Sunday, 26 June, 2022
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‘हुमच के, बनराकस, छेक के, रंगबाजी’: पंचायत का फुलेरा बिल्कुल बदल चुका है

पंचायत के दूसरे सीजन को लेकर अलग-अलग रिव्यू भी आ गए हैं तो अब ठहर कर इस सीरीज के उन दो पहलुओं पर बात करना जरूर हो जाता है जिस पर अभी तक कोई चर्चा नहीं हुई. पहला 'बदलाव' और दूसरा 'भाषाई शैली'.

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वेब सीरीज पंचायत के दूसरे सीजन को आए 4-5 दिन हो चुके हैं और तमाम सिनेमा और कला पसंद लोगों में इसे देखने की जो बैचेनी दिखी वो सिनेमा और कला के समाजशास्त्र और प्रायोगिक बदलाव की तरफ सोचने का इशारा करती है.

भारत में जब से वेब सीरीज के फिल्मांकन और देखने का चलन बढ़ा तो ज्यादातर दर्शकों की नज़रें अपराध केंद्रित कंटेंट तक ही सीमित रही क्योंकि इसी तरह का कंटेंट लंबे समय तक परोसा गया. हालांकि अब इसमें बदलाव देखने को मिल रहा है जब नए तरह की थीम्स पर कंटेंट तैयार किया जाने लगा है.

सेक्रेड गेम्स और मिर्जापुर जैसे चर्चित वेब सीरीज ने दर्शकों के बीच अलग तरह के कंटेंट को लेकर उत्सुकता तो जरूर बढ़ाई लेकिन बार-बार एक ही तरह की कहानी ने लोगों में बोरियत भी पैदा कर दी. इसका उदाहरण सेक्रेड गेम्स-2 और मिर्जापुर-2 है, जो दर्शकों के बीच कोई खास कमाल नहीं दिखा पाई.

लेकिन 2020 में जब पंचायत का पहला सीजन आया तो इसे लोगों ने खूब पसंद किया क्योंकि इसके निर्माता-निर्देशक ने इसकी कहानी का जो ग्रामीण थीम चुना वो दर्शकों के बीच एक रोमांच और नोस्टेलजिया पैदा करने वाला था. यही कारण था कि इसके दूसरे सीजन को लेकर लोगों के बीच काफी लंबे समय से चर्चा चल रही थी और जब ये आई तो इसने सेक्रेड गेम्स-2 और मिर्जापुर-2 की तरह दर्शकों को निराश नहीं किया बल्कि कॉमेडी और ड्रामा के सम्मिश्रण का एक अलग ही रूप देखने को मिला.

पंचायत के दूसरे सीजन को आए जब 4-5 दिन हो चुके हैं और इस बीच अलग-अलग तरह के रिव्यू भी आ गए हैं तो ठहर कर इस सीरीज के उन दो पहलुओं पर बात करना जरूर हो जाता है जिस पर अभी तक कोई चर्चा नहीं हुई. पहला बदलाव और दूसरा भाषाई शैली.

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फुलेरा बदल गया है….

पंचायत के पहले सीजन से लेकर दूसरे सीजन तक के सफर में एक चीज़ जो ध्यान देने की है वो ये है कि अब उत्तर प्रदेश के बलिया का फुलेरा गांव बिल्कुल बदल चुका है. भले ही उसके ज्यादातर किरदार पहले के हों लेकिन परिदृश्य वैसा नहीं है.

पहले सीजन में जिस ग्रामीण परिदृश्य ने सबको आकर्षित किया, खेतों ने सबको लुभाया, वहां की सामाजिक रूढ़ियों की तरफ टकटकी लगाकर देखने को मजबूर किया, तो दूसरे सीजन में कहानी काफी आगे निकल चुकी है. और ये कहानी है तेजी से बदलाव की.

