Saturday, 20 August, 2022
होममत-विमत‘आफस्पा’ खत्म करने के अलावा बगावत विरोधी रणनीति को भी बदलिए और सेना को इससे मुक्त कीजिए

‘आफस्पा’ खत्म करने के अलावा बगावत विरोधी रणनीति को भी बदलिए और सेना को इससे मुक्त कीजिए

भारत को आंतरिक सुरक्षा के लिए जो मौजूदा खतरे हैं और उत्तर-पूर्व में जो बची-खुची विद्रोही गतिविधियां जारी हैं उनके लिए सेना को तैनात करने की जरूरत नहीं है.

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नरेंद्र मोदी सरकार ने असम, नागालैंड और मणिपुर में ‘आर्म्ड फोर्सेज़ स्पेशल पावर्स एक्ट (‘आफस्पा’) के तहत अशांत क्षेत्रों की संख्या हाल में कम कर दी है. इसकी वजह यह बताई गई है कि वहां ‘सुरक्षा की स्थिति में महत्वपूर्ण सुधार हुआ है और विकास की गति तेज हुई है’. इसके अलावा बागी गुटों के साथ राजनीतिक समझौते भी हुए हैं. ‘आफस्पा’ असम के 40 प्रतिशत भाग में, नागालैंड और मणिपुर के बड़े हिस्से में और अरुणाचल प्रदेश के तीन जिलों तथा दो पुलिस थाना क्षेत्रों में लागू है.

जनता के विरोध, और 4 दिसंबर 2021 को मोन जिले की बर्बर वारदात के बाद उत्तर-पूर्व के सभी राज्य सरकारों के ‘आफस्पा’ विरोधी रुख ने इस कानून के दायरे में आने वाले इलाकों की लंबे समय से अपेक्षित समीक्षा के लिए मजबूर कर दिया. अटकलें लगाई जा रही हैं कि जम्मू-कश्मीर के लिए भी जल्दी ही इसी तरह के कदम उठाए जाएंगे.

अब सरकार की पहल की जनता और मीडिया में जो व्यापक प्रशंसा हुई है उसके कारण भारत में बगावत विरोधी रणनीति की समीक्षा का एक अवसर उपलब्ध हुआ है.


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बगावत विरोधी मौजूदा रणनीति

अनुभव बताता है कि खास तौर से लोकतांत्रिक देश में बगावत का समाधान राजनीतिक बातचीत से ही हो सकता है. भारत में बगावत विरोधी रणनीति के लिए अभिशाप यह रहा है कि शुरू में काफी राजनीतिक दुविधा रही, कानून-व्यवस्था की स्थिति नागरिक प्रशासन के काबू से बाहर हो गई, अशांत क्षेत्रों की घोषणा की गई और ‘आफस्पा’ की मदद से सेना के हाथ में लम्बे समय के लिए लगभग सब कुछ सौंप दिया गया. सरकार चाहे किसी की रही हो, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की क्षमताओं पर किसी ने भरोसा नहीं किया, और उन्हें राज्य पुलिस के जरिए बाहर से मदद की भूमिका में ही तैनात किया गया.

राजनीतिक पेशकश या तो नदारद रही या उसे इतना लंबा खींचा गया कि विद्रोह के जो शुरुआती कारण (यानी जातीय/धार्मिक पहचान और अलगाव की भावना) थे, वे गौण हो गए और सैन्य कार्रवाई के नतीजों के खिलाफ गुस्सा ही बगावत का कारण बन गया. ‘आफस्पा’ के दुरुपयोग और ज्यादा उत्साही कार्रवाइयों के मामलों से निपटने में पारदर्शिता की कमी ने हालात को और बिगाड़ दिया. और जस्टिस जीवन रेड्डी की रिपोर्ट के मुताबिक जो कानून समस्या के समाधान के लिए बनाया गया था वह ‘दमन का प्रतीक’, नफरत का कारण, और भेदभाव तथा नाइंसाफी का माध्यम बन गया.

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राजनीतिक समाधान के अभाव में सेना ने मिशन पूरा करने के जोश में समस्या का सैन्य उपायों से समाधान करने की ज़िम्मेदारी अपना ली. उत्तर-पूर्व में विद्रोह अपने संपूर्ण उदाहरण के रूप में मौजूद है. पूर्ण सक्रिय प्रशासन करने वाली निर्वाहित सरकारें लंबे समय से वहां मौजूद हैं. अधिकतर बागी गुटों के साथ समझौतों पर दस्तखत हो चुके हैं या अंतिम चरण में हैं. उत्तर-पूर्व में कभी जो अलगाववादी बगावत थी वह अपराध-उद्योग में बदल गया है जिसमें पुराने बागी गुट, नेता, पुलिस और नौकरशाही शरीक है. लेकिन सेना बिना किसी राजनीतिक निगरानी के लगभग स्वतंत्र रूप से काम कर रही है.

