Monday, 17 January, 2022
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क्या होती है प्रोटेस्ट पिटीशन, जिसके आधार पर SBI के पूर्व चेयरमैन प्रतीप चौधरी को गिरफ्तार किया गया

जैसलमेर की एक कोर्ट ने एक होटल के पूर्व निदेशकों की तरफ से दायर उस प्रोटेस्ट पिटीशन को स्वीकार कर लिया था, जिसमें आरोप लगाया गया है कि पूर्व एसबीआई प्रमुख ने उनकी 200 करोड़ रुपये की संपत्ति को महज 25 करोड़ रुपये में बेच दिया था.

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नई दिल्ली: राजस्थान पुलिस ने भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के पूर्व अध्यक्ष प्रतीप चौधरी को 1 नवंबर को एक कथित लोन घोटाले के सिलसिले में गिरफ्तार किया था.

उनकी गिरफ्तारी जैसलमेर में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) की कोर्ट के एक आदेश के आधार पर हुई थी, जिसने होटल गोदावन के पूर्व निदेशकों की तरफ से दायर प्रोटेस्ट पिटीशन को स्वीकार करने के बाद बैंकर के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया था.

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि होटल मालिकों के लोन चुकाने से चूक जाने पर एसबीआई के पूर्व अध्यक्ष ने उनकी 200 करोड़ रुपये की संपत्ति अल्केमिस्ट एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड नाम की कंपनी को महज 25 करोड़ रुपये में बेच दी थी. शिकायत में दावा किया गया कि चौधरी रिटायरमेंट के बाद अलकेमिस्ट के बोर्ड में शामिल हो गए थे.

एसबीआई के एक बयान के मुताबिक, शिकायतकर्ताओं ने 2007 में बैंक से 25 करोड़ का लोन लिया था. उनके भुगतान करने में विफल रहने पर वसूली के प्रयास शुरू किए गए और बकाया राशि मार्च 2014 में एक परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनी (एआरसी) को सौंप दी गई. एआरसी की बिक्री बैंक की नीति के अनुरूप एक निर्धारित प्रक्रिया के माध्यम से की गई थी.

दिप्रिंट आपको बता रहा है कि प्रोटेस्ट पिटीशन क्या होती है, कौन इसे दायर कर सकता है और आपराधिक न्याय प्रक्रिया में इसकी प्रासंगिकता क्या है.

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दंड प्रक्रिया संहिता के तहत परिभाषित नहीं

प्रोटेस्ट पिटीशन या विरोध याचिका किसी पीड़ित या मुखबिर द्वारा पुलिस जांच के दौरान या उसके पूरा होने के बाद किसी मामले में पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट के खिलाफ आपत्ति जताने के लिए दायर की जाती है.

प्रोटेस्ट पिटीशन को भारत में आपराधिक मामलों में लागू होने वाली नियमावली यानी दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के तहत परिभाषित नहीं किया गया है, लेकिन ये एक ऐसा तंत्र है जो आपराधिक कानूनों के तहत पीड़ित के अधिकारों की पहचान के लिए कई सालों में न्यायिक फैसलों के जरिये अस्तित्व में आया है, जिसमें कुछ आजादी के पहले के भी हैं.

सीआरपीसी में जमानत देने और मामले को बंद करने के लिए पुलिस रिपोर्ट पर विचार करते समय पीड़ित पक्ष की सुनवाई की परिकल्पना नहीं की गई है. हालांकि, न्यायपालिका ने किसी आपराधिक मुकदमे के दौरान दो चरणों में पीड़ित को अपनी बात कहने का अधिकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

पुलिस सीआरपीसी की धारा 154 के तहत प्राथमिकी दर्ज करने के बाद जांच शुरू करती है. अगर पुलिस यह निष्कर्ष निकालती है कि आरोपी के खिलाफ आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त सबूत हैं, तो वे संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष सीआरपीसी की धारा 190 (बी) के तहत आरोपपत्र दायर करते हैं, जिसके बाद या तो मुकदमे की कार्यवाही शुरू होती है या मामले को उच्च न्यायाधीश के पास भेज दिया जाता है, जो किसी मामले में लगाए गए आरोपों की गंभीरता पर निर्भर करता है. ऐसे में पीड़ित का पक्ष सुनने की जरूरत नहीं पड़ती है.

हालांकि, जब पुलिस आरोपी के खिलाफ चार्जशीट करने लायक कोई सबूत होने से इनकार करती है, तो सीआरपीसी की धारा 173 के तहत मामले को बंद करने के लिए एक क्लोजर रिपोर्ट पेश करती है. ऐसा होने पर कोई मजिस्ट्रेट सीधे तौर पर मामला बंद करने से इनकार करके आरोपी को सम्मन कर सकता है या फिर पीड़ित/शिकायतकर्ता को निगेटिव रिपोर्ट पर आपत्ति जताने का मौका दे सकता है. यह सीआरपीसी की धारा 190 (ए) के तहत किया जाता है, जिसका उल्लेख विभिन्न हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में मिलता है.

