Saturday, 25 June, 2022
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न्यायपालिका में लैंगिक असमानता चिंताजनक: SC में 33 में सिर्फ 4 महिला जज, HCs में 627 में केवल 66

SC में 31 अगस्त 2021 को महिला जजों की 4 की संख्या, अभी तक सबसे अधिक है. CJI रमना ने भी कहा है कि महिलाओं को न्यायपालिका में 50% आरक्षण का अधिकार हैं.

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नई दिल्ली: पिछले महीने, भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना ने भारतीय न्यायपालिका में महिलाओं की बेहद कम नुमाइंदगी पर खेद व्यक्त किया. सीजेआई सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बोल रहे थे, जिसमें सुप्रीम कोर्ट में हाल में नियुक्त किए गए नौ जजों का अभिनंदन किया गया, जिनमें तीन महिलाएं थीं.

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि अब समय है कि न्यायपालिका में, 50 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएं, क्योंकि ये कोई उपकार नहीं, बल्कि उनका अधिकार है. न्यायपालिका में तिरछे लिंग अनुपात पर रोशनी डालने के लिए, उन्होंने आंकड़े साझा किए और कहा कि देश में, निचली अदालतों में केवल 30 प्रतिशत महिला जज हैं, जबकि उच्च न्यायालयों में ये प्रतिशत 11.5 है.

न्यायमूर्तियों इंदिरा बनर्जी, हिमा कोहली, बीवी नागारत्ना और बेला त्रिवेदी का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा, कि अब शीर्ष अदालत में 33 में से चार जज महिलाएं हैं. बाद की तीन जजों ने 31 अगस्त को शपथ ली, जिससे सुप्रीम कोर्ट के अब तक के इतिहास में, महिला जजों की संख्या सबसे अधिक हो गई.

उसी आयोजन में, सीनियर एडवोकेट किरन सूरी ने महिला वकीलों की ख़ुशी को एक लाइन में समेटते हुए कहा- ‘एक, दो, तीन, चार, ये दिल मांगे मोर’- और सीजेआई से अनुरोध किया कि सभी 25 उच्च न्यायालयों में, जजों की भर्ती के लिए और अधिक महिलाओं के नाम की सिफारिश करें.

जस्टिस नागारत्ना की नियुक्ति को विशेष रूप से, ऐतिहासिक महत्व का माना जा रहा है, क्योंकि 2027 में उनके भारत की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बनने की संभावना है, भले ही वो केवल 40 दिन की छोटी सी अवधि के लिए हो. उन्होंने 2008 में भी इतिहास रचा था, जब वो बार से आने वाली पहली महिला वकील बनीं, जिन्होंने कर्नाटक हाईकोर्ट में जज का पद संभाला.

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26 सितंबर के आयोजन में उत्साह का प्रदर्शन ग़लत नहीं था. दिप्रिंट द्वारा आंकड़ों के मिलान करने पर पता चला, कि देशभर के उच्च न्यायालयों में ख़तरनाक हद तक लैंगिक असमानता पाई जाती है.

हर HC की स्थिति

न्याय विभाग वेबसाइट के आंकड़ों के अनुसार, जिसे आख़िरी बार 1 अक्तूबर 2021 को अपडेट किया गया था सभी उच्च न्यायालयों के कुल 627 जजों में, केवल 66 महिलाएं हैं- कुल कार्यशील संख्या का मुश्किल से 10 प्रतिशत.

मद्रास हाईकोर्ट में महिला जजों की संख्या सबसे अधिक है- 55 की कुल कार्यशील संख्या में 13. पहले भी, मद्रास एचसी में दो महिलाएं मुख्य न्यायाधीश रह चुकी हैं- इंदिरा बनर्जी (2017-18) और विजया ताहिलरमानी (2018-19).

