Monday, 17 January, 2022
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अधिकतर सुसाइड हेल्पलाइन्स से कोई मदद नहीं मिलती, लोगों की ज़रूरत के समय वो काम नहीं आती

एक्टर सुशांत सिंह राजपूत की मौत ने, मेंटल हेल्थ हेल्पलाइन्स को सुर्ख़ियों में ला खड़ा किया है. पिछले दो दिनों में क़रीब एक दर्जन हेल्पलाइन्स से सम्पर्क करने की कोशिश हुई लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.

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नई दिल्ली: रविवार को एक्टर सुशांत सिंह राजपूत की, ख़ुदकुशी से मौत के बाद, बहुत से सोशल मीडिया यूज़र्स ने हेल्पलाइन्स, और दूसरे रोकथाम साधनों के नम्बर साझा करना शुरू कर दिए. लेकिन सच्चाई ये है कि साझा किए गए ज़्यादातर नम्बर सही नहीं हैं, और ये भी सही है कि ज़्यादातर नम्बर रात में, वीक-एण्ड्स पर, यहां तक कि ‘बिज़नेस आवर्स’ में भी उपलब्ध नहीं हैं.

ज़्यादातर हेल्पलाइन्स अपनी वेबसाइट्स पर लिखती हैं, कि उनकी सेवाएं कुछ घंटों को दौरान ही उपलब्ध हैं. मसलन, मुम्बई स्थित ‘समारिटंस’ कहती है, कि वो शाम 5 बजे से 8 बजे तक उपलब्ध है, जबकि नई दिल्ली स्थित ‘सुमैत्री’ कहती है, कि वो सोमवार से शुक्रवार दोहपर 2 बजे से रात 10 बजे तक, और वीक-एण्ड्स पर सुबह 10 बजे से, रात 10 बजे तक काम करती है.

लेकिन चौबीसों घंटे काम करने वाली हेल्पलाइन्स भी, अकसर फंड्स या वॉलंटियर्स की कमी की वजह से, कोई सहायता नहीं कर पातीं. दिप्रिंट ने रविवार रात 10 बजे ऐसी पांच हेल्पलाइन्स को कॉल किया, जिनमें से केवल नवी मुम्बई स्थित ‘आसरा’ ने जवाब दिया.

लेकिन दिप्रिंट को पता चला है, कि ‘बिज़नेस आवर्स’ में उपलब्ध रहने का दावा भी सही नहीं है. सोमवार को दोपहर एक बजे, सात अलग-अलग हेल्पलाइन्स को कॉल किया गया, जिनमें से केवल गुजरात स्थित वंद्रेवाला फाउण्डेशन की 24×7 ‘जीवन आस्था हेल्पलाइन’ ने जवाब दिया, और उन्होंने ने भी पिछली शाम कॉल का जवाब नहीं दिया था. मुम्बई स्थित परिवर्तन ट्रस्ट ने भी सोमवार दोपहर को, एक ऐसे नम्बर से जवाब दिया जो उनकी वेबसाइट पर तो है, लेकिन उस नम्बर से अलग है, जो सोशल मीडिया पर चल रहा है. फोर्टिस स्ट्रेस हेल्पलाइन भी सोमवार दोपहर, और उसी रात क़रीब 10 बजे उपलब्ध थी.

द हिंदू ऑनलाइन की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, नम्बर 104 कर्नाटक, तमिलनाडु, और ओडिशा जैसे राज्यों में उपलब्ध है, उन लोगों के परामश के लिए, जो मानसिक या मनोवैज्ञानिक विकारों से ग्रसित हैं.

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ज़्यादातर हेल्पलाइन्स को, एनजीओ ख़ुद की पहल पर, या राज्य सरकारों के साथ मिलकर चलाती हैं. सुसाइड रोकथाम के लिए केंद्र सरकार की, अपनी कोई समर्पित हेल्पलाइन नहीं है.

महाराष्ट्र में परिवर्तन ट्रस्ट के मनोचिकित्सक डॉ हामिद दाभोल्कर का मानना है, कि अमले और फंडिंग की कमी सबसे बड़े कारण हैं, जिनकी वजह से हेल्पलाइन्स हर समय उपलब्ध नहीं हैं.

दाभोल्कर ने कहा, ‘लगभग सभी एनजीओज़ ‘न होने से कुछ होना बेहतर है’ के आधार पर काम कर रही हैं.’ उन्होंने आगे कहा, ‘कॉल्स पर बैठने वाले ज़्यादातर लोग वॉलंटियर्स होते हैं, जिनके पास सुसाइड करने जा रहे व्यक्ति से डील करने के लिए, कोई महारत नहीं होती; उन्हें सिर्फ 2-3 घंटे की ट्रेनिंग मिलती है, जो काफी नहीं है.’

