Friday, 27 May, 2022
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मैरिज बिल पेश किए जाने के बाद से तेलंगाना में 21 साल से कम उम्र की लड़कियों का निकाह दो गुना बढ़ा

21 दिसंबर को संसद में बाल विवाह निषेध (संशोधन) विधेयक पेश किए जाने के बाद से मुस्लिम समुदाय में खलबली मच गई है. इसे लेकर तमाम आशंकाएं दूर करने के लिए काउंसिलिंग और जुमे की नमाज के दौरान ऐलान करने का सहारा लिया जा रहा है.

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हैदराबाद: 18 साल की हो चुकी नजमा का निकाह इस वर्ष कुछ महीनों बाद होना था, परिवार के लोग उसकी ग्रेजुएशन पूरी होने का इंतजार कर रहे थे और चाहते थे कि महामारी की स्थिति थोड़ी सुधरे हो तो इस मौके पर भव्य आयोजन किया जाए. लेकिन दिसंबर के आखिरी हफ्ते में ही सब कुछ बदल गया, जब रातों-रात नजमा का निकाह तय हो गया और अगले दिन यानी 26 दिसंबर को इसकी रस्में भी पूरी कर दी गईं.

नजमा की 16 वर्षीय चचेरी बहन अलीफा ने दिप्रिंट को बताया, ‘नजमा को शादी के लिए खरीददारी करने और अपनी ड्रेस चुनने के लिए एक घंटे का समय दिया गया था. उसका ‘रिश्ता’ कुछ महीने पहले तय हो चुका था और उसकी सगाई भी हो गई थी. हालांकि, शादी इस साल कुछ महीनों बाद होनी थी.’

नजमा की तरह ‘हड़बड़ी’ में किए जा रहे निकाह बाल विवाह निषेध (संशोधन) विधेयक का नतीजा हैं, जिसे 21 दिसंबर 2021 को संसद में पेश किया गया था. यह विधेयक लड़कियों की विवाह योग्य आयु बढ़ाकर 21 वर्ष करने के लिए लाया गया है, ताकि लड़के और लड़कियों की विवाह योग्य आयु एक समान की जा सके.

जैसे ही यह पता चला कि यह बिल किस बारे में है, मुस्लिम समुदाय में दहशत फैल गई और जल्दबाजी में किए जाने वाले निकाहों में अचानक तेजी आ गई है—जो सामान्य समय की तुलना में कम से कम दोगुने हो गए.

पुराने हैदराबाद शहर में स्थित तालाब कट्टा संकरी गलियों वाला इलाका है. इसी बस्ती के एक घर में 45 वर्षीय ऑटो चालक हसन का परिवार रहता है. उनकी 19 वर्षीय बेटी 12वीं कक्षा की छात्रा है जो तेलंगाना शिक्षा बोर्ड के मुताबिक इंटरमीडिएट अंतिम वर्ष यानी कॉलेज में प्रवेश से पहले का आखिरी कदम है.

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कई माता-पिता की तरह हसन ने भी सोचा था कि अगले साल इंटरमीडिएट की अंतिम परीक्षा के बाद अपनी बेटी की शादी करेंगे. लेकिन क्षेत्र की कई अन्य लड़कियों की तरह उनकी 19 वर्षीय बेटी (जिसका नाम जाहिर नहीं करना चाहते) का 3 जनवरी को जल्दी-जल्दी में निकाह कर दिया गया.

हसन ने दिप्रिंट से कहा, ‘हम लड़के के परिवार को जानते हैं, वे हमारे रिश्तेदार हैं. मैंने सोचा कि यही सही वक्त है, मैं उसके 21 साल की होने का इंतजार नहीं कर सकता. मेरी तीन और बेटियां हैं और परिवार में कमाने वाला अकेला सदस्य ही हूं. मैं कब तक उनका साथ दे सकता हूं? कहना बहुत आसान होता है, हमें 21 साल तक इंतजार करने को कह रहे हैं, लेकिन आप मुझे कोई समाधान तो बताइए. जब तक उसकी शादी नहीं हो जाती, मैं अगली लड़की की शादी के बारे में नहीं सोच सकता.’

नजमा की तरह यह निकाह समारोह भी एकदम साधारण था, समारोह में दूल्हा और दुल्हन, उनके माता-पिता और एक काजी ही मौजूद थे.