ये है इस मामले में हर उच्च नायालय की स्थिति:

इन्फोग्राफिक: रमनदीप कौर | THEPRINT

मद्रास हाईकोर्ट में महिला जजों की संख्या सबसे अधिक है- कुल 55 की कुल कार्यशील संख्या में 13.

पहले भी, मद्रास एचसी में दो महिला मुख्य न्यायाधीश रह चुकी हैं- इंदिरा बनर्जी (2017-18) और विजया ताहिलरमानी (2018-19).

बॉम्बे हाईकोर्ट में, कुल 59 कार्यशील जजों में बेंच पर केवल सात महिलाएं हैं, लेकिन फिर भी वो दूसरे स्थान पर है. तीसरे स्थान पर दिल्ली और इलाहबाद दोनों एचसी हैं, जहां क्रमश: 31 और 91 की कार्यशील संख्या में, दोनों में छह-छह महिला जज काम कर रही हैं.

कैलकटा और पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट्स दोनों में, क्रमश: 36 और 45 की कार्यशील संख्या में, पांच-पांच महिला जज हैं. केरल और गुजरात उच्च न्यायालयों में क्रमश: 37 और 25 में से चार-चार महिला जज हैं, जबकि आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ में क्रमश: 18 और 14 में, दो-दो महिलाएं हैं.


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आठ उच्च न्यायालयों में केवल एक-एक महिला जज हैं- राजस्थान, उड़ीसा, तेलंगाना, झारखंड, गौहाटी, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम. फिलहाल राजस्थान में 23 जज हैं, उड़ीसा में 13, तेलंगाना में 11, झारखंड में 15, गौहाटी में 20, जम्मू-कश्मीर में 11, हिमाचल में 10 और सिक्किम में दो हैं

पांच हाईकोर्ट्स- पटना, उत्तराखंड, मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा- में कोई महिला जज नहीं हैं.

पिछले 15 वर्षों के आंकड़ों से ये भी पता चलता है, कि न्यायपालिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बेहद कम रहा है. 2006 और 2021 के बीच, 150 महिला जज उच्च न्यायालयों में नियुक्त की गई हैं, लेकिन उनमें से 84 पहले ही रिटायर हो चुकी हैं, और केवल 66 सेवारत हैं.

ज़्यादा महिला वकीलों की सीधे नियुक्ति नहीं होती

न्यायपालिका में लैंगिक असमानता का परेशान करने वाला एक और पहलू ये है, कि ज़्यादा महिला वकीलों को तरक़्क़ी देकर बेंच पर नहीं लाया गया है. हाईकोर्ट्स में दो तरह से नियुक्तियां की जाती हैं- बार से बेंच में सीधे तरक़्क़ी, और निचली अदालतों के जजों की पदोन्नति.

2006 से 25 हाईकोर्ट्स में नियुक्त की गई 150 महिला जजों में, केवल 61 मामले सीधे तरक़्क़ी के थे, जबकि बाक़ी निचली अदालतों की जज थीं, जिन्हें प्रमोशन मिले थे. महिला जजों की मौजूदा कार्यशील संख्या 66 में से, 32 वकील हैं जिनकी सीधी नियुक्ति की सिफारिश की गई.

उसी 15 वर्ष की अवधि में, सुप्रीम कोर्ट में नौ महिला जज हुई हैं, जिनमें चार अभी सेवारत हैं. लेकिन केवल एक महिला- जस्टिस इंदु मल्होत्रा एक वकील थीं, जो शीर्ष अदालत में प्रेक्टिस करतीं थीं. बाक़ी नौ अलग अलग हाईकोर्ट्स की सिटिंग जज थीं, जब उनके नामों की सिफारिश की गई.

‘पितृसत्तात्मक मानसिकता’

विशेषज्ञों के अनुसार, क़ानूनी पेशे में महिलाएं मुश्किल से नज़र आती हैं, और उनकी कम संख्या के कारण ही पुरुषों के मुक़ाबले महिला जजों की संख्या कम पाई जाती है.

