Monday, 27 June, 2022
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गुजरात में ‘6,000 करोड़ का कोयला घोटाला’: UPA काल की MSME सब्सिडी जो जरूरतमंदों तक ‘कभी पहुंची नहीं’

मनमोहन सिंह सरकार के समय 2007-08 में एमएसएमई के लिए सब्सिडी वाले कोयले की गारंटी संबंधी एक योजना बनी थी. गुजरात में इसे लागू किए जाने में भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं.

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अहमदाबाद: छोटे उद्योगों को बढ़ावा देने की केंद्र सरकार की एक योजना के तहत अहमदाबाद स्थित एक एमएसएमई मॉडर्न रबर इंडस्ट्रीज, सस्ते कोयले की खरीद की पात्र थी— जो उसे बाजार दरों से काफी कम पर मिलना था.

कंपनी ने गुजरात सरकार की तरफ से योजना पर अमल के लिए नियुक्त एजेंसी से संपर्क साधा लेकिन कंपनी का दावा है कि उसे बाजार मूल्य पर ही कोयला उपलब्ध कराया गया.

वहीं, ईंट भट्ठे वाली एक एमएसएमई अनमोल ट्रेडर्स का अनुभव कुछ अलग ही था.

गांधीनगर स्थित इस कंपनी का कहना है कि उसने 2015 में इस योजना से जुड़े एक अन्य ट्रेडर्स से कोयला खरीदा था लेकिन उससे बाजार दरों से अधिक कीमत वसूली गई थी.

इस बीच, ए-एंड-एफ फूड्स को योजना (2017-18) के लाभार्थी के तौर पर दर्शाया गया है लेकिन इस कंपनी ने दिप्रिंट को बताया कि उसने कभी भी योजना लागू करने वाली किसी भी एजेंसी के साथ कोई सौदा नहीं किया है.

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गुजरात में मनमोहन सिंह सरकार के समय शुरू हुई एक योजना पर अमल में भ्रष्टाचार को लेकर विवाद गहराता जा रहा है, जिसका उद्देश्य देशभर में एमएसएमई को सस्ती दर पर कोयला उपलब्ध कराना था.

उपरोक्त तीनों कंपनियां कोल इंडिया की वेबसाइट पर योजना के लाभार्थियों के तौर पर दर्ज हैं लेकिन उनका दावा है कि इससे उन्हें कोई लाभ नहीं हुआ है.

ऐसे में सवाल उठते हैं: यदि कुछ पात्र कंपनियों को वास्तव में रियायती दरों के बजाये बाजार मूल्य पर ही कोयला उपलब्ध कराया गया तो उन्हें योजना के लाभार्थी के तौर पर क्यों सूचीबद्ध किया गया? यदि कोयला बाजार दरों से अधिक कीमत पर बेचा गया— उदाहरण के तौर पर जैसा कि अनमोल ट्रेडर्स का कथित दावा है— तो भुगतान की गई अतिरिक्त राशि का क्या हुआ?

आरोप लगाने वालों, कांग्रेस समेत, का कहना है कि पिछले 14 वर्षों में गुजरात में इस योजना के नाम पर 6,000 करोड़ रुपये का ‘घोटाला’ हुआ है, जिसमें 60 लाख टन से अधिक सब्सिडी वाले कोयले को ‘अन्य राज्यों में भेजकर उद्योगों को उच्च कीमत पर बेचा गया.’

गुजरात में कोयला आवंटन के प्रभारी एमएसएमई विभाग के अधिकारियों ने ऐसे आरोपों से इनकार किया है. हालांकि, उन्होंने पिछले महीने दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के आधार पर आंतरिक जांच शुरू कर दी है.

एमएसएमई विभाग के आयुक्त रंजीत कुमार ने दिप्रिंट से बातचीत में इन आरोपों को ‘काल्पनिक, निराधार और मानहानिकारक’ करार दिया.

फिर भी, योजना के कथित लाभार्थियों के साथ बातचीत और जमीनी स्तर पर खोजबीन से पता चलता है कि सब कुछ सही नहीं है.