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निकाह प्रमाणपत्र के लिए आवेदन बढ़े

तेलंगाना राज्य वक्फ बोर्ड, जो अपने कजाथ (रिकॉर्ड) सेक्शन के तहत मुस्लिम समुदाय के लोगों को निकाह प्रमाणपत्र जारी करता है, को पिछले दो हफ्तों में ऐसे प्रमाणपत्रों के लिए ‘हजारों’ की संख्या में आवेदन मिले हैं.

तेलंगाना राष्ट्र समिति के एमएलसी और तेलंगाना वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष ने मोहम्मद सलीम ने दिप्रिंट को बताया, ‘हमें आम तौर पर निकाह के प्रमाणपत्र के लिए हर दिन लगभग 100-150 आवेदन मिलते हैं. लेकिन इस विवाह कानून पर चर्चा के बाद पिछले दो हफ्तों में, यह आंकड़ा एक दिन में बढ़कर 300 तक पहुंच गया है. दो सप्ताह में यह आंकड़ा हजारों में पहुंच गया, हालांकि अब स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ है.

स्थिति के आकलन और लोगों में डर की भावना खत्म करने के उद्देश्य से वक्फ बोर्ड ने मंगलवार को राज्य भर के काजियों के साथ बैठक की. सलीम ने काजियों से कहा कि वे निकाह के लिए हड़बड़ा रहे परिवारों को समझाएं और उन्हें बताएं कि अभी विधेयक को पारित और लागू किया जाना बाकी है.

सलीम ने कहा, ‘यह अभी एक बिल ही है और इसे सदन में पारित किया जाना बाकी है. मैंने काजियों को यही बात बताई थी और उनसे परिवारों को सलाह देने को कहा था. हम यह भी सुनिश्चित कर रहे हैं कि शुक्रवार की नमाज के दौरान इमाम इस बारे में ऐलान करें और लोगों से कहे कि घबराने की कोई जरूरत नहीं है. हर मुसलमान जुमे की नमाज में शामिल होता है, इसलिए उम्मीद है कि इससे यह संदेश बेहतर ढंग से सभी तक पहुंच पाएंगा.’

उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह ‘हड़बड़ाहट’ में किए जा रहे निकाह सिर्फ हैदराबाद तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे राज्य में यही हो रहा है. वक्फ बोर्ड विधेयक के परिणामों की ओर इशारा करते हुए इस मुद्दे पर तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव का ध्यान आकृष्ट करने की भी तैयारी कर रहा है.

हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने भी यह विधेयक पेश किए जाने का विरोध करते हुए कहा था कि ‘संशोधन प्रतिकूल नतीजों’ वाला है.

ओवैसी ने 21 दिसंबर को कहा था, ‘यह अनुच्छेद 19 के तहत स्वतंत्रता के अधिकार का हनन है. एक 18 वर्षीय वयस्क को प्रधानमंत्री चुनने का अधिकार है, लिव-इन संबंध में रहने और पॉस्को के तहत यौन संबंध बनाने का भी हक है, लेकिन आप शादी के अधिकार से इनकार कर रहे हैं. आपने 18 साल के बच्चे के लिए क्या किया है? भारत में श्रम शक्ति में महिलाओं की भागीदारी सोमालिया से कम है. आपके बेटी बचाओ, बेटी पढाओ (कार्यक्रम) का 89 प्रतिशत फंड मोदी के प्रचार पर खर्च किया गया है.’

‘फोन बजना बंद ही नहीं हो रहा’

सलीम के मुताबिक, तेलंगाना में सरकार की तरफ से नियुक्त किए गए करीब 200 काजी हैं, जो निकाह कराने के लिए अधिकृत हैं. चूंकि ऐसे हर काजी के अधिकार क्षेत्र में एक बड़ा इलाका आता है, इसलिए वह कुछ और नायब काजी (सहायकों) को नियुक्त कर लेते हैं जो उनके अधीन काम करते हैं और उसे रिपोर्ट करते हैं.

खादर पाशा सरकार की तरफ से नियुक्त काजी है जिनके अधीन सात अन्य नायब काजी काम करते हैं. उनका कहना है कि पिछले दो हफ्तों के दौरान उनके हर नायब काजी ने एक दिन में लगभग 20 निकाह कराए हैं. आम तौर पर वे एक दिन में लगभग आठ से 10 निकाह कराते हैं.

