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Friday, 19 July, 2024
होममत-विमतभगत सिंह का सरकारीकरण न करें, कहीं गांधी की तरह शहीद-ए-आजम को भी लिफाफे की तरह इस्तेमाल न किया जाए

भगत सिंह का सरकारीकरण न करें, कहीं गांधी की तरह शहीद-ए-आजम को भी लिफाफे की तरह इस्तेमाल न किया जाए

सूबे के नये मुख्यमंत्री भगवंत मान ने भगत सिंह की एक सजीली तस्वीर(इस तस्वीर के बगलगीर बाबा साहब आंबेडकर की तस्वीर भी थी) लगायी जिसमें भगत सिंह को बसंती पगड़ी पहने दिखाया गया है.

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आज किस भगत सिंह को याद करें? इस नौजवान क्रांतिकारी की छवि और स्मृति-चिन्हों के साथ जो मनमानी हो रही है, उसे कैसे रोकें और टोकें? गांधी की स्मृतियों के साथ जैसा मनमाना बरताव हुआ कहीं वैसा ही भगत सिंह की भी स्मृतियों के साथ ना हो— क्या हम ऐसी होनी को रोक नहीं सकते हैं? इन सवालों पर गौर-ओ-फिक्र करना भगत सिंह के शहादत दिवस (23 मार्च) को मनाने का सबसे बेहतर तरीका है.

पंजाब में नव-निर्वाचित आम आदमी पार्टी की सरकार ने भगत सिंह की नई छवि तैयार करने की कोशिश की तो ऐसे छवीकरण के बरक्स ये सवाल सहज ही उठने थे. यों देखें तो विवाद बड़ा मामूली किस्म का था. सूबे के नये मुख्यमंत्री भगवंत मान ने भगत सिंह की एक सजीली तस्वीर (इस तस्वीर के बगलगीर बाबा साहब आंबेडकर की तस्वीर भी थी) लगायी जिसमें भगत सिंह को बसंती पगड़ी पहने दिखाया गया है. भगवंत मान खुद भी यह पगड़ी पहनते हैं और बीते कुछ सालों में इसे लोकप्रिय बनाया है. उन्होंने सभी पंजाबियों को नेवता दिया कि आप सब भगत सिंह के पैतृक गांव खटकर कलां में हो रहे शपथ-ग्रहण समारोह में बसंती रंग के बाने में आयें. भगत सिंह के लेखन को खोजने और सहेजने के अनवरत प्रयास में लगे इतिहासकार चमनलाल ने तत्काल ध्यान दिलाया था कि जिस तस्वीर का भगवंत मान ने इस्तेमाल किया है वह भगत सिंह की मौजूद चार ऐतिहासिक तस्वीरों से अलग हटकर है. भगत सिंह के कुछ रिश्तेदारों के तरफ से भी ऐसी आपत्ति दर्ज की गई.

भगवंत मान का कार्यालय | Twitter/@AAPPunjab

पंजाब के नये मुख्यमंत्री ने भगत सिंह की जिस तस्वीर का इस्तेमाल किया, उसमें कोई बुराई नहीं है. वह तस्वीर भले ही प्रामाणिक ना हो लेकिन आकर्षक है और इस रुप में कलैंडर कला का एक अच्छा नमूना कहला सकती है. भगत सिंह की तस्वीर को लेकर पहले भी विवाद हुए हैं, जैसे भगत सिंह की वह तस्वीर जिसमें उन्हें क्लीन शेव्ड और हैट पहने दिखाया गया है. इस तस्वीर को लेकर आपत्ति जतायी गई, कहा गया कि यह तस्वीर भगत सिंह की सिख युवक के रुप में कायम पहचान को मिटाने की कोशिश है. लेकिन भगवंत मान ने जिस तस्वीर का इस्तेमाल किया उसके बारे में ऐसी आपत्ति नहीं उठायी जा सकती. वैसे भी, उस अमर गीत मेरा रंग दे बसंती चोला के बदौलत क्रांतिकारी राष्ट्रवादियों और बसंती रंग के बीच एक ऐतिहासिक नाता बना चला आया है.

यह तर्क भी दिया जा सकता है कि आखिर किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व की यादों को सिर्फ प्रामाणिक तस्वीरों के जरिए जताने-दिखाने की मजबूरी से अपने को क्यों बांधे रखें. अगर जोर इसी बात पर हो कि इतिहास के महिमावान किरदारों की हर तस्वीर उनकी प्रामाणिक तस्वीर की प्रतिकृति ही होनी चाहिए तो फिर इसमें कला की बात क्या रही. जाहिर सी बात है, आप किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व के परिवार-जन हो सकते हैं, उसके अनुयायी हो सकते हैं मगर इसका मतलब ये तो नहीं कि आप ही उस ऐतिहासिक व्यक्तित्व की छवियों के इस्तेमाल पर नियंत्रण भी रखें.