कार्यान्वयन एजेंसियों में से एक— न्यू सौराष्ट्र ब्रिकेटिंग इंडस्ट्रीज एसोसिएशन— के कथित परिसर का दौरा करने पर पता चलता है कि यहां पर इस कंपनी के बजाये एक ट्रैवल एजेंसी चल रही है.

दूसरी एजेंसी, गुजरात कोल कोक ट्रेडर्स एंड कंज्यूमर एसोसिएशन के कार्यालय में एक एकाउंटेंट को छोड़कर बाकी फुल-टाइम स्टाफ का अभाव था और नाम का कोई औपचारिक बोर्ड भी नहीं लगा था.

ऊपर बताई गई तीन कंपनियों के अलावा चौथे ‘लाभार्थी’ को बताए गए पते पर खोजा नहीं जा सका.

योजना पर अमल कराने वाली एजेंसियों के कुछ ‘प्रतिनिधियों’ ने दिप्रिंट को बताया कि वे सब्सिडी वाला कोयला ‘3,500-4,000 रुपये प्रति टन तक सस्ता’ खरीद रहे थे लेकिन वह दर जाहिर करने से इनकार कर दिया जिस पर वे एमएसएमई को बेच रहे थे.

यह मुद्दा तेजी से उछला क्योंकि पिछले कुछ महीनों से जारी कोयल संकट के कारण कीमतों में बढ़ोतरी नजर आई है, जिसकी वजह से खासकर एमएसएमई क्षेत्र की मुश्किलें बढ़ गई हैं.

अक्टूबर 2021 में सूरत में 400 से अधिक टेक्सटाइल यूनिट, जिसमें करीब 5,00,000 लोग कार्यरत हैं, को कोयले के बढ़ते दामों के कारण अपने उत्पादन में कटौती करनी पड़ी. उसी महीने, वापी में पांच पेपर मिल अस्थायी रूप से बंद करने की नौबत आ गई, जिससे सैकड़ों नौकरियां चली गईं.

हालांकि, आयुक्त रंजीत कुमार ने सभी आरोपों को खारिज कर दिया है.

योजना के तहत कोयला आवंटित करने की जिम्मेदारी निभा रहे कोल इंडिया के कॉरपोरेट कम्युनिकेशंस प्रमुख सुनील कुमार ने इस मामले में दिप्रिंट के मैसेज और कॉल पर कोई जवाब नहीं दिया है.


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एमएसएमई की मदद के लिए बनी थी योजना

एमएसएमई के लिए सब्सिडी वाले कोयले की गारंटी देने वाली यह योजना 2007-08 में तैयार की गई थी.

नीति के तहत, गुजरात में छोटे उद्योगों के लिए कोल इंडिया के वेस्टर्न कोलफील्ड्स और साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स से हर महीने कोयला निकाला जाता है.

व्यापक स्तर पर कोयले का वितरण सुनिश्चित करने के लिए राज्यों से एजेंसियों— राज्य द्वारा नामित एजेंसियां या एसएनए— का चयन करने को कहा जाता है और प्रक्रिया की निगरानी के लिए एक राज्य अधिकारी नियुक्त होता है.

अतिरिक्त उद्योग आयुक्त कोयले के आवंटन और वितरण के प्रभारी अधिकारी होते हैं. लेकिन गुजरात में यह पद 2015 से खाली है और यह काम राज्य के एमएसएमई विभाग को सौंपा गया है.

नीति के तहत एसएनए को राज्य के एमएसएमई विभाग को कोयले की सालाना मांग का अनुमान बताने का जिम्मा सौंपा गया है, जो फिर कोल इंडिया को सूचित करता है.

सार्वजनिक क्षेत्र की दिग्गज कंपनी कोल इंडिया की तरफ से आवंटित कोयले की मात्रा मासिक आधार पर एसएनए को बताई जाती है.

