Monday, 27 June, 2022
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वित्त मंत्रालय ‘असंवेदनशील’ है, गौ मिशन के लिए फंड के आवंटन में कर रहा कमी- संसदीय समिति

स्थायी समिति ने उल्लेख किया कि 2021-22 के लिए गोकुल मिशन के तहत निर्धारित अधिकांश फिजिकल टार्गेट या तो पहले जैसे ही रहे हैं या तुलनात्मक रूप से 2020-21 में इनमें मामूली वृद्धि हुई है.

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नई दिल्ली: पशुपालन विभाग ने वित्त मंत्रालय पर ‘असंवेदनशील’ और ‘असहयोगात्मक’ रुख अपनाने का आरोप लगाते हुए कहा है कि इसकी वजह से सरकार का महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय गोकुल मिशन प्रभावित हो रहा है, जिसका उद्देश्य देसी नस्ल के मवेशियों को बढ़ावा देना है.

कृषि संबंधी स्थायी संसदीय समिति ने पिछले सप्ताह संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 2021-22 के लिए 2,243.87 करोड़ रुपये के प्रस्तावित आवंटन के बावजूद विभाग को राष्ट्रीय गोकुल मिशन के लिए वित्त मंत्रालय से मात्र 502.00 करोड़ रुपये ही आवंटित किए गए हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में देसी गोवंश को बढ़ावा देने के लिए यह मिशन शुरू किया था, जो कि ऐसा क्षेत्र है जिस पर किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार और उसके वैचारिक संगठन आरएसएस की तरफ से सबसे ज्यादा जोर दिया जा रहा है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि केंद्रीय योजना परिव्यय में पशुपालन और डेयरी विभाग की हिस्सेदारी कृषि और सहकारिता विभाग की हिस्सेदारी, जो 2018-19 से 2019-20 के बीच 1.91 प्रतिशत से बढ़कर 4.68 प्रतिशत हो गई और 2020-21 में 4.42 प्रतिशत रही, की तुलना में 2018-19 से 2020-21 के बीच 0.12 प्रतिशत पर ही अटक गई है.

संसदीय समिति ने ‘नाराजगी’ जताने के साथ ही कहा कि विभाग के लिए कुल आवंटन को घटाकर संशोधित करते हुए 2019-20 में 3,180.27 करोड़ रुपये और 2020-21 में 3,007.89 करोड़ रुपये कर दिया गया.

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इसमें कहा गया है, ‘जीडीपी में हमारा योगदान 4 फीसदी है लेकिन हमें वित्त मंत्रालय से सिर्फ 0.09 फीसदी फंड मिल रहा है.’


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गाय मिशन ‘दूर की कौड़ी’

स्थायी समिति ने उल्लेख किया कि 2021-22 के लिए गोकुल मिशन के तहत निर्धारित अधिकांश फिजिकल टार्गेट या तो पहले जैसे ही रहे हैं या तुलनात्मक रूप से 2020-21 में इनमें मामूली वृद्धि हुई है.

उदाहरण के तौर पर 2016-17 से 2020-21 के बीच विभाग अब तक देश में केवल 10 गोकुल ग्राम स्थापित कर सका है. मिशन के तहत गोकुल ग्राम की परिकल्पना स्वदेशी नस्लों को विकसित करने के लिए की गई थी, जिसमें 40 प्रतिशत तक नॉन-डिस्क्रिप्ट नस्लें शामिल हैं और वैज्ञानिक तरीके से स्वदेशी पशुपालन और संरक्षण को बढ़ावा भी दिया जाना है.

समिति ने कहा कि यहां तक कि देश में सेक्स-सॉर्टेड सीमन प्रोडक्शन फैसिलिटी वाले सिर्फ दो केंद्र हैं, जबकि स्वदेशी नस्लों के लिए केवल एक राष्ट्रीय कामधेनु प्रजनन केंद्र और दो राष्ट्रीय बोवाइन जीनोमिक केंद्र हैं.

समिति ने 2016-17 से 2020-21 तक मिशन के तहत हासिल किए गए फिजिकल टार्गेट के संदर्भ में विभाग के ऐसे खराब प्रदर्शन पर चिंता जताई है.

इसने आगे यह भी कहा गया है कि मिशन में पूरा फोकस देसी मवेशियों की नस्ल के संरक्षण और सुधार और उनके उत्पादन और उत्पादकता को बढ़ाने पर होने के बावजूद देश में हाई जेनेटिक मेरिट वाले बैलों की कुल संख्या 3,675 ही है.

संसदीय समिति ने आगे यह भी कहा कि यदि फिजिकल टार्गेट पूरा करने को लेकर इसी तरह का प्रदर्शन जारी रहा तो देश में स्वदेशी मवेशियों की नस्ल में सुधार का उद्देश्य केवल ‘दूर की कौड़ी’ बनकर रह जाएगा.


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‘केवल कुत्ते, बिल्लियों पर ध्यान’

रिपोर्ट में यह सवाल भी उठाया गया, ‘आखिर किसानों की आय दोगुनी करने में मुख्य भूमिका निभाने वाले पशुधन के योगदान को कैसे बढ़ाया जाएगा?’

इसमें कहा गया है, ‘मानव स्वास्थ्य सेवा के लिए बजट परिव्यय 65,000 करोड़ रुपये का है लेकिन पशु स्वास्थ्य की देखभाल के लिए बजट परिव्यय केवल 1,000 करोड़ रुपये है. मानव स्वास्थ्य सुरक्षा पर तो निजी क्षेत्र और निवेश की भी व्यापक भूमिका रहती है लेकिन जानवरों के मामले में सारा ध्यान केवल कुत्तों-बिल्लियों पर रहता है.’

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘कृषि बजट परिव्यय 1.30 लाख करोड़ रुपये का है लेकिन पशुपालन का बजट केवल 3,000 करोड़ रुपये (2020-21) है. हालांकि, दूध उत्पादन के मामले में हम सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक हैं, मुर्गी पालन में हम दुनिया में तीसरे नंबर पर हैं और मांस के मामले में हम पांचवें सबसे बड़े उत्पादक हैं.’

संसदीय समिति ने कहा, ‘… किसानों के लिए प्रधानमंत्री किसान निधि है लेकिन पशुधन पालकों के लिए कोई ऐसी योजना नहीं है. कोई इनपुट सब्सिडी नहीं है और बिजली पर भी कोई सब्सिडी नहीं है. खेती-बाड़ी करने वाले किसानों के साथ-साथ पशुधन पालने वाले किसानों को भी समान मान्यता मिलनी चाहिए, तभी किसानों की आय बढ़ेगी.’

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है, ‘आय वृद्धि के मामले में पशुपालन और डेयरी क्षेत्र की क्षमता विनिर्माण और सेवा क्षेत्र के बराबर है.’

लेकिन रोजगार सृजन और उद्यमशीलता की संभावनाओं के बावजूद इस क्षेत्र में निजी क्षेत्र का निवेश ना के बराबर ही है.

20वीं पशुधन गणना 2019 के अनुसार, पशुधन की कुल आबादी 2012 के 51.206 करोड़ की तुलना में बढ़कर 53.676 करोड़ हो गई है, जो 4.82 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाती है.

2019 की पशुधन गणना के अनुसार, लगभग 30.376 करोड़ गोवंश, 7.426 करोड़ भेड़, 14.888 करोड़ बकरियां और लगभग 90.6 लाख सूअर हैं.

(देबलिना डे द्वारा संपादित)

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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