Wednesday, 5 October, 2022
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मोदी ने 8 साल पहले भारतीय सेना को बदलने का वादा किया था लेकिन अभी तक अधर में है योजना

सेना में अपने आपमें परिपूर्ण कई सुधारों की योजनाएं बनीं लेकिन पता नहीं किन अज्ञात कारणों से उन्हें लागू नहीं किया गया.

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भाजपा की विचारधारा के घोर आलोचक भी यह कबूल करेंगे कि यह पार्टी राष्ट्रीय सुरक्षा, और एक उभरती महाशक्ति का परिचय देने वाली ताकतवर सेना के गठन को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध है. इसलिए उम्मीद की जा रही थी कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देगी और सेना को 21वीं सदी के युद्ध के लिए तैयार करेगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मसले पर बिलकुल स्पष्ट विचार रखते थे और उन्होंने 15 दिसंबर 2015 को कमांडरों के संयुक्त सम्मेलन में कहा भी था कि ‘सेना का एक साथ आधुनिकीकरण और विस्तार करना मुश्किल भी है और अनावश्यक भी. हमें ऐसी सेना चाहिए जो फुर्तीली, तेज हो, और केवल सैनिक की बहादुरी वाली नहीं बल्कि टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल में माहिर भी हो. हमें तेज युद्ध जीतने की क्षमता चाहिए, क्योंकि हमें लंबी लड़ाई लड़ने का समय नहीं मिलेगा.’

लेकिन आठ साल बाद मोदी ने बदलाव की जो दिशा बताई थी वह भटक गई है. राजनीतिक और फौजी हलक़ों के अलावा मीडिया में भी ‘विश्वस्त सूत्रों के हवाले से’ खूब लफ्फाजी हुई है और लागू किए जाने वाले परिपूर्ण सुधारों के ब्यौरे बड़ी फर्ज अदायगी करते हुए जारी किए गए. लेकिन 31 दिसंबर 2019 को पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की नियुक्ति के बावजूद कोई बड़ा सुधार नहीं लागू किया गया, सिवाय इस नीति की घोषणा के कि रक्षा उपकरणों के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल की जाएगी, और उसका भी कोई नतीजा अभी तक सामने नहीं नज़र आ रहा है.

राजनीतिक नेतृत्व ने स्पष्ट रणनीतिक दिशा देकर और समयबद्ध कार्रवाई का खाका पेश करके न तो परिवर्तनों को ‘अपनाया’ है, न ही उसके क्रियान्वयन पर निगरानी रखने की कोई पहल की है. इसका फल यह हुआ है कि आंतरिक विवादों के लिए ख्यात यथास्थितिवादी सेना ने नीचे से शुरुआत करने का तरीका अपनाया. सीडीएस— जो इस गलत तरीके से कम-से-कम तालमेल बिठाने की कोशिश करते— का पद 5 महीने से खाली रहना इसकी पुष्टि ही करता है.


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बदलाव को अपनाइए

इतिहास को देखें तो पता चलेगा कि सेना में बदलाव राजनीतिक पहल से होता है. सरकार को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा परिप्रेक्ष्य 2050’ तैयार करने के लिए दीर्घकालिक रणनीतिक समीक्षा करनी चाहिए. इससे एक प्रगतिशील राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति उभरेगी जिसकी समय-समय पर समीक्षा होगी और उसे जीडीपी के बारे में किए जाने वाले अनुमानों के अनुरूप रखा जाएगा. यह सरकार की ज़िम्मेदारी है, सेना की नहीं. और यह काम राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पाले में 2018 से अटका पड़ा है.

उपरोक्त प्रक्रिया से सेनाओं का आकार और उनकी क्षमताओं का निर्धारण होगा. फिलहाल हम सेना को बीते युग के युद्ध/लड़ाई के लिए तैयार करने की निरंतर कोशिश में जुटे हैं. जरूरत है कि उसमें विचार के स्तर पर सुधार ‘ऊपर से शुरू करके नीचे तक’ किए जाएं और सुधारों का क्रियान्वयन ‘नीचे से शुरू करके ऊपर तक’ किया जाएं. यह सब रक्षामंत्री के अधीन गठित एक कमिटी के द्वारा किया जाए. इस कमिटी में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शामिल हों और सेना तथा नौकरशाही—सीडीएस, सेनाओं के अध्यक्ष, और रक्षा, गृह तथा वित्त मंत्रालयों के सचिवों—के अलावा इस क्षेत्र के विशेषज्ञ भी शामिल हों.

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उपरोक्त कमिटी समयबद्ध बदलाव के साथ वित्तीय व्यवस्था की रूपरेखा तैयार करे और उसे सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमिटी से मंजूर कराए. इसके बाद सीडीएस को औपचारिक निर्देश दिया जाए कि वे बदलाव के विस्तृत प्रस्ताव तैयार करें. रक्षा मामलों की संसदीय स्थायी समिति या एक विशेष समिति का गठन किया जाए, जो बदलाव की प्रक्रिया की निगरानी करे और राष्ट्रीय सुरक्षा/रक्षा अधिनियम को पारित कराए.

जब तक उपरोक्त औपचारिक और राजनीतिक रूप से स्वीकृत प्रक्रिया का पालन नहीं किया जाता तब तक सेना को बदला नहीं जा सकेगा.