कोल इंडिया की वेबसाइट के मुताबिक, गुजरात में 2007-08 से इस योजना के तहत कोयले की आपूर्ति की जिम्मेदारी चार कंपनियों— न्यू सौराष्ट्र ब्रिकेटिंग इंडस्ट्रीज एसोसिएशन (माना जाता है कि यह सात साल पहले ही अपनी दुकान बंद कर चुकी है), गुजरात कोल कोक ट्रेडर्स एंड कंज्यूमर एसोसिएशन, काठियावाड़ कोल एंड कोक कंज्यूमर एंड ट्रेडर्स एसोसिएशन और साउथ गुजरात फेडरेशन ऑफ इंडस्ट्रीज— ने संभाल रखी है.

एसएनए को राज्य की तरफ से कोल इंडिया से सब्सिडी वाला कोयला खरीदने और मौजूदा बाजार दरों से कम कीमत पर एमएसएमई को बेचने का कांट्रैक्ट दिया जाता है.

कोल इंडिया के दिशानिर्देशों के तहत, एसएनए 5 प्रतिशत का लाभ कमा सकते हैं और अंतिम उपयोगकर्ता से करों और परिवहन का शुल्क वसूल सकते हैं.

कोल इंडिया की वेबसाइट पर उपलब्ध डेटा दर्शाता है कि गुजरात में 2015 से 2019 के बीच एमएसएमई को सालाना 2,16,000 टन कोयले का आवंटन किया गया. यह आवंटन 2020 और 2021 में बढ़ाकर 15,00,000 टन कर दिया गया था.

राज्य एमएसएमई आयुक्त कुमार ने आवंटन में इस वृद्धि के बारे में स्पष्ट करते हुए कहा, ‘केंद्र ने 2020 में एमएसएमई की परिभाषा बदल दी थी जिससे…गुजरात में एमएसएमई का दायरा बढ़ गया.’

उन्होंने कहा, ‘इसके अलावा, कोविड-बाद आर्थिक गतिविधियों में तेजी भी आई है. राज्य के लिए कोयले का कोटा 2013-14 से ही स्थिर था और यह आवंटन बढ़ाने की जरूरत महसूस की गई.

उद्योग विशेषज्ञों ने दिप्रिंट को बताया कि जहां एक कपड़ा प्रसंस्करण इकाई प्रतिदिन लगभग 30 से 50 टन कोयले का उपयोग करती है, वहीं एक ईंट भट्ठा ठीक कारोबार चलने के समय में सालाना 400 से 600 टन कोयले का उपयोग कर सकता है.


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क्या है ‘घोटाला’

कोल इंडिया की वेबसाइट पर 2017-18 में गुजरात की 300 से अधिक एमएसएमई को सब्सिडी वाले कोयले के लाभार्थियों के रूप में सूचीबद्ध किया गया था, जब राज्य में इस संबंध में आखिरी बार डेटा अपडेट किया गया था.

हालांकि, जब दिप्रिंट ने सूचीबद्ध कुछ एमएसएमई से संपर्क साधा तो तस्वीर कुछ अलग ही नज़र आई.

मॉडर्न रबर इंडस्ट्रीज के मालिक प्रजापति वासु ने बताया, ‘मैंने 2016-17 में न्यू सौराष्ट्र ब्रिकेटिंग इंडस्ट्रीज एसोसिएशन से कोयला खरीदा लेकिन उन्होंने यह मुझे नियमित बाजार मूल्य पर ही बेचा था.’

वासु ने दावा किया कि उन्हें सब्सिडी योजना के बारे में नहीं पता था और एसएनए ने भी इसके बारे में कोई जानकारी नहीं दी.

अनमोल ट्रेडर्स के मालिक जिग्नेश प्रजापति ने शैलेश वाघेला के साथ सौदे की बात कही, जिन्होंने दिप्रिंट को बताया कि कुछ साल पहले वह न्यू सौराष्ट्र ब्रिकेटिंग इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के साथ काम करते थे.

