Friday, 21 January, 2022
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सैनिक स्कूल के पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप में जल्दबाजी न करें, यह कमजोर और भ्रष्ट बना सकता है

रक्षा मंत्रालय के नियंत्रण के बिना सैनिक स्कूल 'लोकाचार' का संरक्षण नहीं किया जा सकता है.

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वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने 2021-22 के बजट भाषण के दौरान, गैर सरकारी संगठनों, निजी स्कूलों और राज्यों की साझेदारी के साथ 100 सैनिक स्कूल स्थापित करने की नरेंद्र मोदी सरकार की मंशा के बारे में घोषणा की थी. इस कदम को काफी सकारात्मक प्रतिकिया भी मिली है. हालांकि, अब भी काफी सावधानी और सघन आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता है.

यह पहल सैन्य बलों को भविष्य में बेहतर नेतृत्व प्रदान करने के इरादे से सैनिक स्कूलों की स्थापना में भारत सरकार की भागीदारी की एक नयी कड़ी है. इन स्कूलों की स्थापना से सम्बंधित पहली लहर 1922 में रॉयल इंडियन मिलिट्री कॉलेज, देहरादून की स्थापना के साथ शुरू हुई और उसके बाद पांच अन्य रॉयल इंडियन मिलिट्री स्कूल स्थापित किये गए. यह ब्रिटिश भारतीय सेना के अधिकारी संवर्ग का भारतीयकरण के प्रयासों का एक अहम हिस्सा था. अंग्रेजों का मानना था कि पब्लिक स्कूल से मिली शिक्षा उन्हें सेना के जीवन की कठोरता और आत्म-अनुशासन के लिए अधिक उपयुक्त बनाएगी. ये स्कूल अब भारतीय सेना द्वारा नियंत्रित, वित्तपोषित और प्रशासित हैं.

दूसरी लहर साल 1961 में नए सैनिक स्कूलों की स्थापना के साथ शुरू हुई. इनकी स्थापना की प्रेरणा भी पहले से स्थापित सैन्य स्कूलों से मिली थी. उनका प्राथमिक उद्देश्य छात्रों को विभिन्न सशस्त्र सेवा-प्रशिक्षण अकादमियों में प्रवेश हेतु तैयार करना था. इसका एक और उद्देश्य अधिकारी संवर्ग में व्याप्त क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करना और कैडेट्स में शरीर, मन और चरित्र से सम्बंधित ऐसे गुणों को विकसित करना भी था जो छात्रों को एक उपयोगी नागरिक बनने में सक्षम बनाते हैं. वर्तमान में इस श्रेणी के 33 सैनिक स्कूल कार्यरत हैं. इनमे से सत्रह 1961-78 के दौरान और बाकि 16, 2003-20 के मध्य स्थापित किए गए थे. इन स्कूलों को भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय द्वारा सैनिक स्कूल सोसाइटी – जिसका नेतृत्व रक्षा सचिव करते हैं – के माध्यम से नियंत्रित/ संचालित किया जाता है.

इनका संरचनात्मक स्वरुप भारत के संघ-राज्य साझेदारी वाले मॉडल पर ही आधारित है. जहां राज्य सरकारें इनके लिए भूमि, बुनियादी ढांचा, शिक्षण सम्बन्धी स्टाफ और प्रशासनिक सुविधाएं उपलब्ध कराती हैं. वहीं, रक्षा मंत्रालय इन स्कूलों को प्रशिक्षण अनुदान प्रदान करता है और उनका वार्षिक निरीक्षण भी करता है. यह इन स्कूलों के प्रधानाध्यापकों , उप- प्रधानाध्यापकों और प्रशासनिक अधिकारी के पदों के लिए उपयुक्त सैन्य सेवा अधिकारी भी उपलब्ध कराता है. इन अधिकारियों को ‘सैनिक स्कूल से सम्बंधित लोकाचार (आचार-व्यवहार) को सही स्वरुप देने के लिए एक महत्वपूर्ण मानवीय संसाधन के रूप में माना जाता है.

ये स्कूल सीबीएसई के ही पाठ्यक्रम का पालन करते हैं और इनमें छठी कक्षा से प्रवेश की अनुमति होती है. प्रवेश सम्बन्धी आरक्षण नीति अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति, संबंधित राज्य के स्थायी निवासी होने और पूर्व सैनिकों सहित सशस्त्र बलों के कर्मियों के बच्चों से सम्बंधित आवश्यकताओं का ध्यान रखती है. छात्रों के लिए अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करने के लिए वे सभी बोर्डिंग (छात्रावास वाले) स्कूल होते हैं. हालांकि, समय के साथ, इन स्कूलों में छात्रों की अखिल भारतीय स्तर की भागीदारी वाली संरचना थोड़ी सी कमजोर पड़ गयी है.