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अधिकार संपन्न सीडीएस जरूरी

ऊंचे पदों पर योग्यता के आधार पर नियुक्ति करने के अधिकार का प्रयोग करते हुए सरकार ने सीडीएस की नियुक्ति में पांच महीने की जो देरी की उसकी कोई वजह नहीं नज़र आती. इस पद पर नियुक्ति के लिए पारदर्शी तरीके से चयन करके तीन नामों पर फैसला करने के लिए, जिसे कैबिनेट की नियुक्ति कमिटी मंजूर कर दे, रक्षामंत्री के अधीन एक बोर्ड का गठन करने को 5 महीने काफी थे.

सीडीएस और वायुसेना अध्यक्ष के बीच वायुसेना की शक्ति को लेकर जो सार्वजनिक विवाद हुआ था उसके मद्देनजर यही उम्मीद की जा सकती है कि सरकार ने तीनों सेनाओं के एकीकरण के मामले को अनिश्चित काल के लिए टाल न दिया हो. तीनों सेनाओं का एकीकरण और थिएटर कमांड्स के गठन बदलाव की अनिवार्य शर्तें हैं. सीडीएस बदलाव की धुरी हैं. उसे एक बौद्धिक दूरदर्शी होना चाहिए, जिसमें फैसले को लागू करने की इच्छा शक्ति हो.

नियुक्ति को लेकर जो वैचारिक विसंगतियां हैं उन्हें दूर किया जाना चाहिए. सैनिक कमान में ‘बराबर वालों में अगुआ’ और ‘सर्वसम्मत निर्णय’ जैसी चीजें नहीं होतीं. सीडीएस को रैंक के लिहाज से नहीं, तो औपचारिक रूप से भी और नियुक्ति में भी तीनों सेनाध्यक्षों में सीनियर बनाया जाए, जैसा कि अमेरिका में ज्वाइंट चीफ़्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन को बनाया जाता है. अति उत्साही या मनमाने सीडीएस को गंभीर रक्षामंत्री काबू में रख सकते हैं. बदलाव की प्रक्रिया के तहत, अधिकार संपन्न कमिटी ‘सीडीएस बनाम सेनाध्यक्ष’ के मतभेदों का निपटारा कर सकती है.

थिएटर कमांडों पर सीडीएस का ऑपरेशनल कमांड होना चाहिए. सेनाध्यक्षों की भूमिका अपनी सेना में ट्रेनिंग देने और शासन चलाने तक सीमित होनी चाहिए. जब तक सेनाओं के अध्यक्ष कमांड के काम करते रहेंगे तब तक तीनों सेनाओं का सच्चा एकीकरण नहीं हो सकेगा. तीनों सेनाओं के ऑपेरेशन्स महानिदेशालयों का भी एकीकृत डिफेंस स्टाफ में विलय हो जाना चाहिए, जो सैन्य मामलों के विभाग (डीएमए) की सैन्य शाखा के रूप में काम करेगा. डीएमए और रक्षा विभाग का आपस में विलय भी जरूरी होगा. रक्षा सचिव सीडीएस के अधीन होना चाहिए और कामकाज के नियमों में संशोधन किया जाएगा. सीडीएस सरकार का एकमात्र सैन्य सलाहकार कैसे होगा, जबकि सरकार की नीति के मुताबिक रक्षा सचिव को ‘भारत और उसके हरेक भाग की रक्षा के साथ-साथ रक्षा नीति और प्रतिरक्षा की तैयारी’ के लिए जिम्मेदार बताया गया है.


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नयी शुरुआत करें

इसमें कोई शक नहीं रहना चाहिए कि सेनाओं के बदलाव की दिशा में अब तक कोई बड़ा, ठोस सुधार नहीं किया गया है. वास्तव में, विचार के स्तर पर तो कई सुधारों की अवधारणा तैयार की जा चुकी है लेकिन किन्हीं अस्पष्ट कारणों से इन्हें अभी तक लागू नहीं किया गया है. सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति को औपचारिक रूप न देकर, सेनाओं को औपचारिक निर्देश न देकर, और सुधारों को लागू करने की प्रक्रिया की निगरानी/समन्वय के लिए रक्षामंत्री के अधीन एक अधिकार संपन्न समिति का गठन न करके बदलाव को अपनाने में विफल रही है. सेनाएं भी मौके पर आगे बढ़ने में विफल रही हैं. उन्हें कमांडरों के संयुक्त सम्मेलन में प्रधानमंत्री के संक्षिप्त दिशा-निर्देश से उभरे मौके का पूरा लाभ उठाकर अपने भीतर व्यवस्था जनित सुधार करना चाहिए था, खासकर तब जबकि प्रधानमंत्री के उक्त भाषण का ड्राफ्ट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमिटी द्वारा ही पीएमओ को भेजा जाता है.
बहरहाल, सरकार और सेना को फिर से मिल-बैठकर नयी शुरुआत करनी चाहिए.

(ले.जन. एचएस पनाग, पीवीएसएम, एवीएसएम (रिटायर्ड) ने 40 वर्ष भारतीय सेना की सेवा की है. वो नॉर्दर्न कमांड और सेंट्रल कमांड में जीओसी-इन-सी रहे हैं. रिटायर होने के बाद आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के सदस्य रहे. उनका ट्विटर हैंडल @rwac48 है. व्यक्त विचार निजी हैं)

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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