प्रजापति ने कहा, ‘मैं एक अन्य डीलर के कार्यालय में शैलेश वाघेला नामक एक व्यक्ति से मिला और उसने बताया कि उसकी कंपनी भी कोयले की आपूर्ति करती है. मुझे 2015 में कोयला खरीदने की याद है. उनकी कीमतें नियमित बाजार कीमतों से अधिक थीं इसलिए मैं फिर उनके पास नहीं गया.’

अहमदाबाद स्थित ए-एंड-एफ फूड्स के शानू बादामी ने कहा कि उन्होंने कभी एसएनए के साथ कोई सौदा नहीं किया. उन्होंने कहा, ‘डेटा में मेरी कंपनी का नाम कैसे सूचीबद्ध है? मैंने उनके साथ कभी कोई सौदा नहीं किया. मुझे सबूत दिखाओ और मैं दिखाऊंगा कि मेरी कंपनी ने कभी उनके साथ कोई संपर्क नहीं किया.’

अन्य सूचीबद्ध लाभार्थियों में से एक फेथ इंडस्ट्रीज ने कहा कि वह ‘मौजूदा समय में इन चारों में से किसी एसएनए के साथ कोई सौदा नहीं कर रही है.’ एक कर्मचारी ने कहा, ‘पहली बात तो यह कि हमारे पास इतने ज्यादा पहले के लेन-देन का कोई रिकॉर्ड नहीं है और मौजूदा समय में हम ऐसी किसी भी कंपनी के साथ काम नहीं कर रहे हैं.’

घोषित पते पर एक अन्य कंपनी एडवांस ब्रिक्स का भी कुछ अता-पता नहीं लग सका.

एक उद्योग लॉबी दक्षिण गुजरात टेक्सटाइल प्रोसेसिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष जितेंद्र पी. वखारिया ने कहा कि उन्होंने चार एसएनए के बारे में कभी नहीं सुना.

उन्होंने कहा, ‘सूरत की करीब 400 कपड़ा इकाइयों में से मैंने किसी को इन एजेंसियों से सब्सिडी वाला कोयला खरीदने के बारे में कभी नहीं सुना. अगर हमें पता होता, तो हम स्पष्ट रूप से उनके पास जाते, क्योंकि कोयला एक आवश्यक वस्तु है और उसकी कीमत बहुत अधिक है.’

उन्होंने कहा, ‘अगर किसी छोटे उद्योग का मालिक इन एसएनए से अलग से खरीद भी रहा होगा तो उसने कभी एसोसिएशन सदस्यों को इसके बारे में नहीं बताया.’


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पता सूचीबद्ध लेकिन कोई कार्यालय नहीं

अहमदाबाद की चहल-पहल भरी सी.जी. रोड पर एक पुराना-सा कार्यालय परिसर है.

तीसरी मंजिल पर पहुंचने पर यहां ‘बेस्ट ट्रेवल टिकट सर्विस’ का कार्यालय नजर आता है. इसके रिसेप्शन पर मालिक बैठता है, जिसका कहना है कि वह न्यू सौराष्ट्र ब्रिकेटिंग इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के बारे में सवालों के जवाब देते-देते तंग आ चुके हैं.

यह कोल इंडिया की वेबसाइट पर न्यू सौराष्ट्र ब्रिकेटिंग इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के लिए सूचीबद्ध पता है. लेकिन ट्रैवल एजेंसी के मालिक, जिन्होंने नाम बताने से इनकार किया, ने कहा कि यहां पर पिछले 10 सालों से उनका कार्यालय है.

उन्होंने कहा, ‘मेरे पास पिछले 10 वर्षों से यह कार्यालय है लेकिन उन्हें कई बार बहुत ही ज्यादा अपमान झेलना पड़ता है. हर कुछ महीनों में आयकर अधिकारी यह आरोप लगाते हुए कि उक्त कोयला वितरक की तलाश में आते हैं कि उस पर विभाग का पैसा बकाया है. इसने हमारी गुडविल को खत्म कर दिया है.’

इसी इमारत में 20 सालों से ज्यादा समय से अन्य कार्यालय चला रहे मालिकों का कहना है कि उन्होंने यहां कभी किसी कोयला वितरक के बारे में नहीं सुना.

