कोलकाता, 24 मई (भाषा) सत्ता परिवर्तन के बाद के पश्चिम बंगाल में जहां तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) अब भी संगठनात्मक आधार पुनः प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रही है, वहां फाल्टा विधानसभा पुनर्मतदान में भाजपा की शानदार जीत शायद कोई आश्चर्य की बात नहीं है, लेकिन परिणाम के भीतर छिपे गहन गणितीय समीकरणों ने ऐसे संकेत दिए हैं जो एक निर्वाचन क्षेत्र से कहीं अधिक दूरगामी प्रभाव डाल सकते हैं।
कई वर्षों तक, फाल्टा जैसी सीट टीएमसी के लिए लगभग गणितीय निश्चितता के साथ काम करने वाले एक फार्मूले का प्रतिनिधित्व करती थी – एक बड़ा अल्पसंख्यक मतदाता वर्ग भारी बहुमत से उसके पक्ष में मतदान करता था, साथ ही हिंदू मतदाताओं के कुछ वर्ग, विशेष रूप से महिलाएं और कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थी भी इसमें शामिल थे।
रविवार के परिणाम से संकेत मिलता है कि मौजूदा प्रारूप केवल किनारों से ही कमजोर नहीं पड़ रहा है; बल्कि फाल्टा में तो ऐसा प्रतीत होता है कि यह पूरी तरह से उलट गया है।
भाजपा उम्मीदवार देबांग्शु पांडा को 1,49,666 वोट मिले और उन्होंने 71 प्रतिशत से अधिक मत हासिल किए। वहीं, माकपा के शंभूनाथ कुर्मी 40,645 वोट के साथ दूसरे स्थान पर रहे, जो कुल मतों का लगभग 20 प्रतिशत है, जबकि कांग्रेस उम्मीदवार अब्दुर रज्जाक तीसरे स्थान पर रहे।
वहीं, टीएमसी के उम्मीदवार जहांगीर खान मात्र 7,783 मतों के साथ चौथे स्थान पर खिसक गए और उनकी जमानत जब्त हो गई।
टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के प्रतिनिधित्व वाले डायमंड हार्बर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत, फाल्टा ने दो साल पहले टीएमसी को लगभग 89 प्रतिशत वोट दिए थे और बनर्जी को लगभग 1.68 लाख मतों की बढ़त दिलाई थी।
भाजपा को 2021 में फाल्टा में 36.75 प्रतिशत वोट मिले थे, जो इस बार बढ़कर 71 प्रतिशत से अधिक हो गए। वहीं, टीएमसी की लगभग 56 प्रतिशत वोट मिले थे, जो घटकर मात्र 3.7 प्रतिशत रह गए।
इस निर्वाचन क्षेत्र में राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक होने से लेकर लगभग 20 प्रतिशत वोट हासिल करने तक माकपा का उदय एक अलग ही कहानी बयां करता प्रतीत होता है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि फाल्टा पहले एक ही निर्वाचन क्षेत्र में सिमटता हुआ प्रतीत होता था, लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव के दौरान दो समानांतर रुझान दिखाई दिए – भाजपा के पीछे हिंदुओं का पूर्ण एकीकरण और अल्पसंख्यक मतदाताओं के कुछ वर्गों का टीएमसी से परे विकल्पों की तलाश करते हुए माकपा की ओर रुख करना।
रविवार के परिणामों से पता चलता है कि अंकगणित न केवल कमजोर हुआ है, बल्कि इसने अपना स्वरूप ही उलट दिया है।
भाषा नेत्रपाल
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