मुंबई, 29 नवंबर (भाषा) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने शनिवार को कहा कि विवादों में उलझना भारत के स्वभाव में नहीं है और देश की परंपरा ने भाईचारे एवं सामूहिक सद्भाव पर हमेशा जोर दिया है।
भागवत ने नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि राष्ट्र की अवधारणा के मामले में भारत का दृष्टिकोण पश्चिमी व्याख्याओं से मूलतः भिन्न है।
उन्होंने कहा, ‘‘हमारा किसी से कोई विवाद नहीं है। हम विवादों से दूर रहते हैं। विवाद करना हमारे देश के स्वभाव में नहीं है। एकजुट रहना और भाईचारे को बढ़ावा देना हमारी परंपरा है।’’
उन्होंने कहा कि दुनिया के अन्य हिस्से संघर्षपूर्ण परिस्थितियों में विकसित हुए हैं।
भागवत ने कहा, ‘‘एक बार कोई मत बन जाने के बाद उससे अलग कोई भी विचार अस्वीकार्य हो जाता है। वे अन्य विचारों के लिए दरवाजे बंद कर देते हैं और उसे ‘वाद’ कहकर पुकारने लगते हैं।’’
उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्र की अवधारणा को लेकर भारत का दृष्टिकोण पश्चिमी व्याख्याओं से मूल रूप से भिन्न है।
उन्होंने कहा, ‘‘वे राष्ट्र की हमारी अवधारणा को समझ नहीं पाते, इसलिए उन्होंने इसे ‘राष्ट्रवाद’ कहना शुरू कर दिया। ‘राष्ट्र’ की हमारी अवधारणा पश्चिमी अवधारणा से अलग है….।’’
उन्होंने कहा, ‘‘हम राष्ट्रीयता शब्द का इस्तेमाल करते हैं, राष्ट्रवाद का नहीं। राष्ट्र के प्रति अत्यधिक गर्व के कारण दो विश्व युद्ध हुए, यही कारण है कि कुछ लोग राष्ट्रवाद शब्द से डरते हैं।’’
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि भारत की राष्ट्रीयता अहंकार या अभिमान से नहीं बल्कि लोगों के बीच गहरे अंतर्संबंध और प्रकृति के साथ उनके सह-अस्तित्व से उपजी है।
उन्होंने उस ज्ञान के महत्व पर भी जोर दिया जो विवेक की ओर ले जाता है। उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि व्यावहारिक समझ और सार्थक जीवन जीना केवल जानकारी रखने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि सच्ची संतुष्टि दूसरों की मदद करने से मिलती है – यह ऐसी अनुभूति है, जो क्षणिक सफलता के विपरीत जीवनभर बनी रहती है।
भाषा सिम्मी रंजन
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