हालांकि, किसी प्रोटेस्ट पिटीशन को कानूनन शिकायत नहीं माना जा सकता है. लेकिन कानूनी उपाय शिकायतकर्ता को मामले में आगे कार्यवाही जारी रखने की अपील के लिए सीआरपीसी की धारा 200—धारा 202 के साथ पठित—के तहत एक अलग शिकायत दर्ज कराने की अनुमति देते हैं.

सीआरपीसी की धारा 200 के तहत अपनाई जाने वाली प्रक्रिया में कोर्ट के लिए जरूरी होता है कि वह मुकदमे के लिए आरोपी को सम्मन करने से पहले शिकायतकर्ता और उसके गवाहों की जांच करे.

यदि मजिस्ट्रेट प्रोटेस्ट याचिका को स्वीकार कर लेता है तो मामले को संज्ञान में लिया जाता है और आरोपी को पेश होने और मुकदमे का सामना करने के लिए नोटिस भेजा जाता है. हालांकि, सुनवाई योग्य न पाए जाने की स्थिति में प्रोटेस्ट याचिका को खारिज करना मजिस्ट्रेट का विवेकाधिकार होता है.


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कैसे चलन में आई प्रोटेस्ट पिटीशन?

आजादी के पहले के समय में पटना और कलकत्ता दोनों हाई कोर्ट ने किसी आपराधिक मुकदमे में पीड़ितों के अधिकारों से संबंधित चिंताओं को व्यापक तौर पर दूर करने की कोशिश की थी.

‘नाराजी याचिकाओं’—जिन्हें साधारण तौर पर ‘डिसेटिफैक्शन’ (असंतुष्टि) के रूप में अनुवादित किया गया था—के संदर्भ में कलकत्ता हाई कोर्ट ने प्रोटेस्ट पिटीशन को मजिस्ट्रेट के समक्ष किसी फैसले से खिन्न व्यक्ति या मामले में पीड़ित व्यक्ति या मुखबिर का प्रतिनिधित्व करार दिया था.

1985 में सुप्रीम कोर्ट की तरफ से पहली बार उस स्थिति को स्पष्ट किया गया जिसके तहत प्रोटेस्ट पिटीशन दायर की जा सकती है. भगवंत सिंह बनाम पुलिस आयुक्त मामले के फैसले में कहा गया है कि सीआरपीसी में किसी भी प्रावधान के अभाव में आहत या पीड़ित के रिश्तेदार को नोटिस जारी करने का मजिस्ट्रेट का दायित्व ‘प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों’ से उपजा है.

अदालत ने फैसला सुनाया कि पीड़ित या परिवार का कोई सदस्य भले ही कानून के तहत नोटिस के हकदार नहीं हों, लेकिन उन्हें क्लोजर रिपोर्ट पर विचार किए जाते समय मजिस्ट्रेट के सामने पेश होने का अधिकार है. साथ ही अदालत ने कहा, हालांकि मजिस्ट्रेट नोटिस देने के लिए बाध्य नहीं हैं, वे अपने विवेक का प्रयोग करके आहत व्यक्ति को ऐसा नोटिस दे सकते हैं.

2019 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रोटेस्ट पिटीशन की अहमियत पर दो और विस्तृत फैसले दिए, लेकिन साथ ही मजिस्ट्रेटों से प्रोटेस्ट पिटीशन पर विचार करते समय सावधानी बरतने को कहा.

राजेश बनाम हरियाणा स्टेट मामले में शीर्ष कोर्ट ने कहा था कि अदालतों को सीआरपीसी के तहत अपनी शक्ति का इस्तेमाल किसी आरोपी को सम्मन करने के लिए करना चाहिए, भले ही उसका नाम चार्जशीट में नहीं हो. इसका इस्तेमाल इसलिए नहीं किया जाना चाहिए कि किसी जज की राय है कि ‘कोई अन्य भी दोषी हो सकता है’ लेकिन ‘केवल तभी किया जाना चाहिए जब किसी व्यक्ति के खिलाफ साक्ष्य के तरीकों के हिसाब से मजबूत और ठोस सबूत हों.

बाद में विष्णु कुमार तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश मामले में शीर्ष कोर्ट ने कहा, हर प्रोटेस्ट पिटीशन को शिकायत याचिका की तरह नहीं माना जाना चाहिए. कोर्ट ने कहा कि किसी मजिस्ट्रेट को प्रोटेस्ट याचिका को शिकायत मानकर संज्ञान में लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है, अगर वह पुलिस की अंतिम रिपोर्ट और गवाहों की तरफ से दर्ज कराए गए बयानों के आधार पर आश्वस्त है कि प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता है.

सुप्रीम कोर्ट ने एक हालिया फैसले में मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें कहा गया था कि कोई भी पीड़ित पुलिस की अंतिम रिपोर्ट को मंजूरी से पहले अनिवार्य रूप से नोटिस का हकदार है, और यदि नोटिस नहीं दिया जाता, तो उसे प्रोटेस्ट पिटीशन दायर करने का हक है.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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