Thursday, 7 July, 2022
होममत-विमत111 साल बेमिसाल: इतने सालों में पद्मावती पर तमाम कहानियाँ पर कोई विवाद नहीं, लेकिन अब?

111 साल बेमिसाल: इतने सालों में पद्मावती पर तमाम कहानियाँ पर कोई विवाद नहीं, लेकिन अब?

Text Size:

1906 से, रानी पद्मिनी और अलाउद्दीन खिलजी की कहानी को विभिन्न रूपों के माध्यम से कई बार दर्शाया गया है और वो भी लोगों के किसी उग्र विरोध के बिना.

पहलाज निहलानी, जो कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष रहे हैं, जिन्हें एक उचित दृष्टिकोण न देने वाले व्यक्ति के रुप में जाना जाता है, उन्होंने संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावत को लेकर उठे विवाद पर अपने जीवन की शायद सबसे उचित टिप्पणी की. उन्होंने पूछा कि “रानी पद्मिनी के जीवन पर आधारित पूर्व संस्करणों पर किसी राजपूत समूह ने कोई क्रोध प्रकट क्यों नहीं किया?”

दरअसल, रानी पद्मिनी की गौरवशाली कहानी के कई संस्करण लगभग पिछले 111 सालों से भारतीय थियेटर, फिल्म और टेलीविजन का हिस्सा रहे हैं और कभी भी इसको लेकर कोई विवाद नहीं हुआ है.

साहित्य

1906 में बंगाली कवि और नाटककार क्षीरोद प्रसाद विद्याविनोद का नाटक पद्मिनी उसी कहानी पर आधारित था – जिसमें अलाउद्दीन खिलजी छल का प्रयोग करते हुए चित्तौड़ के राणा को अपने कब्जे में कर लेता है, रानी पद्मिनी अपने पति को बचाने का प्रबंध करती हैं और बाद में, युद्ध में मिली हार के परिणामस्वरुप रानी पद्मिनी समेत सभी राजपूत महिलाएं एक साथ जौहर करती हैं.

अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक

दिप्रिंट आपके लिए ले कर आता है कहानियां जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहां से जहां वे हो रही हैं

हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.

अभी सब्सक्राइब करें

तीन साल बाद, 1909 में, अवनींद्रनाथ टैगोर की फिल्म राज काहिनी प्रकाशित हुई. बच्चों के इस साहित्य संग्रह में पद्मिनी, रतन सिंह और खिलजी की एक ऐसी ही कहानी बतायी गयी, जिसमें एक भाग जोड़ा गया कि चित्तौड़ की रक्षा के लिए राजपूत राजा ने अलाउद्दीन को अपनी पत्नी के आत्मसमर्पण का प्रस्ताव दिया, लेकिन उनके साथी राजपूत राजाओं ने इस तरह के प्रस्ताव से इनकार कर दिया.

सिनेमा

सिनेमा का इतिहास भी पद्मिनी की कहानियों से पटा पड़ा है. 1963 में, तमिल फिल्म चित्तौड़ रानी पद्मनी में अभिनेत्री वैजयन्तीमाला ने प्रमुख भूमिका निभाई थी. तमिल सुपरस्टार शिवाजी गणेशन ने राणा रतन सिंह की और एम.एन. नांबियार ने खिलजी की भूमिका निभाई थी. इस फिल्म के रिलीज होने से पहले किसी भी प्रकार का विरोध नहीं हुआ था और न ही बॉक्स ऑफिस पर इसकी कोई चर्चा ही हुई थी.

एक साल बाद इस फिल्म का हिंदी संस्करण महारानी पद्मिनी आया, जिसमें अभिनेत्री अनीता गुहा ने रानी की, अभिनेता जयराज ने उनके पति की और सज्जन ने खिलजी की भूमिका निभाई. यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही थी, लेकिन मोहम्मद रफी, आशा भोंसले, सुमन कल्याणपुर और उषा मंगेशकर द्वारा गाए गए गाने हिट रहे थे. इस फिल्म का भी किसी प्रकार से विरोध नहीं हुआ.

टेलीविजन

70 मिमी के पर्दे के इन दो संस्करणों के अलावा, रानी पद्मिनी की कहानी छोटे पर्दे पर भी प्रदर्शित की गई. श्याम बेनेगल के प्रसिद्ध शो भारत एक खोज में भी महरानी पद्मिनी पर एक एपिसोड था. जिसमें ओमपुरी ने खिलजी की भूमिका निभाई थी तथा सीमा केलकर ने पद्मिनी की भूमिका निभाई थी और रतन सिंह की भूमिका राजेंद्र गुप्त ने निभाई थी.

2009 में, सोनी एंटरटेनमेंट टेलिविजन ने चित्तौड़ की रानी पद्मिनी का जौहर नामक शो का प्रसारण शुरू किया था, जो राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता कला निर्देशक नितिन चंद्रकांत देसाई द्वारा निर्देशित था, जिसमें तेजस्वनी लोणारी ने पद्मिनी की भूमिका निभाई थी.

शो ने कम टीआरपी और अधिक लागत की वजह से अपने छः महीने भी पूरे नहीं किए। हालाँकि यह शो अपने भव्य सेट और कीमती वेशभूषाओं के लिए खबरों में था फिर भी इस शो को कभी भी अपनी ऐतिहासिक कहानी या संदर्भ के लिए विरोध का सामना नहीं करना पड़ा.

भंसाली की पद्मावती स्पष्ट रूप से पहली फिल्म नहीं है जो रानी पद्मिनी की कहानी से प्रेरित है. खिलजी की रानी पद्मिनी के प्रति मुग्धता को भी कथानकों में एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में इस्तेमाल किया गया है.

तो क्या एक व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर गौण समूहों और दक्षिणपंथी तत्वों द्वारा अपने विश्वास और विचारों को थोपने के लिए ये फिल्म एक आसान लक्ष्य है? इतिहास तो यही कहता है.

share & View comments