भगत सिंह के परिवार-जन में से एक प्रोफेसर जगमोहन सिंह ने बात को उसके सही परिप्रेक्ष्य में रखा, उन्होंने कहा कि बात दरअसल भगत सिंह के फोटोग्राफ्स की नहीं है, बात भगत सिंह के विचारों की है. विवाद की जड़ में यही बात है. सो, वसंती पगड़ी पहने भगत सिंह की तस्वीर को लेकर उठा विवाद उससे कहीं ज्यादा गहरा है जितना ही ऊपर से वह किसी को प्रतीत हो सकता है. आपत्ति के पीछे यह बात छिपी है कि इतिहास के गलियारों से उभरते एक नायक को एक खास किस्म की राजनीति के चौखटे में फिट किया जा रहा है, इसी निमित्त उसका दोहन और अनुकूलन किया जा रहा है.


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एक चित्र – समय की शिला पर अमिट

भगत सिंह उन चंद राष्ट्रवादी नायकों में हैं जिनकी सूरत और सीरत पर बीते वक्त की शिकन ज्यादा नहीं पड़ी. नेहरु की छवि का तो खैर हद दर्जे तक इस्तेमाल हुआ और उनके बारे में संगठित तौर पर निन्दा अभियान चला, नतीजतन नेहरु की छवि बड़े हद तक आज तोड़-मरोड़ का शिकार है. गांधी की छवि के साथ भी ऐसा ही हुआ है, भले ही नेहरु की छवि की तुलना में कुछ कम.

सावरकर को महिमा के पीढ़े पर प्रतिष्ठित करने की कैसी भी जी तोड़ कोशिश उनके अनुयायी क्यों ना कर लें लेकिन सावरकर के जीवन का सच प्रतिष्ठापन की ऐसी कोशिशों के आड़े आ ही जाता है. हां, बाबा साहब आंबेडकर आधुनिक भारत के उन चंद नायकों में हैं जिनकी कीर्ति की पताका हाल के वक्त में लगातार ऊंची हुई है. सामाजिक हदबंदियों के जिस दायरे में लंबे समय समय तक बाबा साहब आंबेडकर की छवि बंद रही, उसे तोड़ते हुए, हाल के समय में वह कहीं ज्यादा सर्व-व्यापी हुई है. सो, पंजाब की नई सरकार ने अगर भगत सिंह के साथ-साथ बाबा साहब आंबेडकर की भी तस्वीर लगाने का आदेश किया है तो इसमें अचरज की कोई बात नहीं.

भगत सिंह की छवि पर समय की शिकन ना के बराबर है, वह एक अमिट चित्र की तरह मौजूद है. भगत सिंह की छवि को ना तो किसी एक भूगोल के दायरे में बांधा जा सका है ना ही किसी एक जाति या समुदाय का ही उसपर घेरा डाला जा सका है. भगत सिंह की छवि की चमक को आधिकारिक समारोहों की तामझाम से भी फीका नहीं किया जा सकता. लेकिन क्या भगत सिंह को एक ऐसे प्रतीक में बदला जा सकता है कि उनकी मूर्ति और छवियां तो चहुंओर हों लेकिन ये मूर्तियां और छवियां भगत सिंह की विचारधारा और राजनीति का संकेत ना करें ? क्या भगत सिंह की स्मृतियां ऐसी नियति को प्राप्त होंगी? आज असल चुनौती यह है.

भगत सिंह का आकर्षण बना हुआ है- जाति-धर्म आदि की तमाम घेरे को लांघती हुई उनकी छवि आज भी नौजवानों को प्रेरित और आंदोलित करती है- और यही बात लालच पैदा करती है कि भगत सिंह की छवि को किसी तरह अपनी राजनीति के चौखटे में फिट कर लिया जाये. ऐसा होना कोई नई बात नहीं. भगत सिंह के जीवित रहते ही उनका मूर्तीकरण शुरु हो गया था और तब से आज दिन तक यह मूर्तीकरण जारी है. भगत सिंह उस जुझारु राष्ट्रवाद के प्रतीक के रुप मे बने चले आ रहे हैं जो राष्ट्रवाद की गांधीवादी मुख्यधारा के विरोध में खड़ी थी. वामपंथ ने बड़ी कोशिशें कीं (लेकिन खास कामयाबी नहीं मिली) कि भगत सिंह की छवि को एक ऐसे कम्युनिस्ट और अनीश्वरवादी के रुप में बनाये रखा जाये जो जीवन की आखिरी दिन तक लेनिन को पढ़ता रहा.