खादर पाशा ने दिप्रिंट को बताया, ‘मेरा फोन लगातार बज रहा है. परिवार मुझे कॉल करते रहे और शादी के लिए काजी भेजने को कहते रहे.’

उन्होंने आगे कहा, ‘कुछ परिवार ऐसे भी थे जहां लड़की सिर्फ 17 साल की थी, या 18 साल की उम्र पूरी करने में कुछ महीने कम थे और फिर भी वे चाहते थे कि उसकी शादी हो जाए. मैंने यह कहते हुए मना कर दिया कि यह गैरकानूनी है. मुझे यह भी पता चला है कि शहर के एक काजी के घर के बाहर कतार लगी हुई थी.’

उन्होंने कहा, ‘ऐसी तमाम शादियों में कुछ रस्मों और परंपराओं को बाद के लिए छोड़ दिए जाता है. निकाह में कुछ रस्म होती हैं जिन्हें परिवारों को निभाना पड़ता है. यह सब नहीं किया जा रहा. परिवार वाले हमें सुबह फोन करते हैं, शाम को घर आकार साधारण तरीके से ही निकाह करा देने को कहते हैं. अन्य सभी रस्में बाद के लिए छोड़ दी जाती हैं. यहां तक कि लड़कियों को ससुराल भेजने की रस्म रुखसती या विदाई भी बाद में की जाती है. निकाह के बाद लड़कियां अपने घरों में ही रहती हैं, परिवार वाले बस यही चाहते हैं कि किसी तरह शादी हो जाए.’

हैदराबाद के पुराने इलाके में रहने वाले 22 वर्षीय सोहेल अहमद ने दिप्रिंट को बताया, ‘ऐसा लगता है कि हर गली में हड़बड़ाहट में शादियां कराई जा रही हैं. पिछले एक हफ्ते में हमने ऐसे कई निकाह देखे हैं.’

‘जमीनी हकीकत पर नहीं दिया गया ध्यान’

हैदराबाद में अमूमत सोसाइटी नामक एनजीओ चला रही सामाजिक कार्यकर्ता खालिदा परवीन बाल विवाह निषेध (संशोधन) विधेयक पर आपत्ति जताते हुए इसे बुनियादी मानवाधिकारों का उल्लंघन करार देती है. उनका कहना है कि इसमें आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की जमीनी हकीकत पर ध्यान नहीं दिया गया है.

परवीन ने दिप्रिंट से कहा, ‘मध्यम वर्ग और कुलीन परिवारों के लिए अपनी लड़कियों को पढ़ाना-लिखाना और उनकी शादी कुछ साल टाल देना आसान है. लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए यह संभव नहीं होता. सामाजिक संस्कार अलग हैं, महिलाओं को अपने पैरों पर खड़े होने के लिए शिक्षा हासिल करने के लिए अभी भी संघर्ष करना पड़ता है. ऐसे लाखों परिवार हैं जहां दिन में तीन बार के भोजन का इंतजाम करना भी एक चुनौती है और वे शिक्षा का खर्च नहीं उठा सकते. ग्रामीण इलाकों में तो और भी बुरा हाल है. प्राथमिक स्कूलों में ढंग से शौचालय तक नहीं है, वहां लड़कियों का स्कूल जाना भी एक चुनौती है.’

परवीन ने बताया कि वह गरीब परिवारों की 10 ऐसी लड़कियों की मदद कर रही हैं जो उनके संगठन के लिए काम कर रही हैं और 10वीं कक्षा तक पढ़ाई पूरी की है.

उन्होंने कहा, ‘वे इतनी गरीब हैं कि उनके परिवार ऑटो से परीक्षा केंद्र तक जाने का खर्च वहन नहीं कर सकते. अब ये छात्राएं किराया मांगेंगी तो उनके पिता घर पर बैठने को ही कहेंगे. इसलिए मैंने मदद करने का फैसला किया.’

परवीन ने बताया, ‘परिवार अमूमन 18 साल की उम्र में ही उनकी शादी करा देने की कोशिश करते हैं. ऐसे में कहा जा सकता है कि यह बिल जमीनी हकीकत को समझे बिना और इस मामले में जरा भी संवेदनशीलता दिखाए बिना ही ले आया गया है.’

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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