Saturday, 4 December, 2021
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कृषि कानूनों के पूरे प्रकरण ने भारत की आंतरिक फूट को उजागर किया है, अब इसे पाटने का समय है

भारत अपनी आर्थिक वृद्धि और राष्ट्रीय सुरक्षा पर मंडराती चुनौतियों का सामना सबसे पहले अपनी आंतरिक एकता को मजबूत करने की अधिकतम कोशिश किए बिना नहीं कर सकता.

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कुछ लोगों को लग सकता है कि तीन कृषि कानूनों को वापस लेने का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फैसला हमारे लोकतंत्र की जीत है. राजनीतिक अर्थव्यवस्था के अंदर सक्रिय शक्तियों ने अपनी लोकतांत्रिक शक्ति का प्रदर्शन कर दिया है. लेकिन भारत को शायद नुकसान हुआ है. क्योंकि, यह तो निर्विवाद ही है कि भारत के लिए आर्थिक तथा रणनीतिक महत्व रखने वाले कृषि क्षेत्र को सुधारों की सख्त जरूरत है. भारत को जिस दूसरी चीज का ख्याल रखना होगा वह यह है कि कमजोर सरकार, नागरिक असंतोष, महत्वपूर्ण आर्थिक सुधारों को लागू करने में असमर्थता का लाभ दुश्मन उठा सकते हैं.

कुछ दशकों से सरकार ने किसानों को सुरक्षा देने के नाम पर उन्हें सीमाओं में कैद कर रखा है. सुरक्षा के पीछे तर्क यह दिया जाता रहा है कि प्रगति के लिए यह जरूरी है. लेकिन भारतीय किसानों को यह फैसला करने की छूट देनी चाहिए कि वे क्या उगाना चाहते हैं और अपनी उपज किसे बेचना चाहते हैं. सुधारों के अभाव के चलते किसानों की हालत खराब हुई है. कृषि क्षेत्र में अहम नीतिगत सुधारों की जरूरत भी बाकी क्षेत्रों में सुधारों की जरूरत की तरह लंबे समय से महसूस की जा रही है. चंद बड़े किसानों को छोड़ भारत के बहुसंख्य किसानों की स्थायी तकलीफें और बदहाली देश के राजनीतिक तबके के लिए चिंता का कारण होना चाहिए.

किसानों, उनके आश्रितों, और देश भर में कृषि के कारोबार को सहारा देने वाली व्यवस्था से जुड़े लोगों का असंतोष भारत की आंतरिक फूट को और गहरा कर सकता है. किसानों के आंदोलन पर किसी तरह का सांप्रदायिक ठप्पा जड़ने से बचना चाहिए. बेशक, यह सब कहना आसान है, करना कठिन.


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वास्तविक है बाहरी खतरा

भारत के योजनाकारों में इस बात को लेकर कोई संदेह नहीं रहना चाहिए कि चीन और पाकिस्तान हमें कमजोर देखना चाहते हैं. चीन के इरादे अमेरिका के साथ उसकी व्यापक, विश्वस्तरीय होड़ में से पैदा हुए हैं. पाकिस्तान के इरादे उसकी इस मान्यता से उपजे हैं कि ताकतवर भारत उसके वजूद के लिए ही खतरा है. इसलिए दोनों देश भारत के विकास और प्रगति में अड़ंगा लगाने की कोशिश करेंगे. इसलिए, भूगोल और आतंकवाद पर आधारित असुरक्षा ही इन मकसदों को पूरा करने का एकमात्र साधन है. लेकिन सरकारों और राजनीतिक दलों के विभिन्न फैसलों से ऐसा लगता है कि भारत का राजनीतिक वर्ग इसकी बाह्य सुरक्षा के लिए उभर रही चुनौतियों के बारे में पर्याप्त रूप से सचेत नहीं है.

वक्त आ गया है कि प्रधानमंत्री मोदी सभी दलों के सांसदों के साथ बंद कमरे वाली एक बैठक करें और उन्हें भारत के रणनीतिक परिदृश्य की जानकारी दें. भारत अपने लिए आंतरिक तथा बाह्य खतरों के बारे में क्या सोचता है, इसकी व्याख्या प्रस्तुत की जाए. यह आंतरिक एकता को मजबूत करने की जरूरत को उजागर करेगा. बढ़ते बाहरी खतरे के खिलाफ एकजुट होने के लिए देश के राजनीतिक वर्ग को अपने मतभेद भुलाने पड़ेंगे. उन्हें असहमति के लिए भी सहमत होना होगा और देशहित के लिए जब तक जरूरी हो, अपने मतभेदों को परे रखना होगा. वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित करने वाले हिंदू बहुसंख्यकवाद और अन्य विभाजनकारी तत्वों से जुड़े सैद्धांतिक मतभेदों को भी राजनीतिक वर्ग के अंदर की आपसी समझदारी के तहत ठंडे बस्ते में डालने की जरूरत है.

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एकता नहीं होगी तो राजकाज के उन औजारों को मजबूत करने की गति धीमी पड़ जाएगी, जो भारत की भौगोलिक अखंडता, संप्रभुता, मूल्य व्यवस्था, संस्कृति और विकास की क्षमता को मजबूत करने के लिए जरूरी हैं. इसमें कोई शक नहीं है कि तीन कृषि कानूनों को वापस लेने का फैसला पंजाब जैसे सीमावर्ती राज्य में फूट डालने वाली ताकतों को कमजोर करने की ओर बढ़ाया गया एक कदम है.

