News on Right to disconnect bill
एनसीपी की सांसद सुप्रिया सुले | फेसबुक
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प्रज्ञा रोज सुबह 8 बजे ऑफिस पहुंच जाती हैं. बारह घंटे काम करने के बाद जब वह रात 9 बजे अपने घर पहुंच रही होती हैं, इतने में उनके बॉस सुनील का फोन आता है.

‘तुमसे कितनी बार कहा है कि काम खत्म करने के बाद वर्क-शीट उसी दिन भेज दिया करो.’

‘सॉरी सर, मैं सुबह आते ही कर दूंगी.’

‘नहीं. मुझे अभी चाहिए. एक घंटे के भीतर. मेल मी राइट नॉउ. मैं इंतजार कर रहा हूं.’

थकी हारी घर पहुंची प्रज्ञा वापस ऑफिस के काम पर लग जाती हैं. एक घंटे में बेमन तरीके से काम पूरा कर, बॉस को मेल कर देती हैं. रात में 12 बजे उन्हें ऑफिस से एक मेल आता है, लेकिन तब तक वे गहरी नींद में होती हैं. जिसके कारण वे उस ‘जरूरी’ मेल का जवाब नहीं दे पातीं. अगले दिन सुबह 8 बजे जब वह ऑफिस पहुंचती हैं तो उन्हें उस मेल का जवाब नहीं देने के कारण उनके बॉस द्वारा जमकर खरी-खोटी सुनाई जाती है.

प्रज्ञा के साथ इस तरह की घटना अब अकसर ही होती है. अभी उन्हें नौकरी करते हुए 6 महीना भी नहीं हुए हैं. लेकिन वे तनाव से गुजर रही हैं. ये कहानी केवल एक लड़की या किसी एक इंसान की नहीं है, बल्कि भारत में ज्यादातर नौकरीपेशा लोगों को इस समस्या से दो-चार होना पड़ रहा है.

ऐसे में इस समस्या से निजात दिलाने के लिए राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) की सांसद सुप्रिया सुले लोकसभा में एक बिल लेकर आई हैं.

बिल क्या है, क्यों है?

एनसीपी की सांसद सुप्रिया सुले नौकरीपेशा लोगों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है. बीते 28 दिसंबर को उन्होंने लोकसभा में एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया है. इस बिल के प्रावधान के मुताबिक नौकरी पेशा लोग अपने ऑफिस आवर्स को छोड़कर कंपनी से आने वाले फोन और ईमेल का रिप्लाई नहीं करने के लिए स्वतंत्र होंगे.

इस बिल का मुख्य उद्देश्य नौकरी पेशा लोगों के जीवन में आए तनाव को कम करना है. यह बिल लोगों को अपनी ऑफिस लाइफ और निजी जिंदगी में बैलेंस बनाने में मदद करेगा. राइट टू डिस्कनेक्ट नामक इस बिल के प्रावधान में एक कर्मचारी कल्याण प्राधिकरण की स्थापना की जाएगी, जिसमें आईटी, कम्युनिकेशन के लोगों के अलावा लेबर मंत्री शामिल होंगे. विधेयक में डिजिटल माध्यमों के प्रभाव पर एक रिपोर्ट भी प्रकाशित करने की बात है.

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे बिल को लाने की बात अन्य देशों में भी चल रही है. इस तरह का एक बिल फ्रांस में भी पारित किया गया है. जर्मनी और न्यूयार्क में भी ऐसा कानून बनाने पर चर्चा चल रही है.

बिल को लेकर क्या कहते हैं नौकरीपेशा लोग

संसद मेंं बिल पेश होने के बाद कामकाजी लोगों में हलचल बढ़ गई है. लेकिन ज्यादातर लोग इसको लेकर आशांकित हैं. फूड डिलेवरी कंपनी में काम करने वाले अमित बताते हैं, ‘ इस बिल के आने से हमारा शोषण और भी बढ़ सकता है. बॉस का फोन नहीं उठाकर हम लोग कहां जाएंगे. बॉस ही सबकुछ हैं. वे नाराज हुए तो अप्रेजल नहीं मिलेगा.’

वहीं एक मीडिया संस्थान में काम करने वाले गौरव कहते हैं, ‘मीडिया वालों को इस बिल के लागू होने से भी कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा. हमें 24 घंटे सतर्क रहना पड़ता है. कब कौन सी घटना कहां हो जाए.’

एक मल्टी नेशनल कंपनी में काम करने वाली तुलिका बताती हैं, ‘इस बिल की नीयत अच्छी तो है, लेकिन इसको लागू करना बहुत मुश्किल होगा. हमारे यहां कोई टाइम फॉलो नहीं होता है. किसी न किसी कारण से ओवर टाइम करना पड़ ही जाता है.’

स्ट्रेस में हैं नौकरीपेशा लोग

सर्व एजेंसी आप्टम द्वारा किए गए एक सर्वे के मुताबिक भारत में लगभग आधे से अधिक कर्मचारी किसी न किसी तनाव से गुजरते हैं. यह सर्वे 8 लाख कर्मचारियों के बीच किया गया था. वहीं इकोनॉमिक्स टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के 89 फीसदी लोग तनाव से गुजर रहे हैं और इसमें से 75 फीसदी लोग किसी डॉक्टर को मंहगी फीस के चलते उनसे परामर्श लेने से कतराते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक विकासशील और उभरते देशों में तनाव के मामले में भारत सबसे आगे है.

अक्सर देखा गया है लोगों के ऑफिस के काम का तनाव का असर उनकी निजी जिंदगी पर पड़ता है. नोएडा के रेनोवा केयर के साइकेट्रिस्ट डा. प्रवीण त्रिपाठी दिप्रिंट से बातचीत में बताते हैं, ‘ हमारे यहां अधिकतर आईटी प्रोफेशनल आते हैं. वे अपने ऑफिस के काम से ज्यादा तनाव में रहते हैं.’

कई लोगों पर बॉस का इतना डर होता है कि वे दिखाने के लिए काम करने लगते हैं. बॉस को संतुष्ट करने के लिए रात में दो बजे मेल डाल देते हैं. इसपर डॉ. प्रवीण कहते हैं, ‘ऐसा करने से दो नुकसान होता है. एक तो लोगों का मेंटल हेल्थ खराब होता है. दूसरा उनके बेमन काम करने से कंपनी का कोई फायदा नहीं होता है.’

वे आगे बताते हैं, ‘पहला स्टेज तनाव का होता है. दूसरा डिप्रेशन का. हमारे यहां दूसरे स्टेज से ज्यादातर मरीज आते हैं.’

बिल के पास होने की संभावना कितनी

अगर राइट टू डिस्कनेक्ट बिल सदन में पारित होकर कानून बन जाता है तो यह नौकरीपेशा लोगों के लिए राहत ले आएगा. लेकिन यह एक प्राइवेट मेंबर बिल है और अगर इतिहास खंगाले तो ऐसे बिल किसी न किसी कारण से ठंडे बस्ते में चले जाते हैं. चाहे वो तिरुचि सिवा द्वारा पेश किया गया ट्रांसजेंडर बिल हो या फिर शशि थरूर द्वारा पेश किया गया मैरिटल रेप को अपराध बनाने का बिल.

ऐसे में अब यह देखने वाली बात होगी कि नौकरीपेशा लोगों के तनाव दूर करने के मकसद से लाया जा रहा ये बिल कितना आगे जा पाएगा.


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