Sunday, 27 November, 2022
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सुरक्षा से अनिश्चितता की ओर : कोविड के बाद बुजुर्ग भी काम पर लौट रहे

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(उज़मी अतहर)

नयी दिल्ली, 12 जून (भाषा) वैश्विक महामारी कोरोना का ही दुष्प्रभाव है कि इसने लोगों की वित्तीय सुरक्षा छीन ली है और उन्हें आराम की जिन्दगी छोड़कर एक बार फिर से रोजगार पाने के लिए घर से निकलने को मजबूर कर दिया है। कोविड के इसी प्रभाव का नतीजा है कि जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुके बुजुर्ग या हाल ही में सेवानिवृत्त हुए कई लोग फिर से काम की तलाश में जुट रहे हैं। कोई ट्यूशन देने के लिए तैयार है तो कोई कार्यालय सहायक पदों के लिए आवेदन कर रहा है, जबकि कुछ रेहड़ी लगाने को मजबूर हैं।

आय वर्ग के अनुसार वित्तीय स्वतंत्रता प्राप्त करने के कारण अनेक हैं, किसी के बेटे की नौकरी कोविड के कारण चली गयी है, तो किसी की बचत लंबे लॉकडाउन के कारण हाथ से निकल गयी है, किसी के ऊपर कोरोना का पहाड़ टूट चुका है, क्योंकि इस महामारी ने उसके कमाऊ पूत को निगल लिया है और उस बुजुर्ग को फिर से परिवार का समर्थन करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

एजवेल फाउंडेशन के संस्थापक और अध्यक्ष हिमांशु रथ ने कहा, ‘‘कई बुजुर्गों के पास कल की अब कोई अवधारणा नहीं बची है और इससे लोगों के मन में कई अनिश्चितताएं पैदा हो रही हैं।’’

फाउंडेशन के रोजगार विनिमय पोर्टल पर प्राप्त नौकरी के आवेदनों की संख्या में महामारी के बाद से भारी इजाफा हुआ है। यह पोर्टल बुजुर्गों को रोजगार के अवसर प्रदान करती है।

रथ ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, “हमें महामारी से पहले हर महीने लगभग 400 से 450 आवेदन प्राप्त होते थे। पिछले कुछ महीनों में, यह संख्या लगभग 550 तक पहुंच गई है। नए नौकरी चाहने वालों या पहले से आवेदन करने वालों से फोन पर पूछताछ की संख्या पहले के पांच से छह कॉल प्रतिदिन के मुकाबले अब 10 से अधिक कॉल तक पहुंच गई है। इस प्रकार, इसमें कम से कम 30-35 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।’’

हाल ही में 5,000 वृद्ध व्यक्तियों के साथ बातचीत पर आधारित एजवेल फाउंडेशन के सर्वेक्षण के अनुसार, 61 प्रतिशत से अधिक सेवानिवृत्त बुजुर्ग व्यक्ति (60-75 आयु वर्ग में 81.5 प्रतिशत) लाभकारी काम की तलाश में हैं।

रोजगार चाहने वालों में 79 वर्षीय जी. शिवदासानी भी हैं। परिधान उद्योग में अपनी नौकरी से सेवानिवृत्त हुए लगभग 20 साल हो चुके हैं, लेकिन लॉकडाउन के बाद उनके पास काम की तलाश के अलावा कोई और विकल्प शायद ही बचा हो।

उन्होंने कहा, “मेरे बेटे ने इस महामारी में अपनी नौकरी खो दी और अब वह पहले की तुलना में बहुत कम कमा रहा है। मैं उसकी मदद करना चाहता हूं इसलिए मैं फिर से काम करने की सोच रहा हूं।’’

उनका एक बेटा, एक बेटी, एक बहू और चार पोते-पोतियां हैं। शिवदासानी कुछ भी करने को तैयार हैं, लेकिन ट्यूशन देने को वह प्राथमिकता देंगे। उन्होंने कहा, ‘‘अंग्रेजी पर मेरी पकड़ अच्छी है और यह छात्रों की मदद कर सकती है। कोई भी राशि वास्तव में (मेरे परिवार को) मदद करेगी।’’

अधिकांश लोग अनौपचारिक क्षेत्र में नौकरी की तलाश में हैं क्योंकि बड़े निगमों और उद्योगों में बुजुर्गों के लिए कोई जगह नहीं है।

रथ ने कहा कि बुजुर्ग लोगों को भी डिजिटल प्रशिक्षण देने की जरूरत है ताकि वे मुख्यधारा में शामिल हो सकें और आज की इंटरनेट की दुनिया में अधिक आरामदायक और सम्मानजनक जीवन जी सकें।

हेल्पएज इंडिया की प्रमुख (नीति अनुसंधान और विकास) अनुपमा दत्ता ने कहा कि भारत में लगभग 90 प्रतिशत बुजुर्गों को जीवित रहने के लिए काम करना पड़ता है।

बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश के गांवों और कस्बों से लोग अपने बुजुर्गों और परिजनों के साथ दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में वापस आना शुरू हो हैं, जो महामारी कम होने के बाद काम की तलाश में हैं।

कुछ लोग अब रोजगार की तलाश में रेहड़़ी लगाने का काम करने लगे हैं।

भाषा सुरेश नरेश

नरेश

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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