दूसरे एसएनए, गुजरात कोल कोक ट्रेडर्स एंड कंज्यूमर एसोसिएशन, का कार्यालय शहर के पालड़ी क्षेत्र में है. एक दिन जब दिप्रिंट ने शाम को वहां का दौरा किया, तो पाया कि परिसर में कोई कर्मचारी नहीं है. जोशी जी नामक एक एकाउंटेंट ही वहां मौजूद था. एसोसिएशन के नाम पर दरवाजे पर बस एक पेपर प्रिंटआउट लगा था.

रिपोर्टर ने जब मालिक से संपर्क की कोशिश की तो जोशी ने कहा, ‘वह बहुत व्यस्त व्यक्ति है, उनके पास समय नहीं है.’ यही नहीं जब दिप्रिंट ने शाम को आने की बात कही तो उसने आपत्ति जताई और इस रिपोर्टर से परिसर छोड़ने को कह दिया.

न्यू सौराष्ट्र ब्रिकेटिंग इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के हरीश मेहता ने बताया कि उनकी कंपनी सात साल पहले बंद हो चुकी है, साथ ही जोड़ा कि अब वह साउथ गुजरात फेडरेशन ऑफ इंडस्ट्रीज के लिए एक कंसल्टेंट के तौर पर काम करते हैं.

मेहता ने काठियावाड़ कोल एंड कोक कंज्यूमर एंड ट्रेडर्स एसोसिएशन और साउथ गुजरात फेडरेशन ऑफ इंडस्ट्रीज से जुड़े ‘प्रतिनिधियों’ के तौर पर दो लोगों— क्रमश: हसन नरसी और चुन्नी पटेल— के साथ एक बैठक कराई लेकिन दोनों ने कंपनियों के सहयोगियों या मालिकों का नाम बताने से इनकार कर दिया..

पटेल ने कहा कि साउथ गुजरात फेडरेशन ऑफ इंडस्ट्रीज को ‘2012 में गुजरात सरकार ने पहली बार एसएनए नियुक्त किया था.’

कोयले की खपत के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा, ‘संचालन के शुरुआती वर्षों में हमें मुश्किल से ही कोयला मिलता था और खरीद 10 लाख टन (एक वर्ष) तक ही थी. लेकिन अभी, चूंकि आयात बाधित होने से कोयले की कीमतों में वृद्धि हुई है (इस साल के शुरू में इंडोनेशिया द्वारा कोयले के निर्यात पर एक महीने का प्रतिबंध) हमने सोचा कि इससे एमएसएमई को केंद्रीय एजेंसी से अधिक कोयला प्राप्त करने में फायदा होगा.’

शैलेश वाघेला, जिनका नंबर कोल इंडिया की वेबसाइट पर सूचीबद्ध है, ने बताया कि शुरू में उन्होंने न्यू सौराष्ट्र ब्रिकेटिंग इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के लिए काम किया था ‘लेकिन कंपनी सात पहले बंद हो चुकी है. और अब, मैं साउथ गुजरात फेडरेशन ऑफ इंडस्ट्रीज के साथ काम करता हूं.’

हालांकि, जब उनसे अपनी कंपनी के मालिकों का ब्योरा साझा करने के लिए कहा गया, तो उन्होंने खुद कोयला उद्योग से जुड़े होने से ही इनकार कर दिया.

दिप्रिंट ने जब काठियावाड़ कोल एंड कोक कंज्यूमर एंड ट्रेडर्स एसोसिएशन और गुजरात कोल कोक ट्रेडर्स एंड कंज्यूमर एसोसिएशन के जीएसटी रिकॉर्ड की पड़ताल की तो पाया कि दोनों ने नियमित रूप से अपना वार्षिक जीएसटी रिटर्न दाखिल किया है, लेकिन उनके द्वारा भुगतान की गई राशि का पता नहीं चल सका.

साथ ही, दोनों कंपनियों ने अपने आधार नंबर को प्रमाणित करने के लिए केवाईसी विवरण भी नहीं भरा था.