लेकिन धीरे-धीरे, भगत सिंह की ऐतिहासिक छवि घिसकर एक ऐसे सर्व-सामान्य प्रतीक पुरुष में ढल गई जिसका इस्तेमाल तमाम किस्म की राष्ट्रवादी उद्भावनाओं के लिए किया जा सके. हम उन्हें एक आदर्शवादी नौजवान के रुप में याद करते हैं जिसने देश की आजादी के लिए प्राण न्यौछावर किये और इस रुप में याद करते हुए हमें ये फिक्र सताती ही नहीं कि भगत सिंह के पास एक सपना था- सपना कि मेरा आजाद भारत कैसा हो. हम भगत सिंह को नौजवानों के आदर्श के रुप में प्रतिष्ठित करते हैं, उन्हें सिर्फ जोश और जुनून के एक स्रोत के रुप में पेश करते हैं और इस क्रम में भगत सिंह के जीवन और कर्म से जुड़ी यह बात तो सिरे से भुला ही दी जाती है कि भगत सिंह चाहते थे, नौजवान राजनीति से जुड़ें. हम उन्हें क्रांतिकारी कहते हैं लेकिन इस बात को भुला देते हैं कि क्रांति तो किसी महत् प्रयोजन से किसी चीज की बुनियाद को बदल देने का नाम है. बुनियादी बदलाव की भावनाओं को मिटा देने की लंबी कोशिश चली है और ऐसी ही कोशिशों का नतीजा आज हमारे सामने है जो आज देखने को मिलता है कि भगत सिंह तो कांग्रेस को भी हासिल हैं जबकि भगत सिंह ने कांग्रेस की राजनीति की तीखी आलोचना की थी और भगत सिंह की प्रशंसा में अकाली भी पलक-पांवड़े बिछा रहे हैं जबकि भगत सिंह घोषित तौर पर नास्तिक थे और इसी क्रम में सबसे गजब यह कि बीजेपी इस बात को जनता-जनार्दन की यादों से मिटाने में लगी है कि भगत सिंह ने अपने वक्त में हिन्दू राष्ट्रवाद की राजनीति को निन्दा-भाव से बरता था.

आम आदमी पार्टी भगत सिंह की छवि के दोहन और अनुकूलन की ऐसी कोशिशों को एक कदम और आगे ले जाना चाहती है. पंजाब की नई सरकार ने सभी सरकारी दफ्तरों में भगत सिंह और बाबा साहब आंबेडकर की तस्वीर लगाने का फैसला लिया है और इस फैसले के साथ हम देखेंगे कि एक सरकारी किस्म के भगत सिंह का निर्माण हो रहा है. और, इस मायने में देखें तो भगतसिंह की वही गति होने जा रही है जो महात्मा गांधी की हुई. जैसे गांधी की छवि विरुपति होकर सरकारी महात्मा में तब्दील हो गई यानी एक ऐसे व्यक्तित्व के रुप में जो चहुंओर दिखे, जिसके मुंह में क्रोध से भींच लिए जाने वाले दांत ना हो, अगर हो तो बस ऐसी जुबान जो हर कर्म-अकर्म पर आशीर्वाद बरसाया करे वैसे ही भगत सिंह की छवि को एक सरकारी क्रांतिकारी में बदला जा सकता है यानी अपने रंग में क्रांतिकारिता का आभास देने वाला एक लिफाफा जिसके भीतर कैसा भी रूढ़िपरस्त संदेश लिखकर भरा और भेजा जा सके. मुझे तो इस सोच से कंपकंपी आती है कि भगत सिंह की तस्वीर सूबे पंजाब के हर थाने में टंगी होगी और थाने की दीवार पर टंगी यह तस्वीर अपनी खुली आंखों से देख रही होगी कि कैसे पंजाब पुलिस टेबुल के नीचे से लेन-देन के अकर्म कर रही है और कैसे `मुठभेड़ों`को अंजाम दे रही है.

