Wednesday, 29 June, 2022
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ईपीएफओ का रोजगार डेटा खुश तो ज़रूर कर देता है लेकिन अभी सच्चाई की जांच की है ज़रूरत

यदि संख्याएं वास्तविक हैं, तो परीक्षण में यथावत रहेंगी। इस कार्य का उद्देश्य रोजगार पर वास्तविकता प्राप्त करना है न कि प्रचार कर वाह वाही लूटना.

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कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के रजिस्टरों से विस्मयकारी ढंग से निकले आशावादी डेटा ने लोगों को रोजगार पर फिर से तर्क-वितर्क करने को मजबूर कर दिया है और बेरोजगारी में वृद्धि की बात को अमान्य साबित कर दिया है. संख्याएं इतनी अधिक बेहतरीन हैं कि इस पर विश्वास नहीं हो रहा,अगर नए रोजगार को सटीक रूप से प्रतिबिंबित करने का दावा किया जाए,तो संख्याओं में सकारात्मकता होने की खबर की पूरी संभावना है।इस संदेश को अति उत्साही, परिवर्तनशील व्यक्तियों द्वारा विनाश में खोया नहीं जाना चाहिए.

ईपीएफओ के साथ पंजीकृत अतिरिक्त नामांकन में पिछले छः महीने से लेकर फरवरी तक 18 से 25 वर्ष तक की आयु के दो मिलियन लोग नामांकित थे, सभी आयु वर्ग के लोगों का कुल अतिरिक्त नामांकन 3.3 मिलियन था. सीधे बर्हिवेशन पर, 25 वर्ष की आयु से कम के लिए,यह आँकड़ा, हमें नई वार्षिक नामांकन दर चार मिलियन तथा अन्य सभी आयु समूहों के लिए 6.6 मिलियन की दर देता है. चूंकि कुल “कार्यात्मक” ईपीएफओ नामांकन आमतौर पर 60 मिलियन बताया जाता है, इसका मतलब यह होगा कि यदि कोई केवल युवाओं की गणना करता है तो नामांकन में वृद्धि दर 6.7 प्रतिशत से भी अधिक तथा कुल ईपीएफओ प्रणाली के लिए 11 प्रतिशत होगी. कुछ लोगों का मानना होता है कि या तो बढ़ती अर्थव्यवस्था में एक के लिए एक को परिवर्तित करके या यहाँ तक कि औपचारिक क्षेत्र के लिए भी, जब कामकाजी आबादी खुद ही 1.25 प्रतिशत पर बढ़ रही है तो रोजगार वृद्धि की दर में सिर्फ 7 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि कर सकते हैं. अगर ऐसा होता है, तो हमारे पास नौकरी के लिए दुनिया का सबसे प्रगाढ़ नौकरी बाजार होगा.

विस्तृत रोजगार प्रकरण, संभावना प्रदान करता है। जनगणना के आँकड़े बताते हैं कि भारत में कामकाजी उम्र की शुरुआत में (16-65 वर्ष) है और भारत में आयुवर्ग में 25 मिलियन लोग हैं. इसमें लगभग 13 मिलियन ऐसे लोगों से तुलना की जाती है जो हर साल पचास साल की आयु से पहले ही कामकाजी आयु में प्रवेश करते हैं, लोग जो अपनी कामकाजी उम्र के समूह से बाहर हो जाते, अगर उनकी मृत्यु नहीं होती है अन्यथा मध्य अवधि से बाहर निकल जाते. यह कामकाजी उम्र की आबादी में (25-13 =) 12 मिलियन के बीच वार्षिक वृद्धि करता है– आमतौर पर यह आँकड़े रोजगार से सम्बंधित अवसर के रूप में प्रस्तुत किये  जाते हैं।

लेकिन जो लोग कामकाजी उम्र में प्रवेश कर लेते हैं, वे अपने आप को काम करने का मौका नहीं देते। कुछ घर का खाना-खर्चा चलाने लगते हैं या फिर आगे की पढ़ाई करने लगते हैं -, पिछले 15 वर्षों में स्कूली शिक्षा के बाद नामांकन के लिए वृद्धि दर में तेजी देखी गई है। नतीजतन, भारत का रोजगार अनुपात (जो कामकाजी आयु वर्ग की आबादी के रूप में काम कर रहे हैं) 52 प्रतिशत तक नीचे आ गया है– जिन्हें मोटे तौर पर, विस्तारित श्रमिकों की देखभाल करने के लिए, हर साल अतिरिक्त नौकरियों की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए, कहा जाता है.

अगर ईपीएफओ में 25 वर्ष से कम आयु वर्ग के लोगों का नामांकन किया जाता है, जो चार मिलियन की वार्षिक दर पर है, तो इसको नई भर्ती कहा जाता है, इसके लिए लोगों को सेवानिवृत्त किया जाता है, इसका मतलब यह होगा कि ईपीएफओ के साथ पंजीकृत कंपनियां सालाना 6.24 मिलियन नई नौकरियों में से लगभग दो तिहाई नौकरियों के अवसर पैदा कर रही हैं- हालांकि कुल रोजगार का ईपीएफओ हिस्सा सिर्फ 12.5 प्रतिशत (480 मिलियन में से 60 मिलियन) है. यहां तक कि जो लोग तर्क देते हैं कि नौकरी बाजार तेजी से “औपचारिक” हो रहा है, इस निष्कर्ष पर विरोध करेंगे. अन्य बातों के अलावा,अधिक औपचारिकता का मतलब अनौपचारिक रोजगार में कमी होना चाहिए.

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मुख्य मुद्दा यह है कि ईपीएफओ नामांकन संख्या अर्थव्यवस्था में औपचारिक और अन्य प्रवृत्तियों से अलग नई नौकरियों में कितना परिवर्तन करती हैं. डेटा के उचित खनन को एक जवाब मुहैया कराना चाहिए।सहायक मुद्दा यह है कि पिछले 18 महीनों में अर्थव्यवस्था के लिए अवधि असामान्य रही हैऔर ईपीएफओ के लिए पिछले साल भी विशेष नामांकन अभियान चलाया गया था. इसलिए पिछले छः महीनों का आंकड़ा प्रदर्शक नहीं हो सकता है और कुछ महीनों के लिए निष्कर्षों को संख्याओं पर इंतजार करना होगा.

एक कदम आगे बढ़ते हुए,ईपीएफओ डेटा को वास्तविकता परीक्षण के अधीन किया जाना चाहिए, क्योंकि अन्य डेटा समूह काफी अलग बातें कह रहे हैं. यदि संख्याएं वास्तविक हैं, तो परीक्षण में टिकी रहेंगी. इसी कारण से, सर्वेक्षण के आधार पर रोजगार आधारित आंकड़ों को उत्पन्न करना और बंद करना महत्वपूर्ण नहीं है, जैसा कि सरकार का प्रस्ताव है कि ऐसा न हो कि (और न केवल रोजगार के संबंध में) यह निहित हो कि सभी सर्वेक्षण-आधारित डेटा अब संदेहजनक हैं. इस कार्य का उद्देश्य रोजगार पर वास्तविकता प्राप्त करना है न कि अधिप्रचार अंकों पर गणना करना.

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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