Thursday, 26 May, 2022
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भारत में मानसिक बीमारी से जूझ रहे 74 फीसदी लोगों को नहीं मिलती पर्याप्त सरकारी मदद

विश्व मानसिक स्वास्थ्य फेडरेशन (डब्ल्यूएफएमएच) के सहयोग से नई दिल्ली स्थित कासमोस इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड बिहैवियरल साइंसेस (सीआईएमबीएस) का सर्वे.

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नई दिल्ली : मानसिक बीमारियों को लेकर देश में अभी भी जागरूकता का काफी अभाव है. इसके कारण इससे जूझ रहे लोगों को सही इलाज नहीं मिल पाता. ऐसे ही लोगों के बीच किए गए एक ताज़ा सर्वे में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं. इसमें हिस्सा लेने वाले 74 प्रतिशत लोगों का कहना है कि सरकार मानसिक बीमारी से जूझ रहे लोगों को इलाज की पर्याप्त सुविधाएं मुहैया नहीं करा पाती.

सर्वे में शामिल 41 प्रतिशत लोगों को लगता है कि मानसिक बीमारी से जूझ रहे लोगों के प्रति बाकी के लोगों का रवैया असंवेदनशील होने के साथ-साथ उपहास करने वाला होता है. वहीं, 55 प्रतिशत लोगों को लगता है कि इससे जूझ रहे लोग ख़तरनाक होते हैं.


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विश्व मानसिक स्वास्थ्य फेडरेशन (डब्ल्यूएफएमएच) के सहयोग से नई दिल्ली स्थित कासमोस इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड बिहैवियरल साइंसेस (सीआईएमबीएस) ने ये सर्वे किया है. जागरूकता पर बात करते हुए सीआईएमबीएस की मनोचिकित्सक डॉ. दीपाली बंसल ने कहा कि 55 प्रतिशत लोगों द्वारा मानसिक बीमारियों से जूझ रहे लोगों को ख़तरनाक मानना एक गलत धारणा है.

उन्होंने कहा, ‘मानसिक बीमारी वाले लोग दूसरों के लिए तो ख़तरनाक साबित नहीं होते उल्टे इनके साथ दुर्व्यवहार होने का ख़तरा बना रहता है. ऐसी धारणा को सिनेमा और मनोरंजन के अन्य माध्यमों ने ख़ूब बढ़ावा दिया है.’

2016 के नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे में ये जानकारी सामने आई थी कि भारत में 15 करोड़ लोग मानसिक बीमारी से जूझ रहे हैं और उन्हें तुरंत मदद की दरकार है. इसमें ये भी बताया गया था कि इनमें से 13.7 प्रतिशत लोग ऐसे हैं जिनके जीवन भर इस बीमारी से जूझने की आशंका है.

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भारत ने मानसिक स्वास्थ्य देखभाल से जुड़ा एक कानून मेंटल हेल्थ केयर एक्ट 2017 पास किया था. कानून पर बातचीत में 27 प्रतिशत लोगों ने कहा कि ऐसी बीमारियों से जूझ रहे लोगों के इलाज को और सुगम बनाया जाना चाहिए. वहीं, 39 प्रतिशत का कहना है कि ऐसे मरीज़ों की देखभाल कर रहे लोगों के लिए भी राह आसान की जानी चाहिए.


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नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे में ये जानकारी भी थी कि पुराने समय से चली आ रही गंभीर बीमारियों में दिमागी बीमारी भी शामिल है और छह में से एक व्यक्ति के इससे पीड़ित होने की आशंका बनी रहती है. इसके उलट ताज़ा सर्वे में ये बात सामने आई है कि 49 प्रतिशत लोगों को लगता है कि लोगों के बीच मानसिक बीमारी आम नहीं है.

इसका स्तर इतना व्यापक होने के बाद भी 57 प्रतिशत लोगों को किसी तरह की मानिसक बीमारी का पता नहीं है और वो इससे जुड़े किसी भी तरह के लक्ष्णों को नहीं पहचान सकते. सर्वे जारी करते हुए सीआईएमबीएस के निदेशक डॉ. सुनील मित्तल ने कहा, ‘मानसिक बीमारियों का इलाज पूरी तरह से संभव है लेकिन हमारे देश में ज़्यादातर पीड़ितों को इलाज नहीं मिल पाता. इसका कारण गलत धारणा, जागरूकता की कमी और मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं का नहीं होना है.’

हैरान करने वाली बात ये है कि देश में केवल 49 प्रतिशत मरीजों को उनके घर के 20 किलोमीटर के दायरे में मानसिक स्वास्थ्य सुविधाएं मिल पाती हैं. ऐसे में 48 प्रतिशत लोगों ऐसे हैं जिनके परिवार का कोई सदस्य या दोस्त नशे की लत का शिकार है लेकिन इनमें से 59 प्रतिशत लोगों के घर के आसपास कोई नशा मुक्ति केन्द्र नहीं है.

भारत में मानसिक बीमारियों के प्रति जागरूकता, व्यवहार परिवर्तन और इलाज की सुलभता का पता लगाने के लिए ये सर्वे किया गया. बताया जा रहा है कि मानसिक बीमारी के मामले में ये भारत में किया गया सबसे बड़ा स्वंतत्र सर्वे है.


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सर्वे से जुड़े डॉक्टर सुनील मित्तल ने कहा कि इसके आधार पर मानसिक स्वास्थ्य सेवा को बढ़ावा देने के लिए तीन प्रमुख बातें सामने आई हैं जिनमें मानसिक चिकित्सा केन्द्र खोलने, रोगियों की सेवा में लगे लोगों के लिए प्रक्रिया को आसान बनाने और जागरूकता अभियान चलाने जैसी बातें शामिल हैं.

देश के सात राज्यों में 10 हजार से ज़्यादा लोगों के बीच किए गए इस व्यापक सर्वे में ऐसी बातें निकलकर सामने आई हैं. सर्वे की रिपोर्ट विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के दौरान जारी की गई है ताकि इस पर चर्चा हो और मानसिक बीमारी से जुड़ी समस्याओं के हल की ओर कदम बढ़ाया जा सके.

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