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मॉडल और लक्ष्य के मध्य संभावित टकराव

तीसरी लहर में अब 100 और सैनिक स्कूलों की स्थापना की परिकल्पना की गई है. इस सम्बन्ध में जारी आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है- ‘यह प्रयास इच्छुक सरकारी/ निजी स्कूलों/ गैर सरकारी संगठनों के सहयोग से ‘सीबीएसई प्लस’ प्रकार के शैक्षिक वातावरण में स्कूली शिक्षा के ऐसे अवसर प्रदान करने के लिए है जो अपने स्कूलों को अन्य सैनिक स्कूलों के लोकाचार, नैतिक मूल्य आधारित प्रणाली और राष्ट्रीय गौरव सहित, स्थापित / संरेखित करना चाहते हैं. इस योजना में पहले से मौजूदा/अभी स्थापित किये जाने स्कूलों को सैनिक स्कूल पाठ्यक्रम की तर्ज पर चलाने हेतु शामिल करने की परिकल्पना की गई है. इन सैनिक स्कूलों की स्थापना का उद्देश्य बच्चों/छात्रों को राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में प्रवेश के लिए शैक्षणिक, शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार करना और इनके अंदर ऐसे शारीरिक, मानसिक और चरित्र के गुणों को विकसित करना है जिससे ये युवा आगे चलकर अच्छे और उपयोगी नागरिक बन सकें.’

यहां ध्यान देने की बात यह है की मौजूदा 33 सैनिक स्कूलों – जो संघ और राज्यों के बीच एक संयुक्त उद्यम के रूप में काम करते हैं- के मॉडल के विपरीत, अब नए सैनिक स्कूलों के लिए मौजूदा निजी स्कूलों और गैर सरकारी संगठनों के साथ साझेदारी के लिए भी दरवाजा खोल दिया गया है. यह मौजूदा मॉडल के संरचनात्मक स्वरुप में एक अहम बदलाव है. जाहिर है, नई योजना के तहत सभी स्कूलों को बोर्डिंग स्कूल होना चाहिए और उन्हें सीबीएसई पाठ्यक्रम का अनुपालन करना चाहिए. राज्य सरकारें बहुत कम बोर्डिंग स्कूल चलाती हैं और अतिरिक्त स्कूलों को वित्तीय समर्थन देने की उनकी क्षमता काफी सीमित है. राज्यों के बहुत कम हीं स्कूल सीबीएसई पाठ्यक्रम का पालन करते हैं.


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निजी/एनजीओ स्कूलों में प्रायः स्थानीय छात्र ही होते हैं और वे बहु-सांस्कृतिक नहीं हो सकते हैं. इस योजना में शामिल किये जा सकने हेतु उपलब्ध मौजूदा बोर्डिंग स्कूल एक काफी सीमित संख्या में हीं होंगे, जिनमें से अधिकांश निजी तौर पर प्रशासित होंगे. उनमें से अधिकांश अपने-अपने संकीर्ण धार्मिक/कॉर्पोरेट/पारिवारिक/सामाजिक/सांस्कृतिक विश्वासों में रचे-बसे होंगे, जो छात्रों को उनकी सीमित पहचान से परे हटाकर एक बड़े भारतीय स्वरुप के निर्माण के लिए उत्प्रेरित करने हेतु एक मेल्टिंग पॉट (पिघली धातु को आकर प्रदान करने वाला बर्तन) के रूप में कार्य करने वाले सैनिक स्कूलों के आवश्यक लोकाचार के विपरीत हो सकते है. यह इस प्रस्ताव में एक बड़ी खामी है और यह प्रस्तावित साझेदारी मॉडल की संरचनात्मक असंगति से प्रभावित है.

एक संभावित बड़ा खतरा यह भी है कि संघ और निजी पक्षकारों के बीच शिक्षा के किसी ऐसे वैचारिक रूप से झुके हुए संस्करण को बढ़ावा देने के लिए नापाक गठजोड़ विकसित हो सकता है, जो संविधान में निहित मूल्यों से बहुत अलग हो. उदाहरण के लिए, विद्या भारती को ही लें, जो ‘राष्ट्रवादी सिद्धांतों’ पर चलने वाले सबसे पुराने और सबसे बड़े समूहों में से एक है. इसका घोषित मिशन/उद्देश्य है- ‘एक ऐसी राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली को विकसित करना जो हिंदुत्व के लिए प्रतिबद्ध और देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत युवा पुरुषों और महिलाओं की एक पीढ़ी के निर्माण में मदद करेगी.’ क्या ऐसा दृष्टिकोण सैनिक स्कूल से सम्बन्घित भावना के संरक्षण और संवर्धन के अनुकूल होगा? हिंदुत्व/सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से प्रभावित हमारे कुछ भावी सैन्य नेताओं के कारण पैदा होने वाले दीर्घकालिक रणनीतिक परिणाम राजनीतिक बहस का हिस्सा बने रह सकते हैं. लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से, इस मुद्दे पर कोई भी निर्णय उन राष्ट्रीय हितों को संरक्षित करने वाले होने चाहिए जो हमें सीधे संवैधानिक मूल्यों से प्राप्त होते हैं. इसके लिए वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व को देश को अपनी-अपनी पार्टियों से ऊपर रखना होगा.