26 सितंबर के कार्यक्रम में सीजेआई रमना ने, महिला वकीलों से जुड़ा डेटा साझा किया, और इस ओर ध्यान आकृष्ट किया कि कुल 17 लाख एडवोकेट्स में, महिलाओं की संख्या सिर्फ 15 प्रतिशत है. प्रदेश बार काउंसिल जैसे वकीलों के चुने हुए अनुशासनात्मक निकायों में भी, केवल दो प्रतिशत सदस्य महिलाएं हैं. वकीलों की शीर्ष इकाई बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) में, कोई महिला सदस्य नहीं है.

महिला वकीलों का कहना है कि उनका संघर्ष अभी भी जारी है, भले ही 1923 में विधि व्‍यवसायी (महिला) अधिनियम के पारित होने पर, उन्हें क़ानूनी पेशे में शामिल होने की अनुमति मिलने के बाद, उनकी संख्या धीरे धीरे बढ़ गई हो

एडवोकेट स्नेहा कलिता, जिन्होंने एससी में एक याचिका दायर करके, अदालतों में महिलाओं के लिए उचित प्रतिनिधित्व की मांग की है, ने कहा कि निचली न्यायपालिका में 30 प्रतिशत महिलाओं की मौजूदगी, इस भ्रम को तोड़ती है, कि योग्य महिला उम्मीदवारों की कमी है.

कलिता ने कहा, ‘जब आंकलन प्रतियोगिता पर आधारित होता है, तब कोई कमी पेश नहीं आती, और फिर भी महिलाएं उच्च न्यायपालिका में बेहतर प्रतिनिधित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं. दरअसल जिस चीज़ को त्यागने की ज़रूरत है, वो है पित्रसत्तात्मक मानसिकता और तटस्थ संतुलन रवैया’.

सीनियर एडवोकेट महालक्ष्मी पवानी, जो महिला वकीलों की जजों के पद पर नियुक्ति न होने की मुखर आलोचक रही हैं, कहती हैं कि शीर्ष अदालत में प्रेक्टिस करने वाली महिलाएं, चयन प्रक्रिया से सबसे ज़्यादा प्रभावित होती हैं, जिसका झुकाव काफी हद तक पुरुषों की ओर होता है. उन्होंने कहा कि एससी में पेश होने वाली महिला एडवोकेट्स को, जज बनाने पर कभी ग़ौर नहीं किया जाता, क्योंकि बार तथा उस एचसी दोनों की ओर से विरोध किया जाता है, जिसके लिए वो पात्र होती हैं.

पवानी ने कहा, ‘विभिन्न प्रांतों से बहुत सी महिलाएं कई कारणों से दिल्ली आ गई हैं, जिनमें देश की शीर्ष अदालत में प्रेक्टिस करने की इच्छा भी शामिल होती है. लेकिन यही सब कारण महिलाओं के खिलाफ जाते नज़र आते हैं. एससी से पुरुष वकीलों का चयन हो जाता है, लेकिन उसी पद के लिए महिलाओं को कभी नहीं चुना जाता’.

पवानी ने कहा कि न्यायपालिका में लैंगिक असमानता का एक कारण, उच्च न्यायालयों तथा शीर्ष अदालत की कलीजियम में महिलाओं का न होना है. यही पैनल जजों की नियुक्ति के लिए, नामों का चयन करके उनकी सिफारिश करता है. इसके अलावा ऐसे फोरम में पर्याप्त आवाज़ें नहीं उठतीं.

उन्होंने आगे कहा, ‘जस्टिस रूमा पाल को छोड़कर, कोई महिला जज शीर्ष तीन जजों के उस एससी कलीजियम में शामिल नहीं हो पाई, जो उच्च न्यायालयों में नियुक्तियों पर नज़र रखता है. जस्टिस नागारत्ना उस उपलब्धि को हासिल करने वाली, दूसरी महिला जज होंगी’.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें )

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