नई दिल्ली: शनिवार को कम से कम 50 हथियारबंद भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) जवान कानपुर पुलिस आयुक्त कार्यालय पहुंचे. आईटीबीपी कमांडेंट गौरव प्रसाद वहां एक कांस्टेबल की मां का हाथ एक निजी अस्पताल में कथित मेडिकल लापरवाही के कारण काटने के मामले में जांच की मांग करने पहुंचे थे.
प्रसाद ने दिप्रिंट से कहा, “मैंने हमारे जवान की मां के गलत इलाज के मामले पर चर्चा करने के लिए कानपुर पुलिस आयुक्त से मिलने का समय लिया था. मेरे साथ कुछ जवान और अधिकारी भी थे, जो बाहर इंतजार कर रहे थे, जबकि मैं उनसे बात कर रहा था. पुलिस ने मुझे न्याय का भरोसा दिया है और मामले की नई जांच होगी.”
शनिवार को सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में कई आईटीबीपी अधिकारी वर्दी में पुलिस आयुक्त कार्यालय में दिखे. हालांकि आईटीबीपी के प्रवक्ता ने दिप्रिंट से कहा कि जैसा आरोप लगाया जा रहा है, वैसा कोई “घेराव” नहीं हुआ.
प्रवक्ता ने कहा, “कोई घेराव या टकराव नहीं हुआ. जांच के लिए कमांडिंग ऑफिसर और कुछ जवान वहां मौजूद थे. अतिरिक्त जवानों को भ्रम से बचने के लिए वहां से हटा दिया गया.”
पुलिस आयुक्त रघुबीर लाल ने भी मीडिया से कहा कि आईटीबीपी के साथ कोई “घेराव” या टकराव नहीं हुआ, क्योंकि पुलिस भी जवान की मां को न्याय दिलाना चाहती है.
दिप्रिंट से बात करते हुए जवान विकास सिंह ने मेडिकल लापरवाही, मामले में एफआईआर दर्ज करने में देरी और मुख्य चिकित्सा अधिकारी यानी सीएमओ की शुरुआती जांच से असंतोष जताया.
आईटीबीपी जवान की मां का मामला 19 मई को चर्चा में आया, जब सोशल मीडिया पर वीडियो सामने आए जिनमें जवान अपनी मां का कटा हुआ हाथ थर्माकोल के डिब्बे में लेकर कानपुर पुलिस आयुक्त कार्यालय पहुंचा था. इसके बाद लाल ने मामले की जांच के लिए इसे मुख्य चिकित्सा अधिकारी हरिदत्त नेमी को भेजा था.
लेकिन मेडिकल बोर्ड की “अधूरी” जांच से सिंह की नाराजगी
की जानकारी मिलने के बाद लाल ने अब मामले में नई जांच के आदेश दिए हैं.
आयुक्त ने पत्रकारों से कहा, “हमने सीएमओ को नई जांच के निर्देश दिए हैं और रिपोर्ट के आधार पर सख्त कार्रवाई की जाएगी.”
शनिवार शाम तक सीएमओ को किए गए फोन कॉल का कोई जवाब नहीं मिला.
कटा हुआ हाथ
सिंह ने दिप्रिंट को बताया कि 5 मई को उनकी मां 56 वर्षीय निर्मला देवी को उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के अलीमऊ गांव के सरकारी अस्पताल ले जाया गया था, क्योंकि उनकी तबीयत खराब होने लगी थी.
सिंह ने कहा, “उनमें यूरिक एसिड ज्यादा पाया गया था, लेकिन दवा लेने के बाद भी उन्हें आराम नहीं मिला और उन्हें सांस लेने में दिक्कत होने लगी.”
इसके बाद वह अपनी मां को महाराजपुर स्थित आईटीबीपी अस्पताल ले गए, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मल्टीस्पेशियलिटी अस्पताल ले जाने की सलाह दी.
उन्होंने कहा, “जब हम आईटीबीपी अस्पताल से निकले तो एंबुलेंस में ऑक्सीजन दिए जाने के बावजूद उनकी हालत बिगड़ने लगी. इसलिए हमें उन्हें कानपुर के कृष्णा सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल ले जाना पड़ा.”
कृष्णा सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल आईटीबीपी के पैनल में शामिल है और वहां आईटीबीपी कर्मियों को रियायती इलाज मिलता है.
सिंह के मुताबिक अस्पताल के डॉक्टरों ने उनसे कागजों पर हस्ताक्षर करवाए, ताकि जरूरत पड़ने पर उनकी मां को वेंटिलेटर पर रखा जा सके. उन्होंने कहा, “अगली सुबह तक उनकी हालत बेहतर होने लगी थी, लेकिन मैंने देखा कि उनका दाहिना हाथ सूज गया था और काला पड़ गया था. वह दर्द की शिकायत कर रही थीं.”
