Wednesday, 29 June, 2022
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हिजाब विवाद में घुसा अल-क़ायदा प्रमुख और विपक्ष से जूझते इमरान ख़ान- उर्दू प्रेस की बड़ी ख़बरें

दिप्रिंट आपके लिए इस सप्ताह के उर्दू अख़बारों की सुर्ख़ियों का सार लेकर आया है.

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नई दिल्ली: ऐसे सप्ताह में जब दुनिया भर की निगाहें यूक्रेन में रूस के युद्ध अपराधों के बीच, पाकिस्तान में तेज़ी से बदलते घटनाक्रम पर लगीं थीं, अल-क़ायदा प्रमुख एयमान अल-ज़वाहिरी के मुस्कान ख़ान की जय जयकार करने को भी- कर्नाटक की वो छात्रा जो फरवरी में अपने हिजाब-समर्थक विरोध के लिए मशहूर हो गई, जिसने हिंदू बहुदेववादी भीड़ को तकबीर (अल्लाह सबसे महान है) के विद्रोही नारों से चुनौती दी- पहले पन्नों पर जगह दी गई.

महंगाई और बेरोज़गारी के मुद्दे भी फोकस में रहे, लेकिन ब्रूस विलिस की मस्तिष्क की जंग देखने के बाद, जिसमें एक्टर ने अफेशिया (बोली बंद होने) के रोग निदान की ख़बर दी- अख़बारों ने लोगों को अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देने की सलाह दी.

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अल क़ायदा और हिजाब

कर्नाटक में चल रहे हिजाब विवाद पर वैश्विक आतंकी समूह अल-क़ायदा के प्रमुख एयमान अल ज़वाहिरी की अनचाही टिप्पणी को, रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा और सियासत दोनों ने पहले पन्नों पर जगह दी.

साल 2020 की ज़वाहिरी की मौत की ख़बरों का हवाला देते हुए, रोज़नामा ने 7 अप्रैल को लिखा कि ये वीडियो एक सबूत है कि अल क़ायदा बॉस अभी ज़िंदा है. पेपर ने लिखा कि वीडियो में ज़वाहिरी ने कर्नाटक की लड़की मुस्कान ख़ान की तारीफ की थी, जिसने असामाजिक तत्वों द्वारा उसके हिजाब पर सीटियां बजाने का जवाब, ‘अल्ला हो अकबर’ के नारों के साथ दिया था.

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अगले दिन,सियासत ने लिखा कि ज़वाहिरी के वीडियो ने (कर्नाटक में?) तनाव को बढ़ा दिया, हालांकि मुस्कान के परिवार ने इससे दूरी बना ली थी, जबकि कर्नाटक के गृह मंत्री अरागा ज्ञानेंद्र ने कहा था, कि वीडियो के पीछे कुछ अनदेखे हाथ थे, जो मुसीबत को बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं.

5 अप्रैल को पहले पन्ने की ख़बर में सियासत ने लिखा: ‘कर्नाटक नए हिंदुत्व की प्रयोगशाला बन गया है. हलाल मीट के बाद अब मस्जिदों में लाउडस्पीकरों का विरोध हो रहा है’. अख़बार ने लिखा कि ऐसे लाउडस्पीकरों को बंद करने की (महाराष्ट्र में?) राज ठाकरे की मांग को समर्थन मिला था, और उसने कर्नाटक में इस योजना की भी ख़बर दी, कि अज़ान के समय भजन बजाए जाएंगे.

पाकिस्तान पर नज़र

पड़ोसी पाकिस्तान में चल रही खलबली और संवैधानिक रस्साकशी की ख़बरें, लगभग पूरे सप्ताह पहले पन्नों पर बनी रहीं. 4 अप्रैल को सियासत औररोज़नामा ने अपने पहले पन्नों पर पाकिस्तान नेशनल असेम्बली के डिप्टी स्पीकर क़ासिम सूरी के उस फैसले की ख़बर दी, जिसमें वज़ीरे आज़म इमरान ख़ान के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव को रद्द कर दिया गया था. 8 अप्रैल कोइनक़लाब ने अपने पहले पन्ने पर उस मुल्क के सुप्रीम कोर्ट की ख़बर दी, जिसने सूरी के क़दम को ग़ैर-क़ानूनी क़रार देते हुए, असेम्बली को बहाल कर दिया.

