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शुक्रवार, 18 अप्रैल, 2025
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तेजाबी हमलों के पीड़ित मुआवजे के लिए राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण से संपर्क कर सकते हैं: न्यायालय

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नयी दिल्ली, 20 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि यदि तेजाबी हमलों के पीड़ितों को मुआवजा मिलने में देरी होती है तो वे अपने संबंधित राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण से संपर्क कर सकते हैं।

प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ ने मुंबई स्थित गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) ‘एसिड सर्वाइवर्स साहस फाउंडेशन’ के वकील की इस दलील का संज्ञान लिया कि ऐसे पीड़ितों को महाराष्ट्र में प्राधिकारों से मुआवजा प्राप्त करने में कठिनाई हो रही है।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (एसएलएसए) से संपर्क करें। मुआवजे के भुगतान में देरी के मामले में पीड़ितों को राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों से संपर्क करने की स्वतंत्रता होगी।’’

एसएलएसए को एक चार्ट बनाने का भी निर्देश दिया गया, जिसमें उस समय का विवरण शामिल हो, जब पीड़ित या उनके परिवार के सदस्यों ने मुआवजा मांगा था तथा जिस दिन उन्हें मुआवजा मिला था।

पीठ ने कहा कि तेजाबी हमलों के पीड़ितों को मुआवजा देने में देरी को उसके संज्ञान में लाया जाएगा।

पीठ ने कहा कि केंद्र और 11 राज्यों ने याचिका पर अपने जवाब दाखिल नहीं किए हैं। इसके साथ ही, अदालत ने उन्हें चार सप्ताह का समय दिया और सुनवाई पांच मई को तय की।

यह सुनवाई एक एनजीओ की 2023 की जनहित याचिका से संबंधित थी, जिसमें 2014 में लक्ष्मी बनाम भारत संघ मामले में जारी अदालत के निर्देशों के सख्त कार्यान्वयन का अनुरोध किया गया था।

आदेश में कहा गया है कि तेजाब हमले से बचे लोगों को सार्वजनिक और निजी दोनों अस्पतालों में मुफ्त इलाज मिलना चाहिए तथा संबंधित राज्य सरकार द्वारा देखभाल और पुनर्वास लागत के रूप में उन्हें कम से कम तीन लाख रुपये का मुआवजा दिया जाना चाहिए।

अधिवक्ता शशांक त्रिपाठी के माध्यम से दायर याचिका में इस बात पर जोर दिया गया है कि तेजाब की बिक्री को विनियमित करने, अपराधियों को दंडित करने तथा चिकित्सा, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक पुनर्वास प्रदान करने के लिए अदालत के प्रयासों के बावजूद तेजाबी हमले के पीड़ितों का संघर्ष जारी है।

मुआवजा राशि बढ़ाने के निर्देश का अनुरोध करते हुए याचिका में यह भी मांग की गई है कि तेजाबी हमले के पीड़ितों की सुनवाई त्वरित अदालतों में की जानी चाहिए।

इसमें कहा गया है कि शीर्ष अदालत के आदेश के बावजूद, जिसमें पीड़ित मुआवजा योजना 2016 के तहत तीन लाख रुपये के न्यूनतम मुआवजे के साथ-साथ एक लाख रुपये का अतिरिक्त मुआवजा देने का आदेश दिया गया, कई पीड़ितों को पर्याप्त वित्तीय राहत नहीं मिली है। याचिका में कहा गया है कि कई पीड़ित हमले के कई साल बाद भी आर्थिक मुआवजे का इंतजार कर रहे हैं।

भाषा आशीष मनीषा

मनीषा

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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