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सबरीमाला में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद पिछले दिनों हुए प्रदर्शन की फाइल फोटो | पीटीआई
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जब आप ये पंक्तियां पढ़ रहे हैं, साल 2019 हफ्ते भर पुराना हो चुका है. फिर भी, चूंकि यह देश के नये लोकसभा चुनाव का वर्ष है, इसके अच्छे-बुरे संकेतों व भली-बुरी संभावनाओं पर बहस-मुबाहिसों का दौर अभी भी जारी है. ये संकेत व संभावनाएं आगे चलकर जो भी रूप धारण करें, साल के इस पहले ही सप्ताह में एक अच्छी बात यह हुई है कि केरल के सबरीमाला में महिलाओं ने एक बेहद विषम संघर्ष में, प्रतीकात्मक रूप से भी सही, उन धर्मांध, पितृसत्तावादी कहें या कि सर्वसत्तावादी व कट्टरपंथी संगठनों को उन्नीस साबित कर डाला है, जो सुप्रीमकोर्ट के आदेश के बावजूद, उनके बिना किसी लैंगिक भेदभाव के, भगवान अयप्पा के मंदिर में प्रवेश की राह में रोड़े डाल रहे थे.

अलबत्ता, कुछ लोगों का यह सवाल अपनी जगह बहुत दुरुस्त है कि उनके यों इक्कीस साबित होने का हासिल क्या है और इतनी कीमत चुकाकर उन्होंने भगवान अयप्पा के मन्दिर में घुसकर उनकी पूजा कर भी ली तो उससे कौन सी क्रांति हो जाने वाली है? लेकिन इसका यह जवाब भी कुछ कम दुरुस्त नहीं कि इससे उन शक्तियों की अक्ल ठिकाने आने की उम्मीदें एकबारगी बहुत बढ़ गई हैं, जो अभी अपनी शिकस्त से तिलमिलाकर उक्त मन्दिर के शुद्धीकरण के कर्मकांडों के साथ समूचे केरल को युद्ध का मैदान बना देने में मुब्तिला हैं और कौन जाने, एक दिन उनकी जड़ बुद्धि का शुद्धीकरण भी हो जाये.

बहरहाल, बीते साल सितंबर से अब तक न सिर्फ केरल, बल्कि उसकी सीमा से लगने वाले कई अन्य राज्य भी, भेदभाव से निजात के लिए लड़ रही इन महिलाओं के खिलाफ, उक्त संगठनों के अलानाहक हड़बोंग के साक्षी बनते आ रहे थे. साथ ही देश का संविधान यह देखने को अभिशप्त था कि कैसे हड़बोंग करने वालों द्वारा उसके दिए सारे नागरिकों की समानता के अधिकार के पवित्र मूल्य की धज्जियां उड़ाई जा रही थीं. यह भी कि कैसे सुप्रीम कोर्ट का इस सम्बन्धी आदेश भी लागू नहीं हो पा रहा था, क्योंकि न सिर्फ सबरीमाला मंदिर जाने की कोशिश करने वाली महिलाओं पर हिंसक हमले किये जा रहे थे, बल्कि इसकी खबरें देने वाले पत्रकारों तक को नहीं बख्शा जा रहा था.


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कई देशवासियों के निकट इससे भी दुःखद यह देखना था कि एक ओर देश की सरकार तत्काल तीन तलाक से पीड़ित हो रही ‘मुस्लिम बहनों’ के त्राण के लिए कुछ भी करने का दम भर रही थी और दूसरी ओर उसका नेतृत्व करने वाली पार्टी सबरीमाला में महिलाओं के संघर्ष को विफल करने में ज़मीन आसमान एक किये दे रही थी. यकीनन, यह विडम्बना ही है कि जैसे उसे देशवासियों को हिन्दू-मुस्लिम में बांटे बगैर चैन नहीं आता. महिलाओं के संघर्षों में भी वह अपना नज़रिया अपने राजनीतिक व सत्तागत स्वार्थों के आधार पर ही तय करती है.

उसका इस सम्बन्धी दुरंगापन इस नज़ीर से और साफ होता है कि राफेल विमान सौदे में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिर जाने पर तो वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अपने पक्ष में क्लीन चिट बताकर उसका सम्मान किये जाने पर ज़ोर देती है, लेकिन सबरीमाला में उसी कोर्ट के फैसले को लागू होने देना गवारा नहीं करती और वहां भी लोगों को अयोध्या जैसे दुर्भावनाओं के खेल में फंसाने लगती है.

याद कीजिए, सर्वोच्च न्यायालय ने 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश पर लगे आ रहे प्रतिबंध को गैरकानूनी करार दिया, तो पहले तो उसने इसका स्वागत किया था, लेकिन जैसे ही उसे लगा कि ‘भक्तों’ की एक भीड़ न्यायालय के फैसले के खिलाफ सड़क पर है, उसने पहलू बदल लिया. फिर तो न सिर्फ वह, बल्कि उसके पितृसंगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े आनुषंगिक संगठन भी भक्तों की भीड़ का हिस्सा बन गये और बदअमनी फैलाने लगे.

समग्रता में देखें तो महिला हितों के प्रति इस पार्टी के ‘समर्पण’ का एक बड़ा उदाहरण यह भी है कि संसद व विधानमंडलों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों के आरक्षण के प्रावधान वाला विधेयक ‘मोदी जी’ के पूरे सत्ताकाल में भी धूल ही फांकता रहा है.

