नयी दिल्ली, 12 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने देहरादून में निर्माणाधीन युद्ध स्मारक के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करने से इनकार करते हुये याचिकाकर्ता से कहा कि जो लोग कर्तव्य निभाते हुए शहीद हुए हैं, उनका सम्मान करना चाहिए।
प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत एवं न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति विपुल एम पांचोली की पीठ ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील से पूछा, “क्या आपको एक युद्ध स्मारक के निर्माण से समस्या है?”
सर्वोच्च न्यायालय उत्तराखंड उच्च न्यायालय के जनवरी के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा था। उच्च न्यायालय ने उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि देहरादून जिले में बनाए जाने वाले युद्ध स्मारक “सैन्य धाम” के लिए जो भूमि तय की गई है, वह वन भूमि है और इसलिए वहां निर्माण की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, “जिन लोगों ने देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी, उनके प्रति कम से कम कुछ सम्मान तो होना चाहिए।”
पीठ ने यह भी कहा कि उच्च न्यायालय को इस याचिका को जुर्माने के साथ खारिज करना चाहिए था।
उन्होंने कहा, “हम उसे (याचिकाकर्ता को) कारण बताओ नोटिस जारी करेंगे। उसे आकर बताना होगा और हम यह जांच करेंगे कि वह किसके कहने पर यह याचिका दायर कर रहा है।”
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने दावा किया कि युद्ध स्मारक का निर्माण भी वहां ठीक तरीके से नहीं किया जा रहा है।
इस पर पीठ ने टिप्पणी की, “ये सब शरारतपूर्ण तरीके से दायर की गई रिट याचिकाएं हैं,” और वकील से पूछा कि याचिकाकर्ता पर कितना जुर्माना लगाया जाना चाहिए।
पीठ ने कहा कि वह इस याचिका को एक लाख रुपये की लागत के साथ खारिज करेगी।
इसके बाद याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे पीठ ने स्वीकार कर लिया।
उच्च न्यायालय में याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि राज्य सरकार भूमि की वास्तविक प्रकृति का पता लगाए बिना देहरादून में युद्ध स्मारक का निर्माण कर रही है।
राज्य की ओर से पेश वकील ने संयुक्त सर्वेक्षण रिपोर्ट का हवाला देते हुए उच्च न्यायालय को बताया था कि राजस्व एवं वन विभाग दोनों अधिकारियों द्वारा संयुक्त सर्वेक्षण किया गया था।
अधिवक्ता ने कहा कि संयुक्त निरीक्षण रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि संबंधित भूमि वन भूमि का हिस्सा नहीं है।
अदालत को यह भी बताया गया कि रिपोर्ट में कहा गया है कि युद्ध स्मारक के निर्माण के लिए भूमि आवंटन पर वन विभाग को कोई आपत्ति नहीं है।
राज्य के वकील ने उच्च न्यायालय को बताया कि युद्ध स्मारक का निर्माण 2021 में शुरू हुआ था और अब लगभग पूरा हो चुका है।
उच्च न्यायालय ने याचिका खारिज करते हुए कहा, “चूंकि वन विभाग ने भूमि का निरीक्षण कर प्रमाणित कर दिया है कि यह वन भूमि का हिस्सा नहीं है, इसलिए युद्ध स्मारक के निर्माण को चुनौती देने का याचिकाकर्ता का आधार कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है।”
भाषा रंजन नरेश
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