Friday, 20 May, 2022
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बिना सभा-रैलियों का चुनाव, किसका फायदा और किसको नुकसान

नरेंद्र मोदी आज भारत में सबसे बड़ी सोशल मीडिया पर्सनालिटी हैं. ट्विटर पर उनके मुख्य प्रोफाइल पर 7.48 करोड़ फॉलोवर हैं. फेसबुक पर उनके पेज से 4.60 करोड़ लोग जुड़े हैं.

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उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा में होने जा रहा विधानसभा चुनाव, 2022 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक अनोखा चुनाव साबित होने वाला है. ये चुनाव अभी तक बेहद सख्त कोविड गाइडलाइन के तहत हो रहे हैं. चुनाव आयोग ने रैलियों और जन सभाओं पर रोक लगाई हुई है. अगर चुनाव के दौरान कोराना संबंधी पाबंदियां जारी रहीं तो ये देश का पहला ऐसा चुनाव होगा, जिसमें चुनाव प्रचार के परंपरागत तौर तरीके – यानी सभा, जुलूस, रैली, रोड-शो आदि नहीं होंगे.

ऐसी स्थिति में मतदाताओं तक पहुंचने और अपनी बात पहुंचाने के लिए राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को दरवाजे-दरवाजे जाना होगा या मीडिया पर निर्भर रहना पड़ेगा. बिना सभा और रैलियों वाले चुनाव में मीडिया की भूमिका बहुत अहम हो जाएगी. यहां मीडिया का मतलब चैनल, अखबार, रेडियो, सोशल मीडिया, इंटरनेट सब कुछ हैं. इस तरह का पहला चुनाव होने के कारण इसके प्रभावों के बारे में पहले से पक्के तौर पर कुछ कहना उचित नहीं होगा, लेकिन अनुमान लगाया जा सकता है कि मीडिया आधारित चुनाव प्रचार में बीजेपी और बड़े दलों को बढ़त होगी और क्षेत्रीय दल और अपेक्षाकृत गरीब उम्मीदवार घाटे में रहेंगे.

2019 में कोविड का प्रकोप शुरू होने और मार्च 2020 में लगी पाबंदियों के बाद बिहार, दिल्ली, केरल, पश्चिम बंगाल. तमिलनाडु, असम और पुदुचेरी में विधानसभा चुनाव हुए, और ढेरों उपचुनाव भी हुए, लेकिन इस तरह की पाबंदी पहले कभी नहीं लगाई गई. ये विधानसभा चुनाव उस समय हुए, जब कोविड का प्रकोप अभी से ज्यादा था. लेकिन अब जाकर चुनाव आयोग ने राय बनाई है कि रैलियों और सभाओं से कोविड फैल सकता है. बहरहाल चुनाव आयोग के विवेक पर प्रश्न चिह्न लगाने का कोई कारण नहीं है. इसलिए इस बात का ही आकलन किया जाए कि ऐसी प्रचार व्यवस्था में कौन फायदे में रह सकता है.


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चुनाव प्रचार और मीडिया

किसी भी बड़े लोकतंत्र में, जहां निर्वाचन क्षेत्रों का आकार विशाल हो, कोई भी उम्मीदवार या पार्टी हर मतदाता के पास सीधे नहीं पहुंच सकती. लेकिन इस बात की कोशिश जरूर होती है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक अपनी बात पहुंचाई जाए. इसके लिए परंपरागत माध्यमों में झंडा, बैनर, पोस्टर, सभा, बैठक, रैली, गली-गली प्रचार गाड़ी घुमाना और घर-घर जाकर लोगों से मिलना शामिल है. टीएन शेषन के मुख्य निर्वाचन आयुक्त रहने के दौरान चुनाव खर्च घटाने के नाम पर परंपरागत माध्यमों का इस्तेमाल काफी मुश्किल बना दिया गया. नतीजा ये हुआ कि चुनाव में सीधे पैसे देने और मीडिया के इस्तेमाल पर जोर बढ़ा और कुल चुनाव खर्च पहले से कई गुना ज्यादा बढ़ गया.

चुनाव प्रचार का दूसरा बड़ा माध्यम मीडिया है, जिसमें चैनल, अखबार और अब डिजिटल और सोशल मीडिया शामिल है.

