Sunday, 26 June, 2022
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बहुपक्षीय IPEF में भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार विवाद? USTR की बैठक से दिल्ली में खलबली

यूएसटीआर कैथरीन ताई की तरफ से 11 जून को बुलाई गई एक बैठक में 'व्यापार को आधार बनाकर वार्ता शुरू करने' पर चर्चा हुई, जिससे भारतीय अधिकारियों को यह आशंका सताने लगी है कि आईपीईएफ कहीं एक व्यापार समझौता न बन जाए.

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नई दिल्ली: 11 जून को पेरिस में इंडो-पैसिफिक इकोनॉमिक फ्रेमवर्क (IPEF) की एक अनौपचारिक बैठक को लेकर भारत ने चिंता जताई है. उसे डर है कि वाशिंगटन इसके जरिए लंबे समय से द्विपक्षीय व्यापार परेशानियों जैसे टैरिफ और इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स को हल करने की मांग कर सकता है. बैठक अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) कैथरीन ताई की तरफ से बुलाई गई थी.

दिप्रिंट को पता चला है कि भारत अब इस बात पर विचार कर रहा है कि क्या उसे आईपीईएफ का हिस्सा होना चाहिए या नहीं.

आईपीईएफ को 23 मई को जापान में भारत सहित 13 इंडो-पैसिफिक देशों के साथ लॉन्च किया गया था, ताकि व्यापार, आर्थिक और निवेश के अवसरों को बढ़ाया जा सके. इसके चार व्यापार आधार स्तंभों में ट्रेड एंड सप्लाई चेन, स्वच्छ ऊर्जा, डिकार्बोनाइजेशन एंड इंफ्रास्ट्रक्चर और टैक्स एंड एंटी करप्शन शामिल है. वाशिंगटन ने आईपीईएफ को एक ‘आर्थिक व्यवस्था’ कहा है.

लेकिन 11 जून की बैठक के बाद से नई दिल्ली चिंतित है. एक शीर्ष अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर दिप्रिंट को बताया कि भारत और अमेरिका के बीच बाजार पहुंच और आईपीआर से जुड़े कुछ मसले अनसुलझे हैं. ऐसे में यह मसले इस फ्रेमवर्क आधार स्तंभ के तहत आ सकते हैं, जिन्हें ताई प्रमुखता से देख रहे हैं.

अधिकारी ने कहा कि बैठक में ‘व्यापार को आधार बनाकर वार्ता शुरू करने’ पर चर्चा हुई, जिससे भारतीय अधिकारियों में डर पैदा हो गया कि आईपीईएफ अंत में एक प्रकार का व्यापार समझौता साबित होगा.

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वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल पेरिस बैठक में शामिल नहीं हुए क्योंकि उन्हें विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में भाग लेने के लिए जिनेवा जाना था. हालांकि, वाणिज्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बैठक में भाग लिया था.

यूएसटीआर के कार्यालय द्वारा एक रीडआउट के अनुसार, ताई ने बैठक में कहा कि अमेरिका ‘व्यापार को आधार बनाकर वार्ता शुरू करने के लिए तत्पर है, जो आर्थिक गतिविधियों और निवेश को बढ़ावा देने में मदद करेगा. इसके साथ ही टिकाऊ और समावेशी आर्थिक विकास को बढ़ावा देगा और पूरे क्षेत्र में श्रमिकों और उपभोक्ताओं को लाभान्वित करेगा.

भारत आशंकित है कि तथाकथित ‘सौदेबाजी’ शुरू करके, अमेरिका 13 अन्य सदस्य देशों के बीच अधिक व्यापार उदारीकरण पर जोर देने की कोशिश कर रहा है – विशेष रूप से क्वाड ग्रुप के भीतर, जिसमें भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान शामिल हैं.

अधिकारी ने कहा कि इसी वजह से भारत शुरू में आईपीईएफ से जुड़ने का इच्छुक नहीं था. क्योंकि उसे डर था कि अमेरिका वस्तुओं और सेवाओं पर शुल्क को खत्म करने और आईपीआर और पेटेंट व्यवस्था में कुछ संशोधनों और डेटा संरक्षण के लिए काम करेगा. इन मसलों को भारत-अमेरिका व्यापार नीति फोरम के तहत वाशिंगटन लगातार नई दिल्ली के साथ उठाता रहा है. दोनों देशों के अधिकारी आखिरी बार नवंबर 2021 में मिले थे.

