विनायक भट्ट दिप्रिंट
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भारत और पाकिस्तान के बीच करतारपुर गलियारा बनाए जाने की घोषणा पर जश्न मनाने का सिलसिला थमा नहीं है मगर ऐसा लगता है कि पाकिस्तान इस पवित्र सिख धर्मस्थल के इलाके में अपनी फौजी ताकत बढ़ाने की दीर्घकालिक योजना को लागू करने में जुट गया है.

बहुचर्चित गलियारे की आधारशिला मुंबई में 26 नवंबर को हुए कुख्यात आतंकवादी हमले की 10वीं बरसी के दो दिन बाद 28 नवंबर को रखी गई. और 26 से 30 नवंबर के बीच पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष जनरल कमर जावेद बाजवा यहां से चंद किलोमीटर दूर सियालकोट में पाकिस्तानी फ़ौज़ के 30वीं कोर को युद्धाभ्यास कराते और मुल्तान में 11वीं स्ट्राइक कोर के साथ हथियारबंद हमले की रूपरेखा तय करते देखे गए.

विनायक भट्ट \ दिप्रिंट

सियालकोट में युद्धाभ्यास खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि शकरगढ़ बल्ज क्षेत्र के लिए यह इलाका रणनीतिक महत्व का है. शकरगढ़ बल्ज क्षेत्र पंजाब में पठानकोट और जम्मू-कश्मीर में कठुआ के पास भारतीय भूभाग में घुसा हुआ है और जम्मू-कश्मीर को पूरे भारत से जोड़ने वाले हाइवे से लगभग सटा हुआ है. करतारपुर भी इसी शकरगढ़ बल्ज में स्थित है.

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बाजवा ने सियालकोट में दावा किया कि ‘हम जंग के लिए तो तैयार हैं ही, हमने ऊपर से सब-कान्वेंशनल फौजी कार्रवाइयों का भी तजुर्बा हासिल कर लिया है.’

लेकिन पाकिस्तानी फौजी तंत्र इस क्षेत्र में केवल इतने पर ही नहीं रुक गया है. उपग्रह से हासिल तस्वीरों के ‘दप्रिंट’ द्वारा विश्लेषण से ये संकेत मिलते हैं कि इस क्षेत्र में तीन तरह की गतिविधियां चलाई जा रही हैं. एक तो ऐसे पेड़ लगाए जा रहे हैं जिनके कारण बख्तरबंद वाहनों की आवाजाही बाधित हो; दूसरे, बद्दोमलही और नरोवाल के पास खाली जगहों को नहरों आदि के पानी में डुबोया जा रहा है; और भारत तथा पंजाब के लोगों के लिए सबसे अहम सरोकार की बात ये है कि सीमा के साथ बहने वाली रावी नदी के बहाव को मोड़ने की कोशिशें की जा रही हैं.

शकरगढ़ बल्ज का महत्व

भारत शकरगढ़ बल्ज में पाकिस्तान के साथ कई बेहद ज़ोरदार लड़ाइयां लड़कर अहम जीत दर्ज़ कर चुका है. पाकिस्तानी फौज का मानना है कि भारत खासकर अपनी ‘कोल्ड स्टार्ट’ रणनीति के तहत इस क्षेत्र में ही मुख्य ज़ोर डाल सकता है. भारत के संसद भवन पर 2001 में आतंकवादी हमले के बाद दोनों देशों की सेनाएं जिस तरह सीमा पर एक-दूसरे के सामने लंबे समय तक खड़ी रही थीं, उस भारतीय ‘ओपरेशन पराक्रम’ के बाद से पाकिस्तानी सेना ने इस क्षेत्र में अपनी ताकत में भारी इजाफा किया है. फौरी तैनाती के लिए उसने सियालकोट छावनी में अपने दो डिवीज़न टिका रखे हैं. सियालकोट में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बनाकर उसने इस क्षेत्र में सेना को पहुंचाने की क्षमता में भारी इजाफा कर लिया है. चेनाब नदी पर नया पुल बन जाने के बाद अब गुजरात से मात्र 45 मिनट में सियालकोट पहुंचा जा सकता है. ये सारी चीज़ें यही संकेत देती हैं कि आगे के युद्ध में पाकिस्तानी सेना शकरगढ़ बल्ज को कितना महत्व देगी.