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मीडिया का चुनाव प्रचार के लिए इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है. लाखों मतदाताओं वाले चुनाव क्षेत्रों में चूंकि किसी भी और तरीके से हर व्यक्ति तक सीधे पहुंच पाना संभव नहीं है, इसलिए मीडिया वो माध्यम बनता है जिसके जरिए बात लाखों लोगों तक पहुंचती है.

इस बार के चुनाव में प्रचार का प्रमुख और काफी हद तक एकमात्र माध्यम यही मीडिया होगा. अब हम ये समझने की कोशिश करते हैं कि इस तरह के चुनाव प्रचार में फायदे में कौन रह सकता है. इसके लिए हम मीडिया को दो भाग में बांटते हैं. एक, चैनल और अखबार और दो सोशल और डिजिटल मीडिया.

चैनल-अखबार और चुनाव

चैनल और अखबार दुनिया के ज्यादातर देशों की तरह ही भारत में भी बड़े कारोबारी घरानों के हाथों में हैं. चैनलों और अखबारों की आमदनी का मुख्य स्रोत सर्कुलेशन का व्यूअरशिप नहीं, बल्कि विज्ञापन है. ये विज्ञापन उसी चैनल और अखबार को ज्यादा मिलते हैं, जिनके पास मध्यवर्ग और इलीट वर्ग के रीडर और व्यूअर ज्यादा होते हैं. यही वर्ग उत्पादों का प्रमुख खरीदार है और कंपनियों को ऐसा ही रीडर और व्यूअर चाहिए. इस कारोबारी ढांचे की वजह से चैनल और अखबार मुख्य रूप से मध्य वर्ग और इलीट वर्ग तक पहुंचने की कोशिश करते हैं और अपना कंटेंट उनकी अभिरुचि यानी पसंद के हिसाब से बनाते हैं.

अखबारों और चैनलों का स्वाभाविक मध्य वर्गीय और इलीट रुझान क्या बीजेपी को फायदा पहुंचाएगा? कहना मुश्किल है, लेकिन आप अपने तौर पर अंदाजा लगा सकते हैं कि भारत का मध्य वर्ग और इलीट वर्ग इस समय किस विचारधारा और इस पार्टी की ओर ज्यादा झुका हुआ है. मेरा अपना मानना है कि खासकर यूपी में इस वर्ग की पहली पसंद इस समय बीजेपी है. इसलिए यूपी में चैनल और अखबार अपने रीडर और व्यूअर का ध्यान रखते हुए बीजेपी के पक्ष में झुका हुआ कवरेज कर सकते हैं.

चैनलों और अखबारों की आमदनी का सबसे बड़ा स्रोत विज्ञापन हैं और पिछले कई वर्षों से भारत सरकार देश की सबसे बड़ी विज्ञापनदाता है. हालांकि चुनाव के दौरान राज्य सरकारों के प्रचारनुमा विज्ञापन नहीं आएंगे, लेकिन इस बीच केंद्र सरकार के विज्ञापन जारी रहेंगे. चूंकि केंद्र में इस समय बीजेपी की सरकार है, इसलिए चैनलों और अखबारों को इस बात का ध्यान रखना पड़ सकता है कि बीजेपी को एक हद से ज्यादा नकारात्मक कवरेज न दें. खिलाफ कवरेज करने वाले मीडिया संस्थानों को केंद्र सरकार के विज्ञापनों या उसके एक बड़े हिस्से से हाथ धोना पड़ सकता है. क्या अखबार और चैनल सबसे बड़े विज्ञापनदाता के दबाव में आकर पक्षपातपूर्ण कवरेज करेंगे? कवरेज का पक्षपात नाप पाना अपने आप में एक मुश्किल काम है, इसलिए इसे प्रमाणित करना आसान नहीं होगा. लेकिन आप अपना अनुमान तो लगा ही सकते हैं.


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मीडिया कवरेज, विचारधारा और न्यूजरूम की सामाजिक संरचना

चैनलों और अखबारों में काम करने वालों की धार्मिक और जातीय संरचना और उनके विचारधारात्मक रुझान से भी चुनाव कवरेज प्रभावित हो सकता है. चूंकि भारतीय मीडिया में हिंदू सवर्ण शहरी पुरुषों का वर्चस्व है, जो कई अध्ययनों से साबित हो चुकी है (ऐसी सबसे नया सर्वे ऑक्सफैम और न्यूजलॉन्ड्री का है), इसलिए इस सामाजिक समूह का राजनीतिक और विचारधारात्मक रूझान भी चुनाव कवरेज पर असर डाल सकता है. मीडिया में दलितो और पिछड़ों की अनुपस्थिति से उन दलों को कवरेज का नुकसान होगा, जिनके ज्यादातर समर्थक इन सामाजिक समूहों से हैं.