दिप्रिंट ने यूएसटीआर कार्यालय को ईमेल करके टिप्पणी मांगी लेकिन इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने तक कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली.

आईपीइएफ में चार क्वाड देशों के अलावा फिलीपींस, ब्रुनेई दारुस्सलाम, फिजी, इंडोनेशिया, दक्षिण कोरिया, मलेशिया, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम शामिल हैं.

आईपीईएफ को लांच किए जाने वाले दिन ताई ने कहा था कि इस फ्रेमवर्क के अंतर्गत अमेरिका ‘डिजिटल अर्थव्यवस्था और उभरती हुई प्रौद्योगिकी, श्रम प्रतिबद्धताओं, पर्यावरण, व्यापार सुविधा, पारदर्शिता और अच्छी नियामक प्रथाएं, और कॉर्पोरेट जवाबदेही’ पर ध्यान केंद्रित करेगा.

अमेरिका स्थित थिंक टैंक द विल्सन सेंटर में दक्षिण एशिया के उप निदेशक और वरिष्ठ सहयोगी माइकल कुगेलमैन के अनुसार, आईपीईएफ में शामिल होना भारत के लिए एक जोखिम है. वह आगे कहते हैं, ‘अगर यह उस बिंदु पर आगे बढ़ता है जहां बातचीत होती है, तो भारत को मुश्किल विकल्पों का सामना करना पड़ सकता है.’


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आरसीईपी के जरिए चीन का मुकाबला

भारत इस बात से भी चिंतित है कि क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP) के जरिए चीन का मुकाबला करने के लिए, अमेरिका उच्च मानक व्यापार उपाय लाने की कोशिश कर सकता है. अधिकारी ने बताया कि नई दिल्ली इसे मानने की स्थिति में नहीं होगी क्योंकि यह बहुपक्षीय व्यापार समझौते का हिस्सा नहीं है.

रीडआउट के अनुसार, पेरिस में अनौपचारिक बैठक के दौरान ताई ने यह भी कहा कि ‘संयुक्त राज्य अमेरिका और आईपीईएफ साझेदार जो व्यापार आधार स्तंभ में शामिल होने का विकल्प चुनते हैं, वे उच्च-मानक, समावेशी, मुक्त और निष्पक्ष-व्यापार प्रतिबद्धताओं का निर्माण और व्यापार एवं प्रौद्योगिकी नीति में नए और रचनात्मक दृष्टिकोण का विकास करना चाहते हैं. जो उसके श्रम, वातावरण, डिजिटल अर्थव्यवस्था, कृषि, पारदर्शिता और अच्छी नियामक प्रथाएं, प्रतिस्पर्धा नीति और व्यापार सुविधा से संबंधित उद्देश्यों की पूर्ति करेंगे.’

भारत अब इस बात पर विचार कर रहा है कि क्या उसे व्यापार स्तंभ का हिस्सा बनना चाहिए और अगर ऐसा है तो यह विकल्प सभी आईपीईएफ सदस्यों को दिया जाएगा. अधिकारी ने कहा कि आने वाले हफ्तों में इस पहलू पर यूएसटीआर कार्यालय में और चर्चा की जाएगी.

भारत 2019 में आरसीईपी से इस डर से बाहर चला गया था कि चीनी सामान की भारतीय बाजारों में बाढ़ आ जाएगी. अधिकारी ने कहा, हालांकि भारत ने आईपीईएफ का हिस्सा बनना पसंद किया क्योंकि वह पहले से ही हिंद-प्रशांत के राजनीतिक पहलुओं में एक प्रमुख खिलाड़ी है और क्वाड के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

आरसीईपी पर 15 एशिया-प्रशांत देशों – चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया और 10 आसियान (दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संघ) के सदस्य देशों ने हस्ताक्षर किए थे. इसका 20 वर्षों की अवधि में सदस्य देशों के बीच व्यापार किए जाने वाले लगभग 90 प्रतिशत सामानों पर शुल्क हटाने का लक्ष्य है.