उन्होंने कहा कि अगले कुछ घंटों में अस्पताल के डॉक्टरों ने हाथ पर मरहम लगाया और पट्टी बांध दी. सिंह ने कहा, “जब मेरी मां ने असहनीय दर्द की शिकायत की तो मैंने स्टाफ से पट्टी हटाने को कहा. तब तक उनका हाथ और ज्यादा सूज चुका था और और ज्यादा काला पड़ गया था.”
घबराए और नाराज सिंह अपनी मां को दूसरे निजी अस्पताल पारस अस्पताल ले गए. वहां डॉक्टरों ने बताया कि उनकी मां के दाहिने हाथ में खून का प्रवाह रुक गया था और उसमें संक्रमण हो गया था.
उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “उन्होंने इलाज की कोशिश की, लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद 17 मई को संक्रमण फैलने के डर से उनका हाथ काटना पड़ा.” उन्होंने डॉक्टरों पर “पूरी तरह लापरवाही” का आरोप लगाया.
दिप्रिंट ने कृष्णा सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल से संपर्क किया. वहां एक कर्मचारी ने कहा कि प्रबंधन मामले को देख रहा है. इसके बाद उसने किसी और सवाल का जवाब नहीं दिया. रविवार सुबह तक पारस अस्पताल से भी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी.
इसके बाद सिंह 17 मई को कानपुर के रेलबाजार पुलिस स्टेशन एफआईआर दर्ज कराने पहुंचे. लेकिन उन्होंने कहा कि बार-बार आग्रह करने के बावजूद शिकायत दर्ज नहीं की गई.
सिंह ने कहा, “18 मई को मैं एक और वरिष्ठ अधिकारी से मिला. उन्होंने भी सारे दस्तावेज लिए लेकिन एफआईआर दर्ज नहीं की.”
कार्रवाई न होने से नाराज सिंह अपनी मां का कटा हुआ हाथ थर्माकोल के डिब्बे में लेकर पुलिस आयुक्त कार्यालय पहुंचे. उन्होंने कहा, “वहां मौजूद मीडिया ने वीडियो बनाए और मामला वायरल हो गया. इसके बाद सीएमओ की तरफ से जांच शुरू हुई.”
चार दिन बाद मेडिकल कमेटी ने सिंह को बताया कि जांच पूरी हो गई है.
उन्होंने आरोप लगाया, “जांच रिपोर्ट में यह तक नहीं बताया गया कि किस डॉक्टर, दवा या प्रक्रिया की गलती थी. यह पूरी घोलपट्टी थी. सब बिके हुए हैं.”
इसके बाद जवान ने आईटीबीपी में अपने वरिष्ठ अधिकारियों को जानकारी दी, जिन्होंने 23 मई को लाल से मिलने का समय लिया.
उन्होंने कहा, “मेरे वरिष्ठ अधिकारियों ने नई जांच और मेरी मां की हालत की वजह पर साफ रिपोर्ट मांगी.”
आईटीबीपी प्रवक्ता के मुताबिक, “पहली नजर में अस्पताल की तरफ से लापरवाही दिखती है, लेकिन कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई.” मेडिकल बोर्ड ने “सिर्फ औपचारिक जांच की और कमियों को छिपाने की कोशिश की.”
प्रवक्ता ने कहा, “अस्पताल ने बोर्ड को कुछ रिपोर्ट दीं और कहा कि उन्होंने सभी तरह के टेस्ट किए थे. उन्हीं के आधार पर बोर्ड ने जांच रिपोर्ट तैयार कर दी. लेकिन वे टेस्ट किए ही नहीं गए थे. यह बात अस्पताल द्वारा मरीज को दिए गए डिस्चार्ज सर्टिफिकेट से साफ है.”
उन्होंने कहा, “पुलिस आयुक्त ने भी बोर्ड की जांच रिपोर्ट पर कई सवाल उठाए हैं और अब नई जांच के आदेश दिए हैं.”
आईटीबीपी के संपर्क अधिकारी अर्पित सिंह ने कृष्णा सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में कई “लापरवाही” के मामलों का आरोप लगाया.
उन्होंने कहा, “मैंने इसी अस्पताल में एक महिला कांस्टेबल और एक इंस्पेक्टर की लापरवाही के कारण मौत के बारे में सुना है.” सूत्रों के मुताबिक महिला कांस्टेबल को किडनी ट्रांसप्लांट के लिए आठ दिन तक अस्पताल में भर्ती रखा गया था, जिसके बाद उनकी हालत बिगड़ गई और उन्हें मृत घोषित कर दिया गया.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: लेफ्टिनेंट जनरल एनएस सुब्रमणि बतौर CDS—सही व्यक्ति, लेकिन प्रक्रिया गलत