Monday, 27 June, 2022
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बजट 2018-19: मौका कुछ भी हो, निचोड़ने के लिए मध्यवर्ग तो है ही!

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मध्यवर्ग से टैक्स निचोड़ने के मामले में सरकारें हमेशा बेरहम रही हैं, क्योंकि न तो उसकी कोई लॉबी होती है और न ही उसे चुनावी वोट बैंक माना जाता है.

कासाब्लांका की मशहूर गाथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रहती है इसलिए इसके एक पात्र, गुड़गोबर किस्म के पुलिस कप्तान रेनॉल्ट ने ‘रिक्स कैफे अमेरिकैन’ में घटी एक वारदात पर जो यादगार वाक्य कहा था उसे आप भूले नहीं होंगे. नरेंद्र मोदी सरकार के अंतिम बजट में मध्यवर्ग के साथ जिस तरह पुराने संदिग्ध जैसा बरताव किया गया है यह बताने के लिए आप चाहें तो रेनॉल्ट के उस वाक्य का बखूबी इस्तेमाल कर सकते हैं.

सरकारों को फिजूलखर्ची या वोटों की खातिर पैसा लुटाने की राजनीतिक जरूरत के कारण प्रायः पैसे की कमी पड़ जाती है. तब वे बेदम मध्यवर्ग और खासकर वेतनभोगी तबके का गला पकड़ती हैं. इस वर्ग की न तो अपनी कोई आवाज होती है, न अपनी पहचान होती है और न वोट बैंक होता है. तो उसकी गरदन पकड़ो, पिछवाड़े एक लात लगाओ तो वह कुछ-न-कुछ उगल ही देगा.और इसका कोई राजनीतिक नुकसान भी नहीं होता है. बल्कि वह जितनी जोर से चीखेगा, गरीब तबके को उतना ही परपीड़ा सुख मिलेगा. आज के दौर में इसे राजनीति का ‘नोटबंदी मॉडल’ कहा जा सकता है. कुछ ऐसा नाटकीय कदम उठा लो और गरीबं को यह समझा दो कि इससे तुम्हें कुछ देर के लिए भले परेशानी हो मगर इसे बर्दाश्त कर लो, क्योंकि जरा देखो तो कि उन अभागे अमीरों को कितनी चोट पहुंची है. यह और बात है कि अमीरो का सचमुच कुछ नहीं बिगड़ता. गरीबों को जरूर चोट पहुंचती है, मगर वे तो वैसे भी हमेशा परेशानहाल रहते हैं. मध्यवर्ग को तो कभी भी चोट पहुंचाई जा सकती है- राजस्व के लिए, राजनीति के लिए, अपनी खुशी के लिए, किसी भी चीज के लिए.

यह बजट अगली सुबह तक ही हमारे दिमाग से बाहर निकल चुका होता. या ज्यादा से ज्यादा तब तक ही हमारे दिमाग में बना रहता. वैसे भी यह तुरंत खबरों में आने लायक नहीं था. इसका बड़ा हिस्सा हमारे जीवन में 2019 की गर्मियों में भाजपा के चुनाव घोषणापत्र के रूप में वापस लौटता. लेकिन शेयर तथा बॉण्ड बाजारों में जो भारी गिरावट हुई उसके कारण यह अगले दिन शुक्रवार को चर्चा में रहा.

बाजार का तुरंत सत्यानाश करने वाले बजटों की तरह यह बजट वोडाफोन के मामले में पिछली तारीख से संशोधन करने के ‘दादा’ प्रणव मुखर्जी के फैसले की तरह का था. यह इतना विषाक्त था कि इसके बाद दो वित्त मंत्री आए और छह बजट गुजर गए लेकिन किसी ने भी सर्जरी के समय पहने जाने वाले दस्ताने पहनकर इसे चिमटे से भी छूने की हिम्मत नहीं की. पी. चिदंबरम के तीन बजटों में भी बाजार को झटके देने वाली बाते थीं- बैंकों से नकदी लेनदेन पर टैक्स, सिक्युरिटी लेनदेन पर टैक्स और कर्मचारियों को दिए जाने वाले शेयरों पर टैक्स का सपूंर्ण अभिलेखन. इस बजट ने पिछले दशक में मध्यवर्ग द्वारा बचत के उस एक विकल्प, इक्विटी लिंक्ड म्युचुअल फंड पर हमला किया है जिसे सरकारी विज्ञापनों में खूब प्रचारित किया गया था. यह हमला कम समय में ही बाजार पर, और बढ़ते भरोसे पर चोट पहुंचाने के पिछले हमले के बराबर है. इसने मध्यवर्ग को कहीं का नहीं छोड़ा है.