विल्सन सेंटर के कुगेलमैन ने कहा, ‘भारत के लिए आईपीइएफ में शामिल होना एक जोखिम है. वह पीछे नहीं हटना चाहेगा, जैसा कि उसने आरसीईपी के साथ किया था. लेकिन आईपीईएफ के ई-कॉमर्स से लेकर पर्यावरण नियमों तक कई मुद्दों पर अमेरिका और अन्य सदस्यों के साथ इसके गंभीर मतभेद हैं’

उन्होंने कहा, ‘भारत ने आईपीइएफ में शामिल होकर एक जुआ खेला है. भारत को प्रमुख इंडो-पैसिफिक पहलों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता और क्षेत्रीय आर्थिक समूहों में शामिल होने की इच्छा दिखाने से तत्काल फायदा तो मिलता है, लेकिन यह प्रमुख नीतिगत मुद्दों पर अपने आपको गलत तरफ खड़ा पा सकता है. और यह वाशिंगटन के साथ लंबे समय से चल रहे व्यापार तनाव को बढ़ा सकता है.’

सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग, स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज, जेएनयू के ट्रेड इकोनॉमिस्ट और प्रोफेसर बिस्वजीत धर ने कहा, ‘आईपीईएफ भारत के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण होने जा रहा है. अमेरिकी आईपीईएफ के तहत मानकों को लक्षित कर रहे हैं क्योंकि अधिकांश देशों के लिए टैरिफ चलन से बाहर हैं. भारत एकमात्र ऐसा देश है जहां टैरिफ वास्तव में मायने रखते हैं.’


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अमेरिका का ट्रांस-पैसिफिक पार्टनरशिप से बाहर होना और IPEF

एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के ट्रांस-पैसिफिक पार्टनरशिप (टीपीपी) से बाहर निकलने के बाद, आईपीईएफ ने व्यापार में वृद्धि के जरिए बाइडन को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिका की नेतृत्व की भूमिका को फिर से हासिल करने का मौका दिया है.

यही कारण है कि जब उसने पिछले महीने आईपीईएफ का अनावरण किया था तो बाइडन प्रशासन ने घोषणा की थी, कि व्यापार स्तंभ का नेतृत्व यूएसटीआर करेगा, अन्य तीन स्तंभों को अमेरिकी वाणिज्य विभाग द्वारा संचालित किया जाएगा.

फरवरी 2022 में जारी यूएस कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस की एक रिपोर्ट के अनुसार, जब से राष्ट्रपति ट्रम्प ने 2017 में टीपीपी से अमेरिका का हाथ खींचा है, तब से कई पर्यवेक्षकों ने संयुक्त राज्य अमेरिका के पास इंडो-पैसिफिक में चीन के बढ़ते आर्थिक प्रभाव का मुकाबला करने के लिए पर्याप्त आर्थिक और व्यापार रणनीति का अभाव की बात कही है.

धर ने कहा, जब अमेरिका एक बार अधिक टैरिफ कटौती और अन्य छूट की मांग करना शुरू कर देगा, तो भारतीय उद्योग और निर्यातक समुदाय से धक्का-मुक्की होगी, जिन्होंने इस तरह के कदमों का हमेशा से विरोध किया है.

धर ने कहा, ‘अमेरिका का विनिर्माण क्षेत्र अस्तित्वहीन है. वे कृषि और सेवाओं के निर्यात पर जीवित रहते हैं. ये दो क्षेत्र हैं जिन्हें आगे की ओर धकेला जाएगा. यह वास्तव में एक लंबा काम होने जा रहा है’ ‘अमेरिकी कोई कसर नहीं छोड़ने वाले हैं और एक वैश्विक भू राजनीति में अप्रत्याशित गतिरोध के साथ, भारत के पास IPEF की व्यापार वार्ता में शामिल होने के अलावा कोई विकल्प नहीं है’

कुगेलमैन ने कहा, ‘आईपीईएफ उस आलोचना का जवाब देने के लिए बिडेन प्रशासन के प्रयास का प्रतिनिधित्व करता है, जिसके मुताबिक अमेरिका ने इंडो-पैसिफिक में अपने आर्थिक लक्ष्यों के लिए एक व्यापक रणनीतिक योजना की पेशकश नहीं की है’

उन्होंने कहा, ‘आईपीईएफ ऐसी आलोचनाओं को दबाने के लिए प्रशासन की पहली कोशिश है.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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