आश्चर्य की बात यह है कि सेना अशांत क्षेत्र अधिनियम और ‘आफस्पा’ को हटाने का निरंतर विरोध करती रही है, बावजूद इसके कि वह बाहरी दुश्मनों से राष्ट्र की रक्षा के अपने प्राथमिक मिशन के लिए सैनिकों की संख्या बढ़ाने की मांग करती रही है. यह विरोधाभास इसलिए है कि वह खुद को ‘समाधान’ मानती है और उसे हिंसा की वापसी की आशंका है.
इसलिए समय आ गया है कि सरकार बगावत विरोधी अपनी रणनीति की समीक्षा करे.

आगे का रास्ता

उत्तर-पूर्व के सभी राज्यों में निर्वाचित सरकारें काम कर रही हैं और भाजपा या तो सत्ता में है या उत्तर-पूर्व लोकतांत्रिक गठबंधन के हिस्से के रूप में सत्ता में भागीदारी कर रही है. जम्मू-कश्मीर को भी निकट भविष्य में निर्वाचित सरकार मिल सकती है.

मेरा मानना है कि उत्तर-पूर्व और जम्मू-कश्मीर में आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा और बगावत की बची-खुची ताकत ऐसी नहीं है कि सेना को तैनात करना जरूरी हो.

कठोर और खराब तरह से लिखे गए पुराने ‘आफस्पा’ कानून को रद्द करके उसकी जगह एक मॉडल कानून लाया जाना चाहिए जो मानवाधिकारों की उन दुर्लभ स्थितियों में भी रक्षा करता हो जब सेना को तैनात करने की जरूरत पैदा हो जाए. यह कानून सेना के लिए ही हो और ‘आफस्पा’ की धारा 2 के अनुसार ‘संघ की अन्य सशस्त्र बलों पर न लागू होता हो.

करगिल युद्ध के बाद, 2001 में, ‘राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था के सुधार पर मंत्रियों के समूह की रिपोर्ट’ ने सिफ़ारिश की थी कि केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) को बगावत विरोधी बल का नेतृत्व न सौंपा जाए और सेना अपने प्राथमिक कार्य को ही संभाले. सरकार ने फैसला किया था कि सीआरपीएफ की 64 बटालियन और बनाई जाएगी और वह जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्व में बगावत विरोधी कार्रवाई की ज़िम्मेदारी 2005 तक संभाल लेगा. आज सीआरपीएफ की ताकत 3 लाख के बराबर है. लेकिन वह केवल ‘रेड कॉरिडोर’ में बगावत विरोधी कार्रवाई की जिम्मेदारी संभाल रहा है.

बाहरी खतरा बढ़ रहा है और सेना 21वीं सदी के युद्ध के लिए खुद को तैयार करने में लगी है. मुझे कोई कारण नहीं नज़र आता कि बेहतर प्रशिक्षण और नेतृत्व के साथ सीआरपीएफ राज्य सरकार के काबू से बाहर हो रही आंतरिक बगावत से निपटने की ज़िम्मेदारी नहीं संभाल सकती. जरूरत हो तो इसकी ताकत और बढ़ाई जा सकती है और राष्ट्रीय राइफल्स तथा असम राइफल्स (दोनों की कुल ताकत 100 बटालियन की है) का सीआरपीएफ में विलय किया जा सकता है. काम के लिहाज से सीआरपीएफ को राज्य पुलिस का विस्तार माना जा सकता है. उसकी कमान और कंट्रोल में इस तरह का बदलाव किया जा सकता है कि वह निर्वाचित सरकार के सीधे अधीन काम कर सके. वह या तो अपराध प्रक्रिया संहिता या किसी उपयुक्त नये कानून के तहत काम करे.

सरकार को भारत की बगावत विरोधी रणनीति की समग्र समीक्षा करनी चाहिए, सीआरपीएफ में बदलाव लाना चाहिए (अगर पिछले आठ साल में यह नहीं किया गया है तो) और सेना को अपने मूल मिशन के लिए मुक्त किया जाना चाहिए.

(ले.जन. एचएस पनाग, पीवीएसएम, एवीएसएम (रिटायर्ड) ने 40 वर्ष भारतीय सेना की सेवा की है. वो नॉर्दर्न कमांड और सेंट्रल कमांड में जीओसी-इन-सी रहे हैं. रिटायर होने के बाद आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के सदस्य रहे. उनका ट्विटर हैंडल @rwac48 है. व्यक्त विचार निजी हैं)

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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