुंचाने में पढ़ने-लिखने वालों द्वारा अच्छी किताबों की सोशल मंचों पर चर्चा तथा माता-पिता द्वारा अपने घर में हिन्दी की किताब व पत्रिकाओं को महत्वपूर्ण स्थान देने का प्रण एक महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है. सात वर्षीय बच्चे-बच्चियों को ‘झण्डु बाम’ मलते मंच पर रिकार्ड एक्शन करता देख गर्वित होने वाले लोगों के बीच भाषा और भारतीयता के संस्कार हेतु बहुस्तरीय प्रयासों की दरकार है. मातृभाषाओं में लिखीं स्तरीय किताबें इस पुनीत कार्य में महत्वपूर्ण अवदान दे सकतीं हैं.

(अजय सोडानी लेखक हैं और पेशे से न्यूरो फिज़िशियन हैं)


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