प्रतीकों का मनभावनीकरणः यह सूरत बदलनी चाहिए

आसन्न खतरा है कि भगत सिंह अपने मायने की तलाश में खड़ी एक मूर्ति में ना बदल दिये जायें, एक ऐसे प्रतीक में ना बदल दिये जायें जिसके सहारे किसी भी मनभावन अर्थ का संकेत किया जा सके. कहीं उन्हें एक ऐसे निशान के रुप में ना बदल दिया जाये जिसे किसी भी भी दिशा में घुमाकर कहा जा सके कि रास्ता इसी ओर से है, इधर ही जाइए. जैसे वसंती रंग की पगड़ी कोई भी पहन सकता है और कुछ भी जताने के लिए पहन सकता है वैसे ही आसन्न खतरा है कि कहीं भगत सिंह की छवि का इस्तेमाल हमारी स्मृतियों में मौजूद गांधी की गुरुता के भंजन, नेहरु की साख के हनन और टैगोर की महिमा के मर्दन के लिए भी ना होने लगे. प्रतीक-पुरुषों के मनभावनीकरण की इस प्रक्रिया को पलटना उन सबके एजेंडे में होना चाहिए जो भारत नाम के गणराज्य पर अपना दावा फिर से जताना चाहते हैं.

ऐसे प्रयासों के लिए जरुरत है कि हम भगत सिंह को खोजें- उन्हें एक चिन्तक और कार्यकर्ता के रुप में पहचानें. अपने वक्त के तमाम उग्र राष्ट्रवादियों के विपरीत भगत सिंह ऐसे क्रांतिकारी ना थे जिसकी अंगुली हर वक्त और हर बात पर बंदूक की लिबलिबी दबाने के लिए मचलती हो. हमें यह याद करने की जरुरत है कि भगत सिंह अध्ययनशील थे, उनका अध्ययन व्यापक था, बड़ी गहराई से सोचते थे. उन्होंने ताकतवर गद्य लिखा है और अपने संकल्प और निष्ठा पर प्राणपण से खड़ा होने का भरपूर साहस था उनमें. हमें खासतौर पर भगत सिंह की विचारधारा की तीन बातों—राष्ट्रवाद, समाजवाद और सेक्युलरिज्म को याद करने की जरुरत है.

याद रहे कि भगतसिंह का राष्ट्रवाद तंगनजरी का शिकार नहीं था, उसमें अपने को बाकियों से बरतर और योग्यतम बताने की ललक और हनक नहीं थी. भगत सिंह सकारात्मक अर्थों में राष्ट्रवादी थे, साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष में हरेक को एकजुट करने की प्रेरणा की लौ जगमगा रही थी उनके राष्ट्रवाद में और वे अपने इस उद्यम में किसी से भी और कहीं से भी, कुछ भी सार्थक सीखने को हरचंद तैयार थे. यह उद्यम उनके सेक्युलरिज्म के भाव से जुड़ा हुआ था. वे अनीश्वरवादी थे और हर किस्म की सांप्रदायिकता के खिलाफ थे.

सांप्रदायिक घृणा फैलाने में मीडिया कितनी बड़ी भूमिका निभाता है, इसे लेकर भगत सिंह ने जो कुछ लिखा है उसे आज के वक्त में हमें रोजमर्रा के तौर पर याद रखने की जरूरत है. सबसे अहम बात हम ये याद रखें कि भगत सिंह के लिए क्रांति अलग से कोई शय नहीं बल्कि समाजवाद की उनकी विचारधारा का ही हिस्सा है. वे भारतीय क्रांतिकारियों की उस पहली पीढ़ी के सदस्य थे जिसने रुस की क्रांति और मार्क्सवादी विचारधारा से प्रेरणा ली. एक समाजवादी के रुप में उनका सपना था कि भारत से आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी हमेशा के लिए खत्म हो जाये. भगत सिंह की यादों का राजनीति के किसी मनभावनी चौखटे में मूर्तीकरण ना हो, इसका एकमात्र तरीका यही है कि हम उनकी क्रांतिधर्मिता की एक नई छवि गढ़ें जिसमें भगत सिंह की विचारधारा के इन तीन तत्वों का समावेश हो.

ऐसी कोशिशों के साथ हमें यह भी स्मरण करना चाहिए कि 23 मार्च राममनोहर लोहिया की जन्मतिथि है यानी एक ऐसे नायक की जन्मतिथि जो एक अलग भाषा में इन्हीं तीन बातों के लिए प्रतिबद्ध था. हम जानते हैं कि लोहिया ने कभी अपना जन्मदिन नहीं बनाया और 23 मार्च को हमेशा शहीद दिवस कहकर ही याद किया. अगर हम भगत सिंह की एक नई छवि गढ़ पाये (चाहे उसमें वसंती पगड़ी हो या ना हो) तो हम भगत सिंह के शहादत दिवस के साथ लोहिया का जन्मदिवस भी मना सकते हैं.

(लेखक स्वराज इंडिया के सदस्य और जय किसान आंदोलन के सह-संस्थापक हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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