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मैं यह इस तथ्य से प्रभावित होकर लिख रहा हूं कि बिजनेस स्टैंडर्ड लि. के अध्यक्ष तथा आर्थिक मामलों के अतिसम्मानित टीकाकार टी.एन. नैनन ने ‘लांगटर्म कैपिटल गेन टैक्स’ (दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ टैक्स) को फिर से लागू करने की जोरदार वकालत की थी. यहां अपने स्तंभ ‘वीकेंड रूमिनेशंस’ में 6 जनवरी को उन्होंने लिखा था कि वित्त मंत्री घाटे को कम करना चाहते हैं तो इक्विटी से होने वाले लाभ पर टैक्स लगाने के सिवा कोई उपाय नहीं है. जाहिर है कि वित्त मत्री को उनकी सलाह मूल्यवान लगी और घाटे को कम करने का यह आर्थिक तर्क जबरदस्त लगा. मैं इसे दूसरे मजबूत उपाय से हल करना चाहता हूं.

पहले तो एक सवाल, कि क्या सरकार अपनी चुनावी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए वित्तीय नतीजों की परवाह किए बिना जो मन में आए कर सकती है और मनमाने टैक्स थोप सकती है? मैं सब्सीडियों या गरीबों की खातिर चलाए जाने कार्यक्रमों (इन पर खर्चे तो बढ़ाए ही गए हैं) को लेकर शिकायत नहीं कर रहा हूं. लेकिन नोटबंदी जैसे ऊटपटांग विचार से तो मुझे शिकायत है ही, जिसने पूरे साल की जीडीपी वृद्धि दर में 1-2 प्रतिशत की कमी करने लायक संपदा का सफाया कर दिया, साथ में कई रोजगार तथा छोटे कारोबार को नष्ट कर दिया.

इस कदम के पीछे यह तर्क दिया गया था कि यह लाखों लोगों को अनौपचारिक, नकदी की अर्थव्यवस्था से औपचारिक बैंकिंग चैनल में ले आएगा और भारत में करदाताओं के आधार को तथा करों की उगाही में भारी बढ़ोतरी करेगा. लगभग डेढ़ साल के बाद भी ये सारे फायदे दूर-दूर तक नहीं नजर आ रहे हैं. अर्थशास्त्री कौशिक बसु ने आर्थिक सर्वे में से यह नायाब अंश खोज निकाला है जिसमें नोटबंदी की विफलता स्वीकार की गई है. उन्होंने ट्वीट किया- “यह अच्छी बात है कि भारत के आर्थिक सर्वे 2017-18 में नोटबंदी को एक भारी भूल के रूप में स्वीकार किया गया है और कहा गया है कि अर्थव्यवस्था में जो गिरावट आई है वह ‘पिछली नीतिगत कार्रवाइयों के प्रभावों के कारण है.'”

दूसरी ओर, आप इक्विटी लिंक्ड म्युचुअल फंडों के लाभांश पर टैक्स लगाकर अपनी इस भूल को और मजबूत कर रहे हैं. आपका यह दावा खामख्याली साबित हो चुका है कि आप लाखों नए लोगों को करों के दायरे में ला देंगे. इसलिए आपके पास फिर से कैप्टन रेनॉल्ट की तरह आम संदिग्धों की धरपकड़ करने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचता.

दूसरा तर्क राजनीतिक किस्म का है. सभी (केवल भाजपा की नहीं) सरकारें मध्यवर्ग के साथ इसलिए बेरहमी करती हैं कि इसकी न तो कोई अपनी लॉबी है, और न चुनावी ताकत है. इस तरह का बजट आपकी राजनीति के लिए मुफीद हो सकता है. आपको गरीबों को यह भरोसा दिलाना होगा कि इस नहीं तो अगले जन्म में उनके खाते में लाखों करोड़ों रुपये आने वाले हैं, किसानों को कहना होगा कि आप उनकी तकलीफ दूर करने के लिए पैसे बांटने जा रहे हैं, क्योंकि उन सबके पास वोट हैं. जिस मध्यवर्ग ने आपको बढ़चढ़कर वोट दिए, उनके लिए आपके पास दूसरी तरह के झुनझुने हैं- योग, गोरक्षा, मुसलमानों की सभी समस्याओं (तीन तलाक से लेकर हज सब्सीडी और लव जिहाद तक) के मुकम्मल निबटारे का वादा.