4 अप्रैल के अपने संपादकीय में सियासत ने वर्ल्ड कप जीतने वाले क्रिकेट कप्तान के तौर पर इमरान की पिछली ज़िंदगी का हवाला दिया, जब उसने लिखा कि इमरान आख़िरी गेंद तक लड़ेंगे. अख़बार ने लिखा कि सभी की निगाहें अदालतों के फैसले पर लगी होंगी, लेकिन विपक्ष के पास भी बहुत ज़्यादा विकल्प नहीं बचे हैं, और उसे जोड़-तोड़ की सियासत छोड़कर लोगों का सामना करने के लिए तैयार रहना पड़ सकता है. 7 अप्रैल को एक संपादकीय में इनक़लाब ने लिखा, कि एक अलग तरह की सियासत करने के इमरान ख़ान के वादे के मुताबिक़ तो यही होता, कि वो कार कर लेते कि उन्हें पर्याप्त सदस्यों का समर्थन नहीं मिलेगा, और ख़ुद से कुर्सी छोड़ देते. पेपर ने ये भी लिखा कि एक्सपर्ट्स तथा राजनीतिज्ञों को उस देश में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के बार बार विफल होने का विश्लेषण करना चाहिए.

श्रीलंका संकट

4 अप्रैल को छपे एक लेख में,रोज़नामा ने लिखा कि श्रीलंका सरकार ने उसके खिलाफ उठ रही लोगों की आवाज़ को दबाने, और लोगों के जमावड़ों को नियंत्रित करने के लिए, देश में सोशल मीडिया पर पाबंदी लगा दी है. श्रीलंका इस समय भीषण आर्थिक संकट से गुज़र रहा है, जिसके नतीजे में हिंसक प्रदर्शन हुए हैं.

6 अप्रैल को सियासत ने अपने पहले पन्ने पर ख़बर दी, कि श्रीलंका में संकट गहरा रहा है और प्रधान मंत्री मिहिंदा राजपक्षे की सरकार ने ऑस्ट्रेलिया, नॉर्वे, और इराक़ में अपने दूतावासों को अस्थाई रूप से बंद कर दिया है. पेपर ने ख़बर दी कि भारी बारिश के बावजूद, कोलंबो में प्रधानमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन जारी थे, और भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस का इस्तेमाल किया.

उसी दिन,रोज़नामा में छपे एक संपादकीय में कहा गया, कि श्रीलंका के आर्थिक संकट में भारत के लिए भी सीख है. पेपर ने लिखा कि भारत के हालात भी बहुत कुछ श्रीलंका की तरह ही हैं- जिस तरह श्रीलंका की सत्तारूढ़ पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में मुफ्त रिआयतों का वादा किया था, और अब उन्हें पूरा करने के लिए उधार ले रही है, भारत में भी यही हो रहा है.

अख़बार ने लिखा कि भारत के बहुत से सूबे, ऐसी मुफ्त रिआयतों की वजह से अब पतन के कगार पर हैं. न सिर्फ सूबों के ख़ज़ाने ख़ाली हैं बल्कि कर्ज़ के बोझ से उनकी अर्थव्यवस्थाएं भी पंगु हो गई हैं. रोज़नामा ने लिखा कि हालात ऐसे हो गए हैं कि देश के कई शीर्ष प्राधिकारियों ने सरकार को चेतावनी दी है, कि अगर ये मुफ्त कल्याण योजनाएं बंद नहीं की जातीं, तो ये सूबे श्रीलंका की तरह ही ग़रीब हो जाएंगे.