लेकिन इससे भी बड़ी विडम्बना यह है कि 2019 के दूसरे दिन दो महिलाओं के सबरीमाला मन्दिर में प्रवेश कर लैंगिक भेदभाव की उसकी आठ सौ साल पुरानी परम्परा तोड़ डालने के बावजूद महिलाओं के विरोधियों को सद्बुद्धि नहीं आई है. उन्होंने मन्दिर को अशुद्ध हुआ बताकर उसे बंद कर दिया और उसके शुद्धीकरण के कर्मकांड पर आमादा हैं. एक कार्टूनिस्ट ने इस पर ठीक ही तंज किया है कि सबसे पहले उनकी उस बुद्धि का शुद्धीकरण होना चाहिए, जो उन्हें महिलाओं की कोख से जन्म लेकर महिलाओं को ही अपवित्र ठहराने और खुद को पवित्र बताने की मूढ़ता के हवाले करती हैं.


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हां, इसे मूढ़ता के सिवाय और क्या कह सकते हैं कि अपने मंसूबे में विफल पितृसत्तावादी अब झुंझलाहट से भरकर उक्त परम्परातोड़क महिलाओं को वामपंथी बताकर उन पर लानतें भेज रहे और उनके खिलाफ नये सिरे से गुस्सा भड़काने में लग गये हैं. इसके लिए उन्हें हिंसा पर उतरने से भी परहेज नहीं है. उनकी हरचंद कोशिश है कि हिंसक-विरोध प्रदर्शनों से केरल की कानून-व्यवस्था इस कदर भंग हो और राज्य सरकार को इस कदर खलनायक बना दिया जाये कि आगामी लोकसभा व विधानसभा चुनावों में उसका राजनीतिक लाभ उठाया जा सके.

उनके राजनीतिक फ्रंट को इस सबका कितना लाभ मिलता है, मिलता भी है या नहीं, अभी कुछ कहा नहीं जा सकता. लेकिन इसी लाभ की उम्मीद में उनके केन्द्रीय मंत्री तक महिलाओं का अपमान कर रहे हैं. अनंत कुमार हेगड़े तो उक्त परम्परा टूटने को हिंदुओं पर दिनदहाड़े दुष्कर्म तक बताने पर उतर आये हैं.

लेकिन, महिलाओं का हौसला बुलंद है. मंदिर में प्रवेश की कानूनी लड़ाई जीतने के बाद वे प्रतिगामी समाज से भी लड़ रही हैं. इस क्रम में उन्होंने ‘वीमेन वाल’ यानी महिलाओं की दीवार बनाकर भी अपनी एकजुटता प्रदर्शित की है. पिछले दिनों 50 लाख महिलाओं की 620 किलोमीटर लम्बी श्रृंखला बनाकर उन्होंने यह साफ संदेश भी दिया कि अंततः वे अपनी मध्ययुगीन तस्वीर को फाड़कर फेंक ही डालेंगी. इस सिलसिले में उनके पक्ष में एक शुभ संकेत यह है कि तर्कवादियों के साथ कई प्रगतिशील हिंदू संगठनों द्वारा उनका समर्थन किया जा रहा है, जिससे देश के सत्ताधीशों के खेमे में बेचैनी है. तभी तो भाजपा के दलित सांसद उदित राज अपनी पार्टी की लाइन से अलग हटकर इन महिलाओं के समर्थन को विवश हो गये हैं.

महिलाओं की इस सफलता पर खुशी जताकर उन्होंने महिलाओं के विरोधियों से, जिनमें ज्यादातर उन्हीं की पार्टी के हैं, कई असुविधाजनक सवाल भी पूछे हैं. मसलन: परम्पराएं तो सती व दहेज जैसी प्रथाओं की भी रही हैं, तो क्या हमें महिलाओं के सबरीमाला मन्दिर प्रवेश की विरोधी परम्परा के साथ इन परम्पराओं को भी उनके मूलरूप में बरकरार रखना चाहिए? अगर नहीं तो सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का विरोध क्यों किया जा रहा है?

दिलचस्प यह कि उदित राज ने जो सवाल अब पूछे हैं, महिलाएं अरसे से पूछती आई हैं. लेकिन जब भी उन्होंने भगवान के सामने दोनों लिंगों के समान होने की बात कही या पूछा कि अगर महिलाएं अपवित्र हैं तो उन्हीं से पैदा होने वाला पुरुष पवित्र कैसे हो सकता है, जवाब के बदले उन्हें हिंसा और नफरत ही मिली है. इन हिंसा और नफरत के पैरोकारों का मन बदलना अभी भी बाकी है, तो साफ है कि महिलाओं की लड़ाई अभी लम्बी है और कहा नहीं जा सकता कि उनकी वीमेन वाल, यानी महिला दीवार पर रूढ़ियों और परंपराओं के अभी और कितने प्रहार होंगे? लेकिन इस बाबत कोई दो राय नहीं हो सकती कि ये प्रहार अब महिलाओं के बढ़ते कदमों को रोकने में सफल नहीं होने वाले.

इसलिए और भी कि दुनिया के सारे धर्मों का सारा कारोबार महिलाओं के ही बूते चलता आया है और अब, पितृसत्ता की पोषक धार्मिक जमातों की त्रासदी इस अर्थ में दोहरी है कि युगचेतना ऐसे दौर में पहुंच चुकी है कि न वे महिलाओं को दबाकर उन्हें दूसरे दर्जे में बनाये रख सकती हैं और न उनकी नाराज़गी ही झेल सकती हैं. वे वीमेन वाल से कितना भी सिर टकरायें, न उसे ढहा सकती हैं और न महिलाओं की अच्छे दिनों की ओर जारी यात्राएं ही रोक सकती हैं.

(कृष्ण प्रताप सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं)


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