दिप्रिंट को कोल इंडिया की वेबसाइट पर वलसाड स्थित काठियावाड़ कोल एंड कोक कंज्यूमर एंड ट्रेडर्स एसोसिएशन का कोई नंबर नहीं मिला.


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‘निराधार आरोप’

पिछले महीने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने गुजरात में इस योजना के नाम पर घोटाले का आरोप लगाया था.

कांग्रेस प्रवक्ता गौरव वल्लभ ने नई दिल्ली में संवाददाताओं से कहा, ‘पिछले 14 सालों में गुजरात के व्यापारियों और छोटे उद्योगों के नाम पर कोल इंडिया की खदानों से 60 लाख टन कोयला भेजा गया. इसकी औसत कीमत 3,000 रुपये प्रति टन के हिसाब से 1,800 करोड़ रुपये है. इसे व्यापारियों और उद्योगों को बेचने के बजाये अन्य राज्यों में 8,000 से 10,000 रुपये प्रति टन के भाव पर बेचा गया है.’

पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा न्यायाधीश की अगुआई में इस ‘घोटाले’ की समयबद्ध जांच कराने की मांग की और कहा कि पिछले 14 वर्षों के दौरान गुजरात के सभी चार मुख्यमंत्रियों की इस मामले में जांच होनी चाहिए.

राज्य में 1995 से भाजपा का शासन है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2001 से 2014 तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे हैं.

वहीं, एमएसएमई आयुक्त कुमार ने इन आरोपों के बारे में स्पष्ट किया.

उन्होंने एक लिखित बयान में कहा, ‘कोल इंडिया से मिले ब्योरे के मुताबिक 2008-09 से अब तक कुल 48.44 लाख मीट्रिक टन कोयले के आवंटन की सिफारिश की गई और इसके मुकाबले वास्तव में केवल 15.69 लाख मीट्रिक टन कोयला ही उठाया गया.’

इसलिए, 6,000 करोड़ रुपये के कथित मूल्य के 60 लाख मीट्रिक टन कोयले की चोरी का आरोप निराधार लगता है.

राज्य एसएनए द्वारा कोयला व्यापार में अनियमितता बरते जाने की संभावनाओं के बारे में पूछे जाने पर कुमार ने दिप्रिंट से कहा, ‘एमएसएमई कमिश्नरेट को अब तक इस संबंध में कोई शिकायत नहीं मिली है.’

एसएनए पर नियंत्रण के कथित अभाव पर, उन्होंने कहा, ‘राज्य द्वारा नामित एजेंसियों के लिए नियुक्ति प्रक्रिया आखिरी बार 2015 में गुजरात सरकार द्वारा आयोजित की गई थी. तब से, राज्य-नामित एजेंसियों और एमएसएमई कमिश्नरी के बीच नियमित रूप से बातचीत होती रही है.’

उन्होंने कहा कि ‘इन एजेंसियों और सरकारी अधिकारियों के बीच नियमित पत्राचार होता रहता है जो स्पष्ट तौर पर इन आरोपों को निराधार साबित करता है.’

उन्होंने कहा, ‘उक्त अवधि में कोल इंडिया भी इन एजेंसियों को नियमित आधार पर कोयले का आवंटन करती रही है. इसलिए, इन कंपनियों के केवल कागजों पर ही मौजूद होने के आरोप निराधार हैं.’

कुमार के मुताबिक, ‘2015 से कोयला आवंटन का विषय विभिन्न अधिकारियों के साथ अतिरिक्त उद्योग आयुक्त की निगरानी में निपटाया जाता है…’

गुजरात के उद्योग आयुक्त राहुल गुप्ता ने दिप्रिंट को बताया कि एमएसएमई विभाग में कोयला आवंटन का प्रभार संयुक्त आयुक्त एस. भारद्वाज संभाल रहे थे. दिप्रिंट ने भारद्वाज से मुलाकात की लेकिन उन्होंने इस मुद्दे पर टिप्पणी से इनकार कर दिया.

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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