पंचायत का फुलेरा अब सीसीटीवी से लैस हो चुका है जहां बकरियां तक ढूंढने के लिए कैमरे का इस्तेमाल हो रहा है. ये भारत के गांवों में तेजी से हो रहे बदलावों की तरफ ध्यान दिलाता है. इन बदलावों में कच्चा मकान की जगह पक्का मकान, खुले में शौच से मुक्ति को लेकर चला अभियान प्रमुख है.

शहर में रहने वाले लोगों को अभी भी गांव रोमांच से भर देता है. उनके जेहन में टूटी फूटी और थाल (कीचड़) से सनी सड़कें, फूस के घर ही गांव की तस्वीर बनाते हैं. लेकिन सच्चाई अब इससे कहीं जुदा है.

भारत के गांव अब बिल्कुल बदल चुके हैं. भले ही बुनियादी चीज़ों से गांव अभी भी वंचित हों लेकिन आज के गांव क्रंकीट के जंगलों में बदलते जा रहे हैं. और यही पंचायत के दूसरे सीजन में व्यापक तौर पर देखने को भी मिलता है. और यही वो पहलू भी है जिस पर दर्शकों का ज्यादा ध्यान नहीं गया.


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‘हुमच के, छेक के, रंगबाजी, बनराकस….’

अपराध केंद्रित वेब सीरीज से आजिज हो चुके दर्शकों का पंचायत जैसी सीरीज की तरफ आकर्षित होने के पीछे एक और बड़ा कारण है उसकी भाषाई शैली का जादू. इसी जादू का कमाल है कि लोग पंचायत को इस कदर देख रहे हैं और उसमें इस्तेमाल किए गए देशज शब्दों को अपनी भाषा के साथ जोड़कर प्रयोग कर रहे हैं.

भारत में शायद ही कोई वेब सीरीज हो जिसके दूसरे सीजन को भी उतनी ही उत्सुकता से दर्शक देख रहे हैं जितनी पहले सीजन में थी. इस मायने में पंचायत ने दर्शकों को विकल्प तो दिया ही है बल्कि नई थीम की तरफ भी आकर्षित किया है.

भारतीय फिल्में तो शहरी परिदृश्य से निकलकर ग्रामीण क्षेत्रों में जाने लगी हैं लेकिन अब वेब-सीरीज में भी ये देखने को मिलने लगा है. ऐसा कदम दर्शकों के बड़े वर्ग को छूता है क्योंकि अभी भी ग्रामीण अंचल एक बड़ी आबादी समेटे हुए है और वहां का चित्रण अगर किया जाएगा तो उसे देखने वालों की भी संख्या में इजाफा होगा.

पंचायत का पहला सीजन भी ग्रामीण क्षेत्रों में बोली जाने वाली भाषा के विभिन्न शब्दों को परोसने में कामयाब हुआ था वहीं दूसरे सीजन में कुछ नए शब्दों ने तो इतनी धूम मचा दी है कि लोग अब अपने दोस्तों और साथियों को उन्हीं नामों से पुकारने लगे हैं. ऐसा ही एक शब्द है ‘बनराकस ‘ जिसे पंचायत के नए सीजन में खूब इस्तेमाल किया गया है.

वहीं हुमच के, छेक के, रंगबाजी, मुंह चियार दोगे जैसे शब्दों ने भी लोगों को भाषाई समृद्धता और क्षेत्रीय विविधता की तरफ ध्यान दिलाया है जो कि भारत की सबसे खूबसूरत चीज़ है.

तो ऐसे में निर्माता-निर्देशकों के सामने घिसे-पिटे थीम से निकलकर नए प्रयोग करने की अपार संभावना है जिसकी उम्मीद दर्शकों ने लगाई हुई है. पंचायत इस प्रयोग में बेहद सफल हुआ है जो कि इस बात से पता चलती है कि बीते कुछ दिनों से दिल्ली मेट्रो में बड़ी संख्या में इसे देखते हुए लोग दिख जा रहे हैं. तो अगर आपने इसे अभी तक नहीं देखा है तो मेट्रो में किसी की फोन स्क्रीन में झांकने से अच्छा है कि तबियत से बैठकर इसे जल्द देख लिया जाए.


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