रणनीतिक वृक्षारोपण

शकरगढ़ बल्ज क्षेत्र में पाकिस्तानी सेना को जहां-जहां लगा कि यहां से भारतीय सेना आगे बढ़ सकती है, उन जगहों को खाली करवा के उसने ऐसे पेड़ लगवा दिए जो जल्दी से बड़े होते हैं. ऐसे पेड़ मुख्यतः नदियों और नालों के किनारे लगाए गए हैं जिनसे उन्हें पार करना मुश्किल हो जाए. शकरगढ़ बल्ज में ऐसे व्यापक वृक्षारोपण खोजे चक नमक स्थान के पास ‘चिकेंस नेक’ के नाम से मशहूर क्षेत्र के दक्षिणी हिस्से में किए गए हैं.

यहां करीब 1900 हेक्टेअर ज़मीन पर दोनों तरफ कई बांध बना दिए गए हैं और बख्तरबंद वाहनों का चलना मुश्किल कर दिया गया है.

ज़ाहिर है, ये वृक्षारोपण किसी भी सैन्य झड़प या युद्ध में भारतीय सेना की गतिविधियों को बाधित करेंगे.

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फौज के छह बख्तरबंद डिवीज़नों की तैनाती

पाकिस्तानी फौज ने 2010 में औचक रणनीतिक कार्रवाई के तहत अपने छह बख्तरबंद डिवीज़नों को खारियां से हटाकर गुजरांवाला में तैनात कर दिया. इस तरह उसने सेना को शकरगढ़ बल्ज में तैनात करने में लगने वाले समय में कटौती कर दी. यही नहीं, भारतीय सेना द्वारा हवाई हमले की स्थिति में चेनाब नदी को बिना समय गंवाए पार करने की भी व्यवस्था कर ली है.

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यानी वह जवाबी कार्रवाई करने के लिए अपनी सेना को तुरंत तैनात कर सकेगी ताकि इस क्षेत्र में भारत के आक्रमण को तेज़ी से नाकाम कर सके.

बद्दोमलही को डुबोने की साजिश

भारत के पंजाब की तरह पाकिस्तानी हिस्से में भी रेल लाइनें और सड़कें सतह से ऊपर करके एक-दूसरे के समानान्तर बनाई गई हैं. पाकिस्तानी सेना ने करतारपुर से 40 किलोमीटर पश्चिम बद्दोमलही में रेल और सड़क के बीच की जगह को नज़दीक की नहरों आदि के पानी से भर दिया है.

इस तरह इसने भारतीय सेना के लिए शकरगढ़ बल्ज के दक्षिणी छोर पर बद्दोमलही और नरोवाल के बीच 200 मीटर चौड़ी और 8.5 किलोमीटर लंबी बाधा खड़ी कर दी है.

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रावी बहेगी पाकिस्तान में

पिछले चार-पांच साल में उपग्रह से हासिल तस्वीरों के गहरे अध्ययन से साफ है कि पाकिस्तान रावी नदी के बहाव को बदलने में लगा है.

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भारत-पाकिस्तान की सीमा के समानांतर बहने वाली यह नदी अब 600 से लेकर 1000 मीटर तक पाकिस्तान के क्षेत्र में बहने लगी है.

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इस कदम के कारण भारत के पंजाब के खेतों को इस नदी का पानी मिलना बंद हो जाएगा यानी वह सबसे घाटे में रहेगा.

कर्नल विनायक भट (सेवानिवृत्त) भारतीय सेना के एक सैन्य खुफिया अधिकारी रहे हैं,जिन्हें उपग्रही इमेजरी विश्लेषण का विशाल अनुभव है।

इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें


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