आमतौर पर भारत की एकता को खतरा उसकी विविधता से उभरने वाले कारणों से पैदा होता है. धर्म भारत के लिए सबसे बड़ी विभाजनकारी ताकत है. यह धर्म के आधार पर मजबूत होते ध्रुवीकरण से स्पष्ट है. दुर्भाग्य से यह चुनावी ताकत का आधार भी बन गया है, और इसे जनसंख्या तथा बेरोजगारी में वृद्धि का सहारा मिलता है. भारत की बेरोजगार आबादी का बड़ा हिस्सा उग्रवादी विचारों की ओर आकर्षित होता है और धर्म की रक्षा के लिए खड़े सैनिक की भूमिका अपना लेता है तथा दूसरे धर्मों पर हमला करने में भी आगे रहता है.


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गलती का एहसास नहीं

प्रधानमंत्री मोदी ने कृषि सुधार के कदमों की विफलता के लिए किसानों के उस छोटे-से वर्ग को जिम्मेदार बताया है जिन्हें मुक्त व्यापार और ठेके की खेती से होने वाले फायदे नहीं दिख रहे हैं. लेकिन उन्होंने यह नहीं कहा कि सरकार किसानों से संवाद करने में विफल रही. यह विफलता तीन पहलू में दिखती है और फूट को जन्म देती है.

पहली बात तो यह है कि भाजपा और विपक्ष के बीच संवाद का अभाव है. बड़े और अहम फैसलों को संसद में बिना विस्तृत बहस के जबरन मंजूरी दिलाना आज एक चलन बन गया है. ऐसा लगता है कि दोनों पक्ष एक-दूसरे से नहीं बल्कि एक-दूसरे पर ही बात करते हैं. आमने-सामने बैठ कर समझदारी भरी बातचीत नहीं होती. इसका नतीजा यह होता है कि बातचीत को सार्थक बनाने और बेहतर नतीजे देने में सहायता करने वाले, असहमति के विचार सामने नहीं आ पाते.

दूसरा पहलू संघीय ढांचे में केंद्र-राज्य संबंधों का है. राज्यों से सलाह-मशविरा न करना केंद्र सरकार की कार्यशैली का हिस्सा बन गया है. इससे काफी असंतोष पैदा हुआ है और कई राज्यों ने अवज्ञापूर्ण रवैया अपना लिया है. यह खतरनाक स्थिति है और यह फूट को और गहरा कर सकती है.

तीसरा पहलू सरकार और जनता के बीच के रिश्ते का है. जिन लोगों के हित प्रभावित होते हों उनसे बिना कोई बातचीत किए अचानक फैसले थोप कर हैरत में डाल देना सरकार की कोई असामान्य शासन शैली नहीं रह गई है. इसके साथ जुड़ा है मीडिया का हमला, जो पूरे प्रकरण को अपना रंग देने की कोशिश करता है और मुख्यतः सरकार समर्थक विचारों को आगे बढ़ाता है. अच्छे दिन का एहसास कराने के लिए आंकड़ों की हेराफेरी भी लोगों को गलत सूचना देने, उन्हें आशान्वित और भ्रमित रखने का एक और तरीका बन गया है.

आंतरिक और बाहरी, दोनों मोर्चों पर भारत की राजनीतिक सत्ता राष्ट्रहित की खातिर सूचना को शासन के औज़ार के रूप में इस्तेमाल करने की अक्षमता से ग्रस्त है. ऐसा तब है जबकि सूचना के इस युग में इसके महत्व को व्यापक तौर पर मान्य किया जा चुका है.

वास्तव में, यह एक विरोधाभास ही है क्योंकि राजनीतिक पार्टियां अपने-अपने आईटी सेल्स की मदद से अपने दलगत हितों को तेजी से आगे बढ़ा रही हैं. दूसरी ओर, केंद्र तथा राज्य सरकारों के सार्वजनिक सूचना तंत्र में सुधार की काफी गुंजाइश है. सूचना के दायरे का प्रबंधन और संचालन करने के लिए प्रतिभाओं को आकर्षित करने में राजनीतिक दलों ने सरकारों को पीछे छोड़ दिया है.

भारत अपनी आर्थिक वृद्धि और राष्ट्रीय सुरक्षा पर मंडराती चुनौतियों का सामना सबसे पहले अपनी आंतरिक एकता को मजबूत करने की अधिकतम कोशिश किए बिना नहीं कर सकता. राजनीतिक वर्ग को जागना और सक्रिय होना पड़ेगा. प्रधानमंत्री मोदी को विदेशी नेताओं को झप्पी देना तो बहुत पसंद है, अब वे आगे बढ़कर देश में विपक्ष के कुछ नेताओं को भी गले लगाएं तो इससे लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलेगी, बेशक इसकी कीमत मामूली ही होगी.

(लेफ्टिनेंट जनरल (रिटा.) डॉ. प्रकाश मेनन तक्षशिला संस्थान, बेंगलुरू डायरेक्टर स्ट्रैटेजिक स्टडीज प्रोग्राम और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय के पूर्व सैन्य सलाहकार हैं. वह @prakashmenon51 पर ट्वीट करते हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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