कुछ आंकड़े हमारे लोक विमर्श में शामिल हैं. इनमें से एक आंकड़ा यह है कि आकलन वर्ष 2015-16 के सरकारी आंकड़े के मुताबिक केवल 2.56 प्रतिशत भारतीय ही टैक्स भरते हैं. 1.3 अरब आबादी और विशाल मध्यवर्ग, जिसकी तादाद इस 2.56 प्रतिशत से ज्यादा है (चाहे आप नीति आयोग के आंकड़े लें या ‘इकोनॉमिस्ट’ पत्रिका के), वाले इस देश के लिए यह एक विडंबना ही है. लेकिन क्या यह दोगुनी बड़ी विडबना नहीं है कि केवल 2.56 प्रतिशत भारतीय ही आयकर उगाही में 100 प्रतिशत का योगदान देते हैं?

इससे यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि एक महान सरकार इस 2.56 प्रतिशत को विस्तार देने के लिए कुछ महान कार्य करेगी. नोटबंदी पहला ‘झटका’ था और इसके बाद जीएसटी ‘हलाल’ के रूप में लाया गया. लेकिन अपेक्षित विस्तार कहां हुआ? तथ्य यह है कि सभी सरकारें इस एक लक्ष्य को पूरा करने में विफल रही हैं. नतीजतन, वे बड़े टैक्सचोरों को या टैक्स के दायरे से अलग करोड़ों लोगों को पकड़ने में विफल रही हैं और उन्हीं पर मार करती रही हैं जिनके पास छिपने का कोई रास्ता नहीं है.

अब वेतनभोगी लोग अपनी बचत को कहां जमा करें? उनके पास नकदी नहीं है और जायदाद के आगे उनके लिए ऊंची दीवार खड़ी है. एनडीए के चार सालों में जायदाद की कीमतें तेजी से गिरी हैं. बैंक और नियंत्रित दरें देने वाली सरकारी बचत योजनाएं लाभ में निरंतर कमी करती जा रही हैं, जबकि यही बैंक ऋण की दरों में इसी अनुपात में कटौती नहीं कर रही हैं जिसके चलते ईएमआइ में कमी नहीं आई है. सरकारों की तरह लालची, फिजूलखर्च बैंक भी डिफॉल्टरों के कारण खराब हुई अपनी बैलेंसशीट को चमकाने के लिए केवल उन्हीं लोगों को दुहना जानते हैं- मध्यवर्गीय बचतकर्ताओं को और मकान, वाहन या शिक्षा के लिए कर्ज लेने वालों को. ये बचतकर्ता अब अपना पैसा कहां निवेश करें? सोने में?

चिदंबरम के 2004 के बजट के तुरंत बाद जब बाजार में गिरावट आई थी तब उन्होंने वही कहा था, जो तमाम वित्त मंत्री ऐसी हालत में कहते रहे हैं- मैं किसानों के लिए बजट बनाता हूं या शेयर दलालों के लिए? तब मैंने लिखा था कि आधुनिक अर्थव्यवस्था में मामला किसान बनाम दलाल का नहीं हो सकता. यह किसान और दलाल, दोनों का मामला होना चाहिए क्योंकि कृषि और वित्त बाजार एक-दूसरे से अलगथलग नहीं रह सकते. उस बजट में कई सुधार किए गए और नुकसानों की भरपाई की गई थी. ताजा बजट में भी किए जाने चाहिए.

भारतीय मध्यवर्ग कुल मिलाकर शहरी है और अभी भी नरेंद्र मोदी के प्रति प्रतिबद्ध है, जैसा कि गुजरात चुनाव से साफ है. वह उनके प्रति इतना वफादार है कि उसने इस तथ्य की भी अनदेखी की है कि उनकी सरकार ने चार साल तक तेल की कीमतों में गिरावट का फायदा उस तक नहीं पहुंचने दिया और एक्साइज ड्युटी से हुई ज्यादा आय से वित्तीय घाटे की भरपाई करती रही. उसकी बचत के एक साधन को पहुंचाया गया झटका उसे गहरा घाव देगा.

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