उसने ख़बर दी कि इन अधिकारियों ने पीएम मोदी से भी मुलाक़ात की, और चार घंटे तक चली इस मीटिंग में कुछ नौकरशाहों ने, राज्यों में चल रही कुछ स्कीमों पर चिंताओं का इज़हार किया. उसने लिखा कि अधिकारियों ने कहा था, कि लोगों को दी जा रही ये मुफ्त योजनाएं व्यवहारिक नहीं हैं, और ऐसी स्कीमें लंबे समय तक नहीं चल सकतीं.

अर्थव्यवस्था और महंगाई के मुद्दे

5 अप्रैल को इनक़लाब ने अपने पहले पन्ने पर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में नौकरशाहों की एक मीटिंग की ख़बर दी, जिसमें अधिकारियों ने उन्हें चेतावनी दी थी कि अगर कल्याण योजनाओं की ऐसी ही बाढ़ रही, तो कुछ सूबों का भविष्य श्रीलंका जैसा हो सकता है. एक इनसेट में अख़बार ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी का एक बयान छापा, जिसमें उन्होंने ईंधन की बढ़ती क़ीमतों की आलोचना करते हुए, उसे‘प्रधानमंत्री जन धन लूट योजना’ क़रार दिया था.

उसी दिन छपे अपने संपादकीय में अख़बार ने लिखा, कि हालांकि भारत सरकार विदेशी निवेशकों को देश में व्यवसाय करने के लिए आमंत्रित कर रही है, और कुछ हद तक सफल भी हो रही है, लेकिन वो ऐसे भारतीयों को अकसर नौकरी की तलाश में देश छोड़ने से रोकने में नाकाम रही है, जबकि ये वही लोग हैं जिन्हें अगर सही वातावरण दिया जाए, तो वो ख़ुद से निवेशक बन सकते हैं.

2 अप्रैल को एक और संपादकीय में, जिसका शीर्षक था ‘महंगाई: कितनी और कब तक?’ पेपर ने आईटीसी के सीएमडी संजीब पुरी का हवाला देते हुए कहा, कि समय की ज़रूरत ये है कि रोज़गार के अवसर बढ़ाने के लिए सरकारी निवेश बढ़ाया जाए.

4 अप्रैल कोइनक़लाब औरसियासत दोनों ने पहले पन्नों पर ईंधन की लगातार बढ़ रही क़ीमतों की ख़बर दी. 4 अप्रैल को अपने संपादकीय में सियासत ने लिखा, कि ईंधन के दामों में तेरहवीं बार इज़ाफा किया गया है, और सरकार ‘लगातार लोगों को लूटने की राह पर चल रही है’.

पेपर ने लिखा कि ऐसा लगता है कि यदा कदा होने वाले विपक्षी पार्टियों के विरोध प्रदर्शनो को, आम आदमी का समर्थन नहीं मिल रहा है, इसलिए इन पार्टियों को लोगों को विरोध प्रदर्शन के अपने अधिकार के प्रति जागरूक करना चाहिए, और लोगों को भी सरकार से डरे बिना सड़कों पर उतरना चाहिए. पेपर ने लिखा कि अगर ऐसा नहीं हुआ, तो लोगों को दो जून की रोटी मिलनी मुश्किल हो जाएगी. उसी दिन रोज़नामा ने ख़बर दी, कि भारत में बेरोज़गारी दर में कमी आई है.

ब्रूस विलिस की अफेशिया से जंग

हॉलीवुड सुपरस्टार ब्रूस विलिस के इस ऐलान के बाद, कि उन्हें हुई एफेशिया बीमारी के बाद वो एक्टिंग छोड़ देंगे, 3 अप्रैल को इनक़लाब ने एक संपादकीय लिखा, जिसमें अख़बार ने लोगों को अपनी सेहत का ख़याल रखने की सलाह दी.दि लांसेट की साल 2015 की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए, जिसमें पत्रिका ने दावा किया था कि दुनिया भर में सिर्फ पांच प्रतिशत को स्वस्थ कहा जा सकता है, अख़बार ने लिखा कि बहुत ज़रूरी है कि लोग बीमारी की शुरुआती अवस्था में ही सचेत हो जाएं, और उसे अपने ऊपर हावी होने का मौक़ा न दें.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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