ऊपर की तीनों बातों के आधार पर मेरा अनुमान है कि खासकर उत्तर प्रदेश में अखबार और चैनलों का कवरेज बीजेपी की ओर झुका हुआ होगा. ज्यादातर चैनल और अखबार अगर एक साथ बीजेपी के पक्ष में झुका हुआ कवरेज करेंगे, तो इससे मतदाताओं की राय के प्रभावित होने का जोखिम रहेगा. इसके अलावा चूंकि बीजेपी इस समय देश की सबसे अमीर राजनीतिक पार्टी है, इसलिए वह मीडिया के विज्ञापनों पर भी ज्यादा खर्च कर पाने की स्थिति में होगी.

सोशल मीडिया में बीजेपी का बोलबाला

अब बात सोशल मीडिया की. इस खेल में बीजेपी भारत में सभी राजनीतिक दलों से काफी आगे हैं. बीजेपी के नेताओं, खासकर नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया की अहमियत को सबसे पहले पहचाना और उस पर काफी समय और धन लगाया. मध्यवर्गीय भारतीयों की विचारधारा के करीबी होने का फायदा भी बीजेपी को मिला. इसी वर्ग के पास सबसे पहले स्मार्ट फोन आया. नरेंद्र मोदी आज भारत में सबसे बड़ी सोशल मीडिया पर्सनाल्टी हैं. ट्विटर पर उनके मुख्य प्रोफाइल पर 7.48 करोड़ फॉलोवर हैं. फेसबुक पर उनके पेज से 4.60 करोड़ लोग जुड़े हैं. सपा और बसपा दोनों के सभी प्रमुख नेताओं के फॉलोवर जोड़ दें तो भी वह संख्या अकेले नरेंद्र मोदी के फॉलोवर्स से कम हैं. और फिर नरेंद्र मोदी बीजेपी के एकमात्र नेता नहीं हैं, जिनके फॉलोवर करोड़ों में हैं. योगी आदित्यनाथ के भी 1.7 करोड़ फॉलोवर हैं. अखिलेश यादव सोशल मीडिया में विपक्ष के बड़े खिलाड़ी हैं. लेकिन उनके फॉलोवर्स की संख्या योगी आदित्यनाथ से कम है.

यही नहीं, बीजेपी का एक असरदार आईटी सेल है और विदेश में बसे ज्यादातर भारतीय भी बीजेपी समर्थक रुझान रखते हैं. इसके अलावा जहां सपा और बसपा का मुख्य क्षेत्र यूपी है, वहीं बीजेपी के लोग देश भर से यूपी के चुनाव प्रचार में जुटेंगे. ये लड़ाई किसी भी मायने में बराबरी की नहीं है. फासला भी मालूली नहीं है. बीजेपी सोशल मीडिया में कोसों आगे है. बीजेपी ह्वाट्सऐप और टेलीग्राम ग्रुप के जरिए भी लोगों तक पहुंचने के लिए बेहतर स्थिति में है. उसकी तैयारी पहले की है और जमी जमाई है.

भारत खासकर यूपी जैसे अपेक्षाकृत गरीब राज्यों में बड़ी आबादी के पास स्मार्टफोन नहीं है. भारत में स्मार्टफोन कुल आबादी के 54 प्रतिशत हिस्से के पास ही है. जिस आबादी के पास स्मार्टफोन नहीं है, वे मुख्य रुप से ग्रामीण, अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी और पिछड़े लोग हैं. यहां तक अगर सोशल मीडिया नहीं पहुंचता है, तो इसका ज्यादा नुकसान उन दलों को होगा, जिनका मुख्य आधार इन सामाजिक समूहों में है. ये आबादी रैलियों और सभाओं में भीड़ तो जुटा सकती है, लेकिन हवा बनाने की इनकी क्षमता अपेक्षाकृत कम होती है.

मेरा आकलन है कि अगर चुनाव प्रचार सभा-रैली के बिना हुआ तो बीजेपी फायदे में और विपक्षी दल घाटे में रहेंगे.

(लेखक पहले इंडिया टुडे हिंदी पत्रिका में मैनेजिंग एडिटर रह चुके हैं और इन्होंने मीडिया और सोशियोलॉजी पर किताबें भी लिखी हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)


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