पैसा और उसका प्रभाव

अन्य नकारात्मक संभावनाओं में से एक और प्रबल संभावना यह हो सकती है, कि लाभ-उन्मुख निजी स्कूल एक नए मॉडल का विकल्प चुन सकते हैं और सशस्त्र बलों में अधिकारी बनने के लिए भारतीय युवाओं की बढ़ती मांग का आर्थिक लाभ उठाया जा सकता है. संघीय सरकार ऐसे किसी मौद्रिकीकरण का एक पक्ष भी बन सकता है और इस सबसे भ्रष्टाचार और अनुचित प्रभाव के अपनी भूमिका निभाने की संभावना बढ़ जाती है.

वर्तमान कठिन समय में, संघीय सरकार के पास उपलब्ध दुर्लभ संसाधनों को विशेषाधिकार प्राप्त युवाओं का एक ऐसा बड़ा समूह बनाने में निवेश करने की कोई आवश्यकता नहीं है, जिन्हें ‘छोटी उम्र में हीं पहचान कर किसी विशेष माध्यम से ढाला गया है. चूंकि मौजूदा सैनिक स्कूल, आरआईएमसी और आरएमएस पहले से ही सशस्त्र बलों की विभिन्न प्रशिक्षण अकादमियों में 25-30 प्रतिशत से अधिक अधिकरियों का योगदान कर रहे हैं, सैनिक स्कूलों की संख्या के और विस्तार के लिए दिए जा रहे मौलिक तर्क अत्यंत असमर्थनीय है. इसके अलावा, अब भी कुछ ‘सैन्य स्कूल’ निजी तौर पर चलाए जाते हैं, जिनमें महाराष्ट्र सबसे ऊपर है. उनका घोषित उद्देश्य राष्ट्रीय रक्षा अकादमी और अन्य प्रशिक्षण अकादमियों में योगदान करना है. उनके साथ भागीदारी करना गाना पंडितों को उपदेश देने जैसा कार्य साबित हो सकता है.

इस योजना का एक और वांछित परिणाम सैन्य-उन्मुख शिक्षा के माध्यम से युवाओं में राष्ट्रवादी भावना की स्थापना करना प्रतीत होता है. परन्तु राष्ट्रवाद पर सेना या पब्लिक स्कूल शिक्षा प्रणाली का एकाधिकार नहीं होता है. वर्दीधारी लोगों के मामले में मुख्य अंतर यह होता है कि उन्हें अपने जीवन का अंतिम बलिदान देने के लिए हर समय तैयार रहना पड़ता है और ऐसी भावना संस्थागत रूप से सशस्त्र सेवा अकादमियों में शामिल होने के बाद हीं अंतर्निहित होती है, और यह जरूरी नहीं कि यह भावना सैन्य स्कूलों की शिक्षा से ही प्राप्त की जाए.

ड्राइंग बोर्ड पर वापस लौटने का समय

रक्षा मंत्रालय के नियंत्रण के बिना सैनिक स्कूल से सम्बन्घित ‘लोकाचार’ का संरक्षण नहीं किया जा सकता है. रक्षा मंत्रालय द्वारा चुने गए स्कूलों को भी अपने अधिकांश गैर-शैक्षणिक गतिविधियों का नियंत्रण सौंपने के लिए तैयार होना चाहिए. सैनिक स्कूल की मूल अवधारणा को बनाए रखने के लिए आवश्यक तीन महत्वपूर्ण पदाधिकारियों की पदस्थिति को कमजोर करने के सन्दर्भ में किसी तरह का कोई समझौता नहीं किया जाना चाहिए. लेकिन चुने गये स्कूल प्रबंधन नियंत्रण खोने के लिए तैयार नहीं भी हो सकते हैं. भारत में कई राज्यों द्वारा स्कूली शिक्षा में सार्वजनिक-निजी भागीदारी के प्रयोग काफी हद तक विफल रहे हैं.

इसमें कोई शक नहीं कि सैनिक स्कूलों से आने वाले अधिकारियों ने सराहनीय प्रदर्शन किया है. लेकिन ऐसा हीं योगदान अन्य स्कूलों से आने वाले सैन्य अधिकारियों का भी हैं, जो अभी अधिकारी संवर्ग का एक बड़ा हिस्सा है. सैनिक स्कूल के लोकाचार को बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है और सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल के माध्यम से इसका भविष्य तय करना कई तरह की संभावनाओं से भरा हुआ है. यहां उठाए गए मुद्दों पर एक गहरे आत्ममंथन की जरूरत है.
अभी इस पहल के बारे में केवल घोषणा की गई है और किसी तरह का कोई बजटीय प्रावधान नहीं किया गया है. यहां अत्यधिक सावधानी बरतना जरूरी है क्योंकि यह मामला भारतीय सेना के ‘शीर्ष (अधिकारियों)’ से संबंधित है.

(ले. जन. प्रकाश मेनन (रिटा) स्ट्रैटजिक स्टडीज़ प्रोग्राम, तक्षशिला संस्थान, बेंगलुरू के निदेशक, और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय के पूर्व सैन्य सलाहकार हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)

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