जो हेल्पलाईन्स चौबीसों घंटे उपलब्ध हैं, उनमें भी स्टाफ की कमी रहती है. गुजरात की जीवन आस्था के एक सीनियर काउंसेलर ने, नाम न छापने की शर्त पर बताया, कि पूरे दिन में उनके पास सिर्फ तीन काउंसेलर उपलब्ध रहते हैं.

काउंसेलर ने कहा,’ये एक पेशेवर सीमा है. कभी कभी कॉल्स इसलिए मिस हो जाती हैं, कि हम किसी और से बात कर रहे होते हैं. ऐसी हालत में हम क्या कर सकते हैं?’


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हेल्पलाइन्स क्यों अहम हैं

दिल्ली स्थित मनोविज्ञानी नीलम मिश्रा के अनुसार, ये हेल्पलाइन्स अकसर उन लोगों के लिए आख़िरी रास्ता होती हैं, जो अपनी ज़िंदगी ख़त्म करने से पहले, उन तक पहुंचने की कोशिश करते हैं, और इन जगहों से बात न हो पाने पर, इंसान ख़ुद को और ज़्यादा अकेला महसूस कर सकता है.

मिश्रा ने आगे कहा कि जिन लोगों की कॉल्स का जवाब नहीं मिलता, वो और अधिक अनचाहा महसूस करते हैं.’हमें समझना होगा कि जब कोई कॉल करता है, तो उसकी परेशानी चरम पर होती है, और वो उससे बचने के लिए हताश होते हैं.’

मसलन, जब कटक की 21 वर्षीय अनन्या अनिंदिता, ख़ुद की जान लेने की कगार थी, तो उसने कई हेल्पलाइन्स को मदद के लिए कॉल किया. लेकिन मदद नहीं मिल पाई.

अनिंदिता ने दिप्रिंट को बताया, ‘मैंने आसरा, फोर्टिस और वंद्रेवाला को कॉल किया, लेकिन किसी ने जवाब नहीं दिया.’ उन्होंने आगे कहा, ‘आख़िर में जब वंद्रेवाला में किसी ने फोन उठाया, तो उसने ये कहकर फोन काट दिया, कि उसकी शिफ्ट ख़त्म हो गई है.’

मानसिक स्वास्थ्य पर कोविड का असर

अब, जब लगभग हर आदमी कोविड से प्रभावित हो रहा है, एक्सपर्ट्स ने चेतावनी दी है कि इससे होने वाली बेचैनी, अकेलापन, और तनाव के नतीजे में, मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं बढ़ सकती हैं.

लॉकडाउन के दौरान सुसाइड रोकथाम हेल्पलाइन्स पर आ रही कॉल्स की संख्या में भी, अच्छी ख़ासी बढ़ोतरी देखी गई है.

मोहाली में फोर्टिस की परामर्श दाता मनोवैज्ञानिक अंचल शर्मा ने, जो सुसाइड रोकथाम हेल्पलाइन पर भी वॉलंटियर करती हैं, कहा, ‘लोग अपने चाहने वालों से अलग हैं, अपने घरों में फंसे हैं और उनकी दैनिक दिनचर्या बाधित है…ऐसे समय में अकेलापन बहुत से लोगों का तनाव बढ़ा रहा है.’

शर्मा ने बताया,’मुझे हर घंटे लोगों की 6-7 कॉल्स मिलती हैं, जो आपसी रिश्तों, भावनात्मक समस्याओं, और यौन संबंधी परेशानियों से जूझ रहे होते हैं. लॉकडाउन के दौरान ये सब समस्याएं बढ़ गई हैं.’

घर में फंसे रहने से महिलाएं और बच्चे, घरेलू हिंसा का ज़्यादा आसान शिकार बन गए हैं, जबकि अल्कोहल जैसी चीज़ों के मजबूरन परहेज़ से पैदा हुए विदड्रावल लक्षण के चलते भी, कुछ लोगों ने अपनी जान ले ली है.


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टूटे हुए सिस्टम को कैसे जोड़ें?

डॉ दाभोल्कर के मुताबिक़, सुसाइड की रोकथाम में हेल्पलाइन सिर्फ एक पहला क़दम हैं, और इसे एकीकृत मानसिक स्वास्थ्य सेवा डिलीवरी से जोड़ा जाना चाहिए.

दाभोल्कर ने कहा कि इसके लिए, एक व्यापक राष्ट्रीय सुसाइड रोकथाम रणनीति की ज़रूरत है, जिसके लिए पर्याप्त वित्तीय प्रावधान होना चाहिए.

उन्होंने कहा,’फ्रंटलाइन पर डटे कार्यकर्ताओं को पर्याप्त वेतन, ट्रेनिंग और सही निगरानी की ज़रूरत है. एक ज़रूरत ये भी है कि सुसाइड के साधनों तक पहुंच को रोकने के लिए, नीतियां बनाई जाएं.’

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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