डिंडोरी (मध्यप्रदेश), 27 नवंबर (भाषा) छत्तीसगढ़ की सीमा से सटे मध्यप्रदेश के डिंडोरी जिले में 18 से 19 वर्ष के बाद चार वन परिक्षेत्रों में साल प्रजाति के तकरीबन 5,000 ऐसे पेड़ों पर कटाई का खतरा मंडरा रहा है, जो बोरर कीट के प्रकोप के कारण खोखले हो गए हैं। वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बृहस्पतिवार को यह जानकारी दी।
साल के पेड़ मूल रूप से भारत, बांग्लादेश, नेपाल और तिब्बत के हिमालयी क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
उष्णकटिबंधीय वन अनुसंधान संस्थान (टीएफआरआई) की कार्यवाहक निदेशक डॉ. नीलू सिंह ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, ”हमारी टीम ने हाल ही में डिंडोरी का दौरा किया था। रिपोर्ट तैयार कर ली गई है। मैं इसे पढ़ूंगी और भेजने से पहले कल इसे अंतिम रूप दूंगी।’
उन्होंने कहा, ‘यह निश्चित रूप से बोरर का प्रकोप है। हमारे पास इस विषय में शोध का अनुभव है और हम उस पर काम करते हैं। इसका लक्षण है – जैसे पेड़ों का मरना। कीटों का यह प्रकोप समय-समय पर होते रहते हैं। मप्र में इस तरह का हमला 18-19 साल पहले हुआ था। यह एक चक्र है, और इसकी गंभीरता को ध्यान में रखते हुए इन्हें काटना ही एकमात्र समाधान है।’
वन विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि ‘कूप कटाई’ के तहत जिले के गाड़ासरई उप वन मंडल के पूर्व करंजिया, दक्षिण करंजिया, बजाई और दक्षिण समनापुर वन परिक्षेत्र में बेहद ही उपयोगी साल के पेड़ों को चिह्नित किया गया है और अब इनकी कटाई की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। ये वन परिक्षेत्र नर्मदा नदी के उद्गम स्थल और पवित्र नगरी अमरकंटक के आसपास हैं।
उन्होंने बताया कि मृत, सूखे व गंभीर रूप से रोगग्रस्त और क्षतिग्रस्त पेड़ों को चिह्नित किए जाने और फिर केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से मंजूरी मिलने के बाद कटाई की प्रक्रिया शुरू की जाती है।
डिंडोरी के उपवनमंडलाधिकारी (एसडीओ) सुरेंद्र सिंह जाटव ने ‘पीटीआई वीडियो’ से बातचीत में कहा, ‘यह कोई नयी बात नहीं है। लेकिन इस बार प्रकोप कुछ ज्यादा ही प्रतीत हो रहा है।’
उन्होंने कहा, ‘इसी के तहत सर्वे करके करीब 5000 पेड़ों को चिह्नित किया गया है। अब इन्हें काटा जा रहा है।’
यह पूछे जाने पर कि क्या इन वन परिक्षेत्रों में मौजूद साल के पेड़ों पर बोरर कीट का प्रकोप देखा जा रहा है, जिसके कारण वे या तो सूख गए हैं या सूखने की कगार पर हैं, जाटव ने कहा कि चिह्नित पेड़ भी इसी श्रेणी में हैं।
उन्होंने कहा, ‘इसमें कोई शक नहीं कि साल प्रजाति के वृक्षों को बोरर कीड़े प्रभावित कर रहे हैं।’
बोरर एक सुंडी कीट की प्रजाति है और इसका प्रजनन चक्र 15 दिन का होता है। मादा एक बार में 300 से 500 अंडे देती है। बोरर कीट मानसून खत्म होने के पश्चात ही वृक्षों में लगने लगते हैं और उम्र भर पेड़ में ही रहते हैं तथा इस दौरान एक हरे-भरे पेड़ को भी वे कुछ ही दिनों में चट कर जाते हैं।
इस कीट के प्रकोप को पूरी तरह से नियंत्रित करने के लिए वृक्षों का कटाव किया जाता है।
जाटव ने बताया की पिछले दिनों जबलपुर से टीएफआरआई का एक दल आया था और उसने बोरर कीड़े के प्रभाव का निरीक्षण किया था।
उन्होंने कहा कि इस जांच की रिपोर्ट अब तक उन्हें नहीं मिली है।
करंजिया वन क्षेत्र के चेकपोस्ट पर पदस्थ वनकर्मी जयप्रकश पाठक ने पीटीआई वीडियो से बातचीत में दावा किया कि बड़ी संख्या में साल के पेड़ों में कीटाणु लगे हैं, जिसकी वजह से पेड़ खोखले हो गए हैं।
उन्होंने कहा, ‘इन पेड़ों से बुरादा निकल रहा है। वह सूख रहे हैं। मेरे क्षेत्र में सड़क किनारे 50 से अधिक पेड़ सूख गए हैं। अंदर तो यह संख्या और भी अधिक होगी।’
इसी क्षेत्र के ग्रामीण दलसिंह मार्को ने कहा, ‘जंगल नष्ट होने का खतरा मंडरा रहा है। इन्हीं जंगलों के कारण पवित्र नगरी अमरकंटक का सौंदर्य है। साल बोरर ने बड़ा नुक़सान पहुंचाया है। बड़ा संकट मंडरा रहा है, जंगल ही नष्ट हो जाएंगे तो बचेगा क्या। सरकार को तत्काल कार्रवाई करनी होगी।’
साल के वृक्ष का वैज्ञानिक नाम शोरिया रोबस्टा है। यह डिप्टरोकार्पेसी परिवार की एक प्रजाति है। यह एक द्विबीजपत्री बहुवर्षीय एवं अर्धपर्णपाती वृक्ष है, जो हिमालय की तलहटी से लेकर 3000-4000 फुट की ऊंचाई (ऊंचाई 28 मीटर तथा गोलाई 25 फीट होती है) तक पाए जाते हैं। इस वृक्ष की उम्र लगभग 1000 वर्ष से अधिक होती है।
भाषा सं ब्रजेन्